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शिव मानव के अध्यात्मिक विकास के प्रतिनिधि हैं

Updated at : 06 Aug 2018 9:00 AM (IST)
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शिव मानव के अध्यात्मिक विकास के प्रतिनिधि हैं

स्वामी सत्यानंद सरस्वती भारत में शिवलिंगम् की धारणा बड़ी लोकप्रिय थी. लिंगम् संस्कृत का शब्द है जो द्वयर्थक है. अतएव इस शब्द का गलत अर्थ भी लगाया गया है. लिंगम् शब्द का अर्थ ‘प्रतीक’ है और इसका एक अर्थ ‘पुरुषेन्द्रिय’ है. इस कारण शिवलिंगम् का अर्थ शिव की जननेन्द्रिय लगाया गया है. वास्तव में उसका […]

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स्वामी सत्यानंद सरस्वती
भारत में शिवलिंगम् की धारणा बड़ी लोकप्रिय थी. लिंगम् संस्कृत का शब्द है जो द्वयर्थक है. अतएव इस शब्द का गलत अर्थ भी लगाया गया है. लिंगम् शब्द का अर्थ ‘प्रतीक’ है और इसका एक अर्थ ‘पुरुषेन्द्रिय’ है.
इस कारण शिवलिंगम् का अर्थ शिव की जननेन्द्रिय लगाया गया है. वास्तव में उसका यह अर्थ कदापि नहीं है. शिवलिंगम् का अर्थ कारण रूप में परमचेतना है. प्रत्येक वस्तु के तीन रुप होते हैं, स्थूल, सूक्ष्म और कारण. लिंगम् का अर्थ हुआ कारण शरीर, मतलब, शिव का कारण शरीर. वह क्या है?
इस भौतिक शरीर में 12 केंद्र हैं, जो चेतना के जागरण और विकास के लिए मन को एकाग्र करने हेतु महत्वपूर्ण माने जाते हैं. इन 12 केंद्रों में तीन अति महत्वपूर्ण समझे जाते हैं. एक मूलाधार चक्र मेरुदंड के मूल में स्थित है.
दूसरा आज्ञा चक्र मेरुदंड के शीर्ष पर स्थित है. यह स्थल भ्रूमध्य के पीछे है. तीसरा सहस्त्रार चक्र सिर की चोटी पर अवस्थित है. यह ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क है. ये तीनों बिंदु शिव के सर्वाधिक महत्वपूर्ण रूप समझे जाते हैं.
मूलाधार चक्र में शिव का रूप अंडाकार भूरे रंग का पत्थर है, जिसमें कोई प्रकाश नहीं है. शिव लिंगम् का दूसरा स्थल आज्ञा चक्र है और यह काले रंग का है.
तीसरा स्थल सहस्त्रार चक्र में, मस्तिष्क के शीर्ष भाग में स्थित है जिसे शिवलिंगम् का प्रकाशमान रूप समझा जाता है. शिव की इस अवधारणा ने हिंदुओं को हजारों-हजार वर्षों से स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण और कारण से अनुभवातीत पथ पर गमन के लिए अनुप्रेरित किया है.
कारण यह है कि शिव मानव-जीवन की यौगिक प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करते आये हैं, भौतिक प्रक्रिया का नहीं. पदार्थ के विकास की भी एक प्रक्रिया है, किंतु मानव के आध्यात्मिक विकास के प्रतिनिधि हैं. जिन्होंने इस शैव दर्शन का अवगाहन किया है, वे सहजता से यह समझ सकते हैं कि शिवलिंगम् की इस अवधारणा का संबंध न केवल तुम्हारे शरीर और मन से है, बल्कि इसका संबंध आपके उच्चतम चेतना से है जो प्रकट होना चाहती है. अत: प्रत्येक शिवालय और मंदिर में हिंदुओं ने एक अंडाकार पत्थर को स्थापित किया है जो काले रंग का है. शिवलिंग पत्थर कभी सफेद रंग का नहीं होता है. शरीर के 12 केंद्रों को जाग्रत करने के लिए इस पत्थर पर मन को एकाग्र करते हैं. संक्षेप में शैव – दर्शन का यही अति महत्वपूर्ण भाग है.
भारत में कश्मीर को शैव आराधना का ऐतिहासिक गढ़ माना जाता है. दक्षिण भारत का एक तिहाई भाग भी शैव आराधना का दूसरा महत्वपूर्ण क्षेत्र है. तिब्बत में एक बहुत बड़ा हिमाच्छिादित पर्वत है जो कैलाश पर्वत के नाम से विख्यात है. वह शिवलिंग के आकार का है. चीन द्वारा तिब्बत पर आधिपत्य जमाने के पूर्व हिंदू अपने जीवन-काल में कम से कम एक बार अवश्य कैलाश मानसरोवर हो आया करते थे.
कैलाश पर्वत की तलहटी में एक मानसरोवर नामक झील है जहां मैं खुद भी दो बार गया. कितना प्रेरणाप्रद स्थल है. न वहां कोई मंदिर है, न पुजारी, न कोई मूर्ति और न कोई बस्ती. वह बिल्कुल वीरान है. झील के उत्तरी भाग में कैलाश पर्वत हिममंडित श्रृंखला से हजारों फीट ऊंचा उठा दिखाई देता है.
जब वहां पहुुंचोगे तो महसूस करोगे कि कोई तुम्हें निहार रहा है. तुम्हें कुछ दिखाई नहीं देगा, पर तुम्हें स्पष्ट आभास होगा कि वहां कोई अदृश्य सत्ता विद्यमान है. वह निरपेक्ष सत्ता है. इसी स्थल से शैव योग प्रकट हुआ है. 64 तांत्रिक ग्रंथों में शिव और पार्वती का वार्तालाप वर्णित है. शिव एक गृहत्यागी संन्यासी समझे जाते हैं जिनका न कोई घर है और न ठिकाना. ये निर्जन वीरान में पद्यासन लगाकर समाधि की अवस्था में रहते हैं.
( प्रकाशित पुस्तक योग प्रदीप – 5 से साभार )
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