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लोकनायक जयप्रकाश नारायण करुणा और क्रांति के अनूठे मेल थे

Updated at : 11 Oct 2018 6:08 AM (IST)
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लोकनायक जयप्रकाश नारायण करुणा और क्रांति के अनूठे मेल थे

लोकनायक के नाम से पुकारे जाने वाले जेपी की आज जयंती है. वह स्वप्नद्रष्टा थे, क्रांतिकारी थे, युवाओं के आइकन थे. उनकी एक आवाज पर हिंसक गतिविधियों में शामिल लोग हथियार डाल देतेे थे. उनकी पुकार पर हजारों युवाओं ने ऐशोआराम की जिंदगी के बदले गांव और समाज को बदलने का प्रण लिया और ताउम्र […]

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लोकनायक के नाम से पुकारे जाने वाले जेपी की आज जयंती है. वह स्वप्नद्रष्टा थे, क्रांतिकारी थे, युवाओं के आइकन थे. उनकी एक आवाज पर हिंसक गतिविधियों में शामिल लोग हथियार डाल देतेे थे. उनकी पुकार पर हजारों युवाओं ने ऐशोआराम की जिंदगी के बदले गांव और समाज को बदलने का प्रण लिया और ताउम्र निभाया. आखिर जेपी में ऐसा क्या चमत्कार था, हमने इसे ही समझने की कोशिश की है.
अनिल प्रकाश
जयप्रकाश नारायण का जीवन शोध यात्रा की एक लंबी प्रक्रिया है. समाज परिवर्तन के लिए नये-नये रास्ते तलाशने और प्रयोग करने की हिम्मत जयप्रकाश नारायण में ही थी.
शुरुआत में मार्क्स और लेनिन के रास्ते पर चलनेवाले जयप्रकाश बाद में गांधी के विचारों के निकट आये और संपूर्ण क्रांति के आंदोलन में उन्होंने मार्क्स और लेनिन के बीच वैचारिक समन्वय स्थापित करने की कोशिश की. जेपी के कमरे में बुद्ध और लेनिन की तस्वीर लगी रहती थी. मार्क्सवादी को-ऑर्डिनेशन कमेटी के नेता एके राय को उन्होंने बताया था कि वे करुणा और क्रांति का मेल स्थापित करना चाहते हैं.
आपातकाल के दिनों में जेपी जेल में किडनी की गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो गये थे. इस स्थिति में उन्हें चंडीगढ़ जेल से रिहा किया गया. कुछ दिन मुंबई के जसलोक अस्पताल में इलाज कराने के बाद जेपी अपने निवास महिला चरखा समिति, पटना आ गये. यहीं डॉक्टर सप्ताह में दो दिन उनका डायलिसिस करते थे. डायलिसिस लगभग सात घंटे चलती थी.
इस दौरान उनका खून डायलिसिस मशीन में जाता और साफ होकर उनके शरीर में आता रहता. ऐसा लगता था कि जेपी महाभारत के भीष्म पितामह की तरह शरशय्या पर हैं.
ऐसे ही दौर में एक दिन हम अपने दो साथियों के साथ पीछे के रास्ते से पुलिस की नजर से बचकर जेपी के पास पहुंचे. हमने उनसे पूछा- ‘जेपी आप शुरू में मार्क्सवादी थे, फिर लोकतांत्रिक समाजवादी हुए उसके बाद गांधीवादी हो गये, यह सब कैसे हुआ?’
जेपी का जवाब था- ‘लेनिन की मृत्यु के बाद स्टालिन के दौर में 12 करोड़ की आबादी वाले रूस में जब प्रतिक्रांति को दबाने के नाम पर एक करोड़ लोग मार दिये गये, तो हिंसात्मक क्रांति से मेरा विश्वास उठ गया और मैं लोकतांत्रिक समाजवादी बन गया. समाजवादी पार्टी के आपसी कलह से ऊबकर जेपी उससे अलग हो गये थे. लोहिया और जेपी की बीच का अलगाव भारत के समाजवादी आंदोलन के लिए एक बड़ी त्रासदी साबित हुई.
बाद के दिनों में यह बात लोहिया ने भी सार्वजनिक तौर पर मानी और कई बार जेपी से अनुरोध किया कि वे समाजवादी पार्टी का फिर से नेतृत्व करें. उस समय तो जेपी नहीं माने लेकिन लोहिया की मृत्यु के बाद उनको भी इस बात का एहसास हुआ. बाद के दिनों में वे गांधी के विचारों के निकट आते गये और विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में शामिल हो गये. लेकिन,जल्दी ही उन्हें भूदान आंदोलन की सीमाओं का भान होने लगा.
1967-68 में बंगाल के नक्सलबाड़ी से बढ़ता हुआ सशस्त्र आंदोलन बिहार के मुंगेर जिले के सूर्यगढ़ा और मुजफ्फरपुर जिले के मुसहरी प्रखंड में जोर पकड़ने लगा था. वर्ग शत्रुओं की हत्या के लिए सूची जारी हो रही थी. इसी क्रम में कुछ सर्वोदय कार्यकर्ताओं की सूची भी जारी की गयी. जेपी प्रभावती जी के साथ मुसहरी आ गये और गांव-गांव घूमने लगे. सशस्त्र संघर्ष में लगे लोगों से भी संवाद शुरू किया.
इस दौरान जमीनी सच्चाइयों को देखकर उन्हें महसूस हुआ कि सामाजिक आर्थिक विषमता के रहते समाज में शांति संभव नहीं है और इसके लिए जन-संघर्ष जरूरी है. इस दौरान उन्होंने ‘फेस टू फेस'(आमने-सामने) नामक पुस्तिका लिखी जिसने 1974-77 के बिहार आंदोलन को वैचारिक आधार दिया था. 1971 के बांग्लादेश मुक्ति के संघर्ष में भी जेपी का सक्रिय सहयोग था.
1974 का अक्टूबर महीना रहा होगा. छात्र आंदोलन जोरों पर था. जेपी कटिहार से पटना लौट रहे थे. रास्ते में बेगूसराय स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो हजारों छात्र जेपी के स्वगत में नारे लगा रहे थे. इसी बीच एक पंडित जी आये.
उन्होंने जेपी को एक धोती और जनेऊ भेंट किया. जनेऊ देखते ही जेपी बोल पड़े- मैं तो शूद्र हूं, जनेऊ कैसे लूं? फिर छात्रों की ओर मुखातिब हुए और बोले- जातीय श्रेष्ठता और अहंकार का प्रदर्शन करनेवाले जनेऊ को तोड़ दो. और देखते ही देखते छात्रों ने अपने जनेऊ उतारकर तोड़ डाले, जनेऊ का बड़ा ढेर जमा हो गया. जेपी के अपने गांव सिताब दियारा की सभा में भी छात्रों के जनेऊ का ढेर जमा हो गया था. फिर तो जेपी जहां-जहां जाते जनेऊ तोड़ने का सिलसिला चलता. आंदोलन के कुछ लोगों ने इसका विरोध भी किया था .
इस आंदोलन का ऐसा प्रभाव था कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के बाद पहली बार हजारों की संख्या में युवतियां इस आंदोलन में शरीक हुईं. अच्छी संख्या में बिना तिलक दहेज के विवाह हुए. छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के युवक युवतियों ने बड़ी संख्या में अंतर्जातीय विवाह किये. शराब की दुकानों पर पिकेटिंग करके उन्हें बंद कराया गया. अगर आपातकाल नहीं लगता और गांव-गांव में बन रही जनता सरकारों का सिलसिला आगे बढ़ पाता तो सामाजिक क्रांति का सपना जमीन पर जरूर उतरता.
हमलोग 1974-75 में 22-23 साल के थे लेकिन 74 साल के जेपी से बहस करने में, उनसे असहमति जाहिर करने में कभी कोई दिक्कत नहीं आती थी. नायक और सैनिक के बीच का ऐसा लोकतांत्रिक रिश्ता बहुत कम दिखाई देता है. जब भी हमलोग जेपी से मिलने जाते और वहां कोई बाहर के अतिथि होते तो जेपी उनसे हमलोगों का परिचय करते हुए बताते ये हमारे युवा साथी हैं.
1978 में जब छात्र युवा संघर्ष वाहिनी ने बोधगया मठ के भू-शोषण के खिलाफ शांतिमय आंदोलन की शुरुआत की तो जेपी हर शनिवार को हमलोगों से क्षेत्र की जमीनी स्थिति के बारे में फीडबैक लेते थे और जरूरी राय देते थे. एक बार एसएम जोशी आये तो जेपी ने एसएम को बोधगया भेजा. एसएम बोधगया में ही थे कि जेपी के निधन की खबर आई.
उस समय मुजफ्फरपुर में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक चल रही थी. सभी साथी पटना आये और सारी व्यवस्था
संभाली, पुलिस से संभलनेवाली नहीं थी. पटना में लाखों लाख लोग जेपी के अंतिम दर्शन के लिए जुट गये थे.
दूसरे दिन जेपी का अंतिम संस्कार होना था. पता चला कि जेपी के मृत शरीर को जनेऊ पहनाया जाएगा. छात्र युवा संघर्ष वाहिनी के लोग बेचैन हो गये. वाहिनी ने एक पर्चा निकाला-जेपी के मृत शरीर को जनेऊ पहनाकर जेपी के विचारों की हत्या की गयी है.
बाद के दिनों में गंगा मुक्ति आंदोलन तथा जल, जमीन और जंगल को बचाने के आंदोलन सामाजिक परिवर्तन की धारा को आगे बढ़ा रहे हैं. विकास की आज की अवधारणा अमीरी और गरीबी की खाई को बढ़ा रहा है.
क्षेत्रीय विषमता बढ़ रही है. बिहार, झारखंड जैसे पिछड़े राज्यों से पलायन हो रहा है. विकसित कहे जानेवाले राज्यों आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र आदि में किसान बड़े पैमाने पर आत्महत्या कर रहे हैं. आदिवासी इलाकों में बेचैनी और हाहाकार मचा हुआ है. नदियां संकट में हैं, हिमालय और देश, दुनिया का पर्यावरण खतरे में है. ऐसे में जेपी की बड़ी याद आती है.
(लेखक संपूर्ण क्रांति के आंदोलनकारी रह चुके हैं, बाद के दिनों में गंगा मुक्ति आंदोलन समेत कई आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं.)
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