आदिवासी संघर्ष की दास्तां गढ़तीं रूबी हेंब्रम

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 07 Sep 2018 6:10 AM

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अजय विद्यार्थी बचपन में स्कूल के दिन हों या फिर वर्तमान में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सेमिनार और गोष्ठियां, मेरे लिए कभी भी सामान्य अनुभव जैसा नहीं रहा है. मुझे सदैव ही लगता रहा है कि मैं लोगों से अलग हूं और मुझसे ऐसे ही सवाल पूछे जाते हैं, जैसे मैं अन्य लोगों से […]

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अजय विद्यार्थी
बचपन में स्कूल के दिन हों या फिर वर्तमान में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सेमिनार और गोष्ठियां, मेरे लिए कभी भी सामान्य अनुभव जैसा नहीं रहा है. मुझे सदैव ही लगता रहा है कि मैं लोगों से अलग हूं और मुझसे ऐसे ही सवाल पूछे जाते हैं, जैसे मैं अन्य लोगों से अलग हूं. हालांकि अब मैंने उन सवालों का जवाब देना सीख लिया है.
वर्ष 2016 में मैं जयपुर साहित्य उत्सव में भाग लेने जयपुर पहुंची थी और अन्य प्रतिभागियों के साथ पंजीकरण के लिए लाइन में खड़ी थी. मेरे पीछे खड़े एक सज्जन ने मुझसे पूछा-‘आप कहां से हैं ?’ मैंने कहा-‘मैं झारखंड से हूं और आदिवासी हूं.’ उसका तुरंत ही प्रत्युत्तर मिला-‘आप भारतीय तो नहीं लगती हैं?’ मैं कुछ अचकचायी, लेकिन मैंने पलट कर पूछा, ‘तो भारतीय लगने के लिए मुझे क्या करना होगा?’ मेरे सवाल की बेरुखी से वह चुप हो कर आगे बढ़ गया.
लोग मेरी सूरत का मजाक उड़ाया करते थे
आदिवासियों की कला, संस्कृति, लोकगाथा, संगीत और साहित्य को गैर सरकारी संस्था और प्रकाशक संस्था ‘आदिवाणी’ के जरिये अाम लोगों तक पहुंचाने व संरक्षण का कार्य कर रहीं रूबी हेंब्रम कहती हैं- ‘यह तो केवल एक उदाहरण है. ऐसे सैकड़ों वाकये हैं, जब मेरी सूरत, मेरे मोटे होठ, मेरी चिपटी नाक, मेरे काला रंग को लेकर लोग मजाक उड़ाते रहे हैं. हम लोगों को कहा जाता है कि हम जंगलों में रहते हैं, गुफाओं में रहते हैं.
हालांकि मेरे पिता थिमोथियस हेंब्रम झारखंड के पलामू के लुखी पोखार तथा मां एलबिना मुर्मू दुमका बेनागड़िया की रहने वाली थीं. मेरे पिता कोलकाता के बिशप कॉलेज में थियोलॉजी पढ़ाते थे और मां कोलकाता स्थित सरकारी कॉलेज में शिक्षिका थीं. मेरा पालन-पोषण गांव में नहीं हुआ और मैं शहर में पली-बढ़ी आदिवासी हूं और फर्राटेदार अंग्रेजी बोल सकती हूं-लिख सकती हूं.
चूंकि मेरे पिता चर्च से जुड़े थे, इस कारण मुझे कोलकाता के प्रतिष्ठित स्कूल लॉ मार्टिनियर फॉर गर्ल्स में पढ़ने का अवसर मिला. मैं स्कूल में एक मात्र आदिवासी लड़की थी और क्लास के बच्चे मेरे स्किन और चेहरे को लेकर मजाक उड़ाया करते थे और कहा करते थे-‘तुम अपने जूते की पॉलिश करते वक्त क्यों नहीं अपने चेहरे की भी पॉलिश कर लेती हो?’
स्कूल में मैं लगभग 16 साल तक रही, लेकिन स्कूल में मेरा कॉन्फिडेंस लेवल जीरो था. जानबूझ कर मैं कोई फ्रेंड नहीं बनाती थी और अपनी कक्षा के बच्चों से बचती रहती थी. वे बच्चे मेरी ही उम्र के थे. उनके लिए यह नाॅर्मल था, क्योंकि वे अपने घरों में यही सीख रहे थे. मेरी पहचान उनके लिए उस बच्चे की थी, जो उनके घरों में नौकर का काम करते थे. उनकी तथाकथित आधुनिक जीवन शैलीव रंगरूप के सामने हमारी जीवन शैली और रूप रंग भद्दा और काला था. देश का विकास हुआ है.
देश में नव उदारवाद आया. हम आदिवासी और दलितों ने अपने जंगल और गांव छोड़ कर उसे बनाने में जी जान लगा दी, लेकिन हमें आज क्या मिला है? हमें अपनी ही संस्कृति और सभ्यता से हटाया जा रहा है. हमें कुचलने में उन्हें एक मिनट भी नहीं लग रहा है. हमारी अपनी ही जमीन छीनी जा रही हैं. हमारी भाषाएं और परंपराएं विलुप्त हो रही हैं. कोई हमारा संरक्षण व रक्षा करने वाला नहीं है.
आदिवासियों द्वारा शुरू की गयी पत्थलगढ़ी जैसी परंपरा को मिटाया जा रहा है. उसे मानने से इनकार किया जा रहा है और जो लोग विरोध कर रहे हैं, उन्हें जेल में बंद कर दिया जा रहा है और हम एकजुट नहीं हैं. जेल में मर जायेंगे, लेकिन हमारे पक्ष में खड़ा होने वाला कोई नहीं है.
आदिवासी साहित्य को लेकर कोई पब्लिशर काम नहीं कर रहा था
ये सवाल मुझे परेशान किया करते थे. मैंने कोलकाता के लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई की. वहां अपने को अकेले पाया और जब 2012 में पब्लिशिंग का कोर्स करने गयीं, तो पाया कि हर वर्ग के साहित्य पर काम करने के लिए पब्लिशर्स हैं, लेकिन वहां भी आदिवासी साहित्य को लेकर कोई पब्लिशर काम नहीं कर रहा था. आदिवासी साहित्य और परंपरा को लेकर कोई काम करने के लिए तैयार नहीं था.
आदिवासियों की वर्तमान परिस्थिति ने मुझे बेचैन कर दिया था और मैंने अपनी आइटी की ‘हाई पे’ नौकरी छोड़ी थी. मैंने अपने विचार अपने बचपन के मित्र जय टुडू और मेक्सिकन पत्रकार लुईस ए गोमेज को बताया और हम लोगों ने 2012 में पब्लिशिंग हाउस ‘आदिवाणी’ शुरू किया और मैंने आदिवासी परंपराओं, लोक गाथाओं, कहानियों व संस्कृति को इन पुस्तकों के माध्यम से आम लोगों के सामने लाना शुरू किया.
मैंने इसके लिए अंग्रेजी भाषा का सहारा लिया, क्योंकि मेरा मानना है कि इसी भाषा के माध्यम से हम अपनी आवाज देश और देश के बाहर एक बड़े श्रोता व पाठक वर्ग तक पहुंच पायेंगे, लेकिन यह भी आसान नहीं रहा. बड़े-बड़े और नामी-गिरामी पुस्तक विक्रेताओं ने आदिवासी का नाम सुन कर ही पुस्तक रखने से मना कर दिया था. आदिवासी साहित्य को लेकर बड़े पुस्तक विक्रेता ‘गेटकीपिंग’ की भूमिका निभाते हैं. वे उनकी पुस्तकों को जंगली करार देते हैं.
आदिवासियों की परंपरा को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं
बचपन से भेदभाव और मजाक का सामना करते रहने के बाद यहां भी ‘इंटेलेक्चुअल बायस्डनेस’ देखने को मिलता है. हालांकि अपेक्षाकृत कम प्रसिद्ध पुस्तक विक्रेताओं ने उनकी पुस्तकों को रखना स्वीकार किया और उसका रिस्पांस बहुत ही अच्छा रहा. अब अमेजन व फ्लिपकार्ट जैसी ऑनलाइन साइट में भी उनकी पुस्तकें लिस्टेड हैं और बहुत ही अच्छा रिस्पांस मिल रहा है.
सबसे ज्यादा खुशी तब मिलती है, जब गांव की अनपढ़ भाई-बहन इन पुस्तकों को देखती हैं और अपनी परंपरा व संस्कृति को याद करती हैं. प्रकाशित पुस्तकें सभी मेरी लिखित पुस्तकें नहीं हैं. हमने शोध किया है.
हमने लोगों से सुनी-सुनायी आदिवासी गाथाओं, परंपराओं व कहानियों को लिपिबद्ध किया है. हम आदिवासियों पर लिखी सामग्रियों को आमंत्रित करते हैं, साहित्य को आमंत्रित करते हैं और उनका प्रकाशन करते हैं और इस तरह से आदिवासियों की परंपरा को जीवित रखने की कोशिश कर रहे हैं.
कॉरपोरेट फंडिंग नहीं लेती हूं
पुस्तकों का प्रकाशन करना आसान नहीं है. एक कमरे के फ्लैट में वह सब कुछ एक-दो मित्रों के साथ मिलकर करती हैं. फंड एक बड़ी बाधा है. हालांकि कुछ कॉरपोरेट ने उन्हें फंडिंग का प्रस्ताव दिया था, लेकिन मैं कॉरपोरेट फंडिंग नहीं लेती हैं, क्योंकि मेरा मानना है कि जिन लोगों के कारण आज हमारी यह स्थिति है, उसका फंड लेकर मैं कैसे अपनी पुस्तकें प्रकाशित कर सकती हूं.
भविष्य की योजना
मैं आदिवासी वाद्य यंत्र को लेकर एक डॉक्यूमेंट्री भी बना रही हूं. मैं चाहती हूं कि आदिवासी लोककला, साहित्य, संस्कृति, संगीत, गाथाओं को संरक्षित करने के लिए कोई इंस्टीट्यूट या प्लेटफार्म बना सके, जहां न केवल उनका संरक्षण हो, वरन उन पर शोध हो और उनका प्रचार-प्रचार हो, लोगों को आदिवासी साहित्य व संस्कृति में शिक्षित किया जा सके.
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