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2016 का स्वागत : आजादी कभी पुरानी नहीं होती

Updated at : 01 Jan 2016 8:20 AM (IST)
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2016 का स्वागत : आजादी कभी पुरानी नहीं होती

निराशा के बीच दिख रही है उम्मीद की हल्की रोशनी कल से नववर्ष शुरू होनेवाला है. करोड़ों लोगों की तरह मैं भी उसकी प्रतीक्षा कर रहा हूं. कोई 55 वर्ष पहले जब मैं बनारस में छात्र था, एक कविता लिखी : ‘नये वर्ष के प्रति’, जो तीसरा सप्तक में संकलित है. जाते हुए वर्ष के […]

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निराशा के बीच दिख रही है उम्मीद की हल्की रोशनी
कल से नववर्ष शुरू होनेवाला है. करोड़ों लोगों की तरह मैं भी उसकी प्रतीक्षा कर रहा हूं. कोई 55 वर्ष पहले जब मैं बनारस में छात्र था, एक कविता लिखी : ‘नये वर्ष के प्रति’, जो तीसरा सप्तक में संकलित है. जाते हुए वर्ष के अंतिम दिन लिखी इस कविता की अंतिम पंक्तियां हैं ‘आज’ इस खामोश मिटते शब्द की सारी उबलती अर्थवत्ता राह में लेकर खड़ा हूं/ आओगे कब आओगे? ओ अपरिचित!
उस समय मेरे लिए आनेवाला वर्ष जितना अपरिचित था, उतना आज नहीं है. बहुत कुछ है, जो आज के पूरे माहौल में मौजूद है और मेरे जैसे रचनाकार के लिए थोड़ा धुंधला व परेशान करनेवाला है. अगर आज वह कविता लिखता, तो बेशक उसमें हल्की-सी निराशा की भी गूंज होती.
वह नेहरू युग था और मिली हुई आजादी बहुत पुरानी नहीं हुई थी. वैसे आजादी कभी पुरानी नहीं होती. सिर्फ उसकी व्याख्याएं अलग-अलग ढंग से होती रहती हैं.
आज विशेष रूप से सत्तासीन लोग जिस तरह उस आजादी को देख रहे हैं, उससे कई सवाल मन में पैदा होते हैं. अभी कुछ दिनों पहले मैंने देश के एक बड़े विचारक की टिप्पणी पढ़ी, जिसमें गहरी पीड़ा के साथ कहा गया कि कुल मिला कर आज जो माहौल है, काफी गड्डमड्ड और दिशाहीन है. मुक्त अभिव्यक्ति के सामने इतनी चुनौतियां कभी नहीं थीं, जितनी आज हैं.
दो-तीन हफ्ते पहले फिल्म जगत के बड़े गीतकार (गुलजार) ने कहा था, ‘आज बोलने में डर लगता है.’ देश के कुछ रचनाकारों ने बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ अचानक ही साहित्यिक पुरस्कार या उपाधियां नहीं लौटायीं. इसके पीछे कोई योजना नहीं थी, जैसा सत्ता की ओर से कहा गया. यह स्वत:स्फूर्त प्रतिक्रिया थी और उन लोगों द्वारा व्यक्त की गयी थी, जो एक-दूसरे को जानते तक नहीं
मैं यह नहीं कहना चाहूंगा कि यह स्थिति अचानक पिछले दो वर्षों में बनने लगी थी, बल्कि इस कटु वास्तविकता का सबसे बड़ा उदाहरण था कोई तीन-चार वर्ष पहले देश के सबसे बड़े चित्रकार (मकबूल फिदा हुसैन) का देश छोड़ने का निर्णय. ऐसा उन्होंने कुछ संकीर्ण मानसिकतावाले तत्वों की आलोचना से क्षुब्ध होकर किया था. मुझे यह तथ्य परेशान करता है कि पूरे देश की बौद्धिक बिरादरी ने इसे एक हद तक सहन किया था.
विरोध में कुछ टिप्पणियां जरूर आयीं, पर मुझे लगता है कि उसे आंदोलन की शक्ल नहीं दी गयी. इसके चलते वे तत्व और सक्रिय होते गये और जब सत्ता का अनुकूल माहौल उन्हें मिला, वे और सक्रिय हो गये. मैं एक लेखक के रूप में गुलजार की बात का समर्थन करते हुए यह कह सकता हूं कि आज वाकई कुछ चुभती हुई बातों के विरुद्ध लिखते-बोलते हुए जरा डर लगता है.
यदि माहौल ऐसा है, तो जाहिर है, भविष्य पर इसकी छाया पड़ेगी और मेरे लिए आनेवाला वर्ष उतना उत्साहवर्द्धक नहीं है, जितना आज से 55 वर्ष पहले था.
फिर भी मैं निराशावादी कतई नहीं हूं. कुछ सकारात्मक घटनाएं, जो पिछले दिनों घटित हुई हैं, उनमें मुझे हल्की रोशनी भी दिखाई देती है.
सबसे पहले मैं अभी निकट अतीत में घटित हुए बिहार चुनाव की चर्चा करना चाहूंगा. लगभग यह चुनाव पिछली सदी की एक मशहूर हिंदी फिल्म के उस गीत की तरह था, जिसकी पहली पंक्ति (अगर मैं भूल नहीं रहा) है, ‘ये लड़ाई है दीये की और तूफान की…’ मुझे खुशी है और एक भारतीय नागरिक होने के नाते गहरा संतोष भी कि इस लड़ाई में दीये की जीत हुई.
जहां तक साहित्य का सवाल है, मैं एक नयी वास्तविकता का खासतौर पर उल्लेख करना चाहूंगा कि पिछले कुछ वर्षों में वंचित अस्मिताओं का एक विस्फोट-सा दिखाई पड़ता है. यहीं नहीं, अभिजात वर्ग के भीतर भी इन वर्गों की जीवन – स्थितियों को अधिक निकट से जानने-पहचानने की तड़प पैदा हुई है. इसका प्रमाण हैं आदिवासी व दलित जीवन को लेकर लिखे गये कुछ चर्चित हिंदी उपन्यास.
मैं विशेष रूप से यहां रणेंद्र के उपन्यास ‘ग्लोबल गांव का देवता’ का जिक्र करना चाहूंगा. निलय उपाध्याय का अभी-अभी दशरथ मांझी पर आया उपन्यास ‘पहाड़’ भी इसका अच्छा उदाहरण है. पर, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण मुझे यह लगता है कि स्वयं आदिवासी लेखक सिर्फ हिंदी में ही नहीं, अखिल भारतीय स्तर पर ज्यादा सक्रिय हुए हैं और अच्छे साहित्य का सृजन कर रहे हैं. पूर्वोत्तर भारत में लगभग एक नवजागरण की स्थिति है.
वहां की आदिवासी भाषाओं (गारो, खासी, जयंतिया, नगमीज आदि) में एक विलक्षण सृजनात्मक स्फूर्ति दिखाई पड़ती है.
इस छोटी-सी टिप्पणी में इन दो-एक सकारात्मक लेकिन बहुत मानीखेज घटनाओं का जिक्र करते हुए मैं इसे समेटना चाहूंगा और एक जिद्दी किस्म का आशावादी होने के कारण आनेवाले वर्ष 2016 का स्वागत करूंगा.
(वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह से कोलकाता में रमेश द्विवेदी की बातचीत पर आधारित)
ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी पुरस्कार समेत अनेक सम्मानों से विभूषित वरिष्ठ कवि, आलोचक व निबंधकार केदारनाथ सिंह को समकालीन कविता में नये प्राकृतिक बिंब विधान, मुहावरे और सरल-सुबोध भाषा के प्रभावशाली इस्तेमाल के लिए जाना जाता है. उन्हें यह यश उनके व्यवस्थित व सधे हुए लेखन की बदौलत मिला है.
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