मुंडारी लोकगीतों में प्रकृति-चित्रण की परंपरा

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 01 Feb 2019 7:47 AM

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डॉ खातिर हेमरोम / रेमिस कंडुलना मुंडारी लोकगीतों की प्रवृत्ति सार्वभौमिक होती है. इसलिए इनमें एक सामान्य स्वच्छंदता दिखाई पड़ती है. विश्व के अधिकांश आदिवासियों पर लिखने एवं इनकी लोक परंपरा-सभ्यता के खोजने वाले विद्वानों एकमत हैं कि संसार की सभी लोकगीतों की धुनें किसी-न-किसी रूप में एक दूसरे से मिलती हैं और शब्द योजना […]

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डॉ खातिर हेमरोम / रेमिस कंडुलना
मुंडारी लोकगीतों की प्रवृत्ति सार्वभौमिक होती है. इसलिए इनमें एक सामान्य स्वच्छंदता दिखाई पड़ती है. विश्व के अधिकांश आदिवासियों पर लिखने एवं इनकी लोक परंपरा-सभ्यता के खोजने वाले विद्वानों एकमत हैं कि संसार की सभी लोकगीतों की धुनें किसी-न-किसी रूप में एक दूसरे से मिलती हैं और शब्द योजना बहुधा एक जैसे होती है.
साहित्यिक कृत्रिमताओं का कम-से-कम प्रयोग ही लोकगीतों की महत्वपूर्ण विशेषता है. लोकगीतों में क्षेत्रीय विशेषताओं का प्रभाव होता है. यही कारण है कि इनमें हर्ष-विषाद आदि के एक-से-एक भाव पाये जाते हैं, किंतु स्वाभाविकता के अनुसार इनमें भिन्नता भी होती हैं. लोकगीत मनुष्य के मन के उद्गार होते हैं मनुष्य जो सोचता है, उसी भाव को मर्मस्पशी, हृदयस्पर्शी एवं सरल भाषा में व्यक्त करता है.
मुंडा समुदाय संगीत प्रिया समाज है. इसके आदिकाल से बसने के कारण झारखंड राज्य में इनके बीच यह बात प्रचलित है कि ‘अबुअ: दिसुम अबुअ: राइज’ अर्थात ‘हमारा देश हमारा राज्य’. झारखंड समरसता पूर्ण और श्रमशील संगीत प्रधान राज्य है. यहां का चलना ही नृत्य है, बोलना ही संगीत है.
मुंडारी में कहा जाता है, ‘सेन गे सुसुन, कजि गे दुरङ, डुरी गे दुमङ’. आदिवासियों के बीच में जब भी कोई बच्चा जन्म लेता है, तो ढोल, नगाड़े या कांसे की थाली बजायी जाती है. शिशु के रोने की आवाज सुन कर लोग कह उठते हैं कि देखो अखड़े का एक और रसिक या कलाकार आ गया. ऐसे ही होता है झारखंडी आदिवासियों के जीवन का शुभारंभ.
शिशु जब मां की गोद में होता है, तब से अखड़े के नृत्य-संगीत का अनुभाव करता है, जब थोड़ा बड़ा होता है, तब पिता के ढोलक, दादु के मांदर, एवं काका के मजबूत कंधे पर बैठ कर अखड़ा के नृत्य-संगीत में ढलने लगता है.
थोड़ा और बड़ा होता है, तब बेटी हो, तो मां, काकी, दीदी और सहेलियों के नृत्य कतार में जुड़ कर पांव घसीटने लगती है. लड़का हो, तो अखाड़े के बीचों-बीच उछलने-कूदने लगता है. जब थोड़ा और बड़ा होता है, तो गाय-बैलों, भेड़-बकरियोंको चराने जंगलों की ओर ले जाता है. तब उसके हाथों में लाठी नहीं, बांसुरी या टुइला होता है.
मुंडा समाज की लड़कियां गोबर चुनते माथे पर टोकरी लिये खेतों-जंगलों की ओर जाने लगती हैं. जंगलों में पत्ते तोड़तीं संगी-सहेलियों के साथ गुनगुनाने लगती हैं.
रात्रि में मंदार, ढोल, नगाड़े, ढांक, टुइला, केंदरा, बांंसुरी, बनम के ताल में हर राग पर निपुण होती जाती हैं. मुंडारी गीतों के भाव हृदय को छू लेने की शक्ति रखतेे हैं. अपने दो शब्द में शिक्षक, लेखक, गुरु रहे जगदीश त्रिगुणायत ने लिख है, ‘गीतों में मिट्टी की गंध, जंगलों की हरियाली, झरनों का वही संगीत मुंडा लोकगीतों की विशेषताएं हैं. प्रकृति ही इनके गीतों के उपमान हैं, वे ही प्रतीक हैं, जो मुंडा गीतों के शृंगार हैं. एक मुंडारी गीत में बहन अपने बड़े भाई से इस तरह कहती है –
ओको कोतेम सेनो: तना दादा,
ति: रेदो सुकु टुइला..
ओको कोतेम सेनो: तना दादा,
मयङ रेदो मदे मुरुलि.
अर्थात
ओ दादा तुम कहां जा रहे हो,
हाथ में लौकी का बना टुइला है..
ओ दादा कहां तुम जा रहे हो,
कमर में तो बांस की मुरली है..
कभी राह में चलते हुए आदिवासी युवक अकेलेपन में गीतों को ही अपना साथी बना लेता है. महान शिक्षाविद डॉ रामदयाल मुंडा कहते थे, ‘जे नाची से बाची’. आदिवासी समाज प्रकृति के साथ इस तरह से जुड़ा हुआ है कि उनकी हरेक क्रिया में प्रकृति के साथ जुड़ाव दिखता है. विवाह के समय आम के पत्ते और गोलइची के फुल का व्यवहार होता है. इसलिए इनके बीच यह गाना प्रचलित है –
उलि सकम नियरा
गोलइची बा तेको
अड़ांदिना रे
उलि सकम नियारा..
ये वन वृक्ष, पौधे, फल, फूल जो इनके बीच पवित्रता के प्रतीक हैं. आदिवासी जीवन के गवाह एवं शृंगार हैं. प्रकृति में ही सिङबोंगा का वास है, सिङबोंगा के आंतरिक शक्ति द्वारा समाज का जीवन चक्र चलता है. सिंङबोंगा को आदर देते कवि यूं कहते हैं –
ओते सिरमाम बइकेदा
चिलकन निरल सुगड़
चिलकन निरल सुगड़..
बुरु बेड़ा गड़ा
चिलकन निरल सुगड़
चिलकन निरल सुगड़..
रेमिस कंडुलना : दिसुम सुरुद् सुड़ा सगेन. पृ.सं. 11.
आदिवासियों के बीच मौसम और समय के अनुकूल ही गीत-संगीत हुआ करते है और इसी आधार पर राग और ताल भी हुआ करते हैं. हरेक लोकगीत अपने अंदर उस समुदाय विशेष की इतिहास को छुपा कर रखे होता है या लोकगीत इतिहास को बताता है.
मौसम के आधार पर मुंडाओं के लोकगीतों के स्वर होते हैं. जैसे जदुर, गेना, जापी, चिटिद् जरगा, जतरा आदि. इन्हीं मौसमों में जन्म, मरण, विवाह, और पर्व-त्योहारों के मधुर स्वर सुनने को मिलते हैं. मुंडा समुदाय में किसी भी बात को अवसर विशेष पर गीतों एवं लोकोक्तियों के माध्यम से कहा जाता है. जैसे कि युवक या युवती के शादी हो जाने के निसानी को देख कर गीतों के माध्यम से यूं कहा जाता है –
उलि सकम ससङ सुतम,
ति:रे चि रेम तोलेन जाना..
कटा होयो नरे नरे,
कटा रे चिम रंगन जना..
ति:रे चि रेम तोलेन जना,
कटा रे चिम रंगन जना..
डिडा सोमोय दो चबा जना,
डंगोवा नुसाड़ा दो नरे ना..
नृत्य-संगीत वादन ही इनकी जिंदगी की ऊर्जा है. झारखंड का हर बालक संगीत अखड़ा में युवा होता है और इसी संगीत में बूढ़ा हो जाता है.
इस लोक से संगीत से ही गाजे-बाजे के साथ बिदा होता है. संगीत इनके जीवन के अभाव को, कष्ट को, पीड़ा को हर लेता है. एक दोना मात्र इलि रसि के सेवन से वह शारीरिक-मानसिक तकलीफ भी भूल जाता है. आदिवासी तो इसी धरती को स्वर्ग बना लेते हैं. इनके बीच में एक कहावत प्रचलित है- जिदगी रे चिकन परवाह! यही धरती तो स्वर्ग है. धरती को आदिवासी नरक बनाना नहीं जानते.
झारखंडी जीवन में जंगल के पशु-पक्षी भी इस अखड़े से दूर रहते हैं, जो खतरनाक हैं. उनसे रक्षा के लिए आधी-आधी रात तक नगाड़े, ढांक, मांदर के तेज वाद्य पर नाचना-गाना ताे एक परंपरा है. जंगली पशु-पक्षी भी तो हमारे गोत्र में सम्मिलित हैं, ये हमारे प्रतीक हैं. इनकी सुरक्षा हमारे ऊपर है. प्रकृति के ईद-गिर्द ही मुंडारी लोकगीत हुआ करते हैं. जैसे कि एक सरहुल गीत को ही लें –
बा को चंड़ु: दोरे तेबा लेना,
बसंते ऋतु दो रे सकि जना..
मोगो मोगो बा को सोवन तना,
कुडम बितार रे गुमुराव तना..
हुरुम सुकु अयअ: सुकु-सुकु,
बा: को बगाइचा रे बनम तना..
ससङ बा: : कांडे मुंडा.
ऐसे ही आदिवासियों का जीवन दर्शन भी है. जल जंगल में उगने वाली जड़ी-बूटियों को भी हम जड़ से नष्ट नहीं करते, अपितु जड़ी काट कर उसे और फैलने के लिए छोड़ देते हैं. पेड़ों को भी जब काटते हैं, तो कुछ भागों को छोड़ देते हैं. कटे हुए पेड़ के कटे भाग पर मिट्टी का लेप या पत्थर लगा देते हैं, जिससे की उनसे कोपल निकल सकें, ताकि जंगल आबाद रहे और हम धरती की गोद में हंसते-खेलते अपना जीवन आनंद से जी सकें.
(लेखकद्वय संत जेवियर्स कॉलेज रांची, झारखंड से संबद्ध हैं).
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