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पर्यावरण दिवस पर विशेष : मनुष्य की करनी से आयेगा प्रलय

Updated at : 05 Jun 2018 7:22 AM (IST)
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पर्यावरण दिवस पर विशेष  : मनुष्य की करनी से आयेगा प्रलय

निराला बिदेसिया हजारों साल पहले ही वेदव्यास ने जतायी थी चिंता आज पर्यावरण दिवस है. आज को ही केंद्र में रखकर अगर एक ग्रंथ महाभारत की बात करें, तो आज ​जिन विषयों को लेकर दुनिया चिंतित है, उन सबकी चर्चा वेदव्यास ने महाभारत में हजारों साल पूर्व ही की थी. यूं तो महाभारत समंदर है. […]

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निराला बिदेसिया
हजारों साल पहले ही वेदव्यास ने जतायी थी चिंता
आज पर्यावरण दिवस है. आज को ही केंद्र में रखकर अगर एक ग्रंथ महाभारत की बात करें, तो आज ​जिन विषयों को लेकर दुनिया चिंतित है, उन सबकी चर्चा वेदव्यास ने महाभारत में हजारों साल पूर्व ही की थी. यूं तो महाभारत समंदर है.
अनेकानेक प्रसंग हैं जो मानवीय समुदाय की चिंताओं से जुड़ते हैं, लेकिन उसमें एक प्रसंग आज के दिन के हिसाब से मौजू है. भारत के वनपर्व (महाभारत, गीता प्रेस-गोरखपुर, द्वितीय खंड-वनपर्व, मार्कण्डेय-युधिष्ठिर संवाद, पृ.1481-1494) अध्याय में इस पर विस्तार से चर्चा है.
प्रसंग यह है कि युधिष्ठिर मार्कण्डेय ऋषि से कलियुग में प्रलयकाल और उसके अंत के बारे में जानना चाहते हैं. इसका उत्तर मार्कण्डेय ऋषि विस्तार से देते हैं. वे कलियुग के अंत के परिदृश्य के संदर्भ में विस्तार से बताते हैं. वे कहते हैं—
कलियुग के अंतिम भाग में प्राय: सभी मनुष्य मिथ्यावादी होंगे, उनके विचार और व्यवहार में अंतर आयेगा. धरती पर मनुष्य अपनी करनी से प्रलय की संभावना बनायेगा. समय आयेगा जब सुगंधित पदार्थ नासिका में गंधयुक्त प्रतीत नहीं होंगे. रसीले पदार्थ स्वादिष्ट नहीं रहेंगे. वृक्षों पर फल और फूल बहुत कम रह जायेंगे. उन पर बैठनेवाले पक्षियों की विविधता कम होगी, खत्म होगी. वन्य जीव, पशु-पक्षी अपने प्राकृतिक निवास के बजाय नागरिकों के बनाये बगीचों व विहारों में भ्रमण करेंगे, सिमटने लगेंगे.
वन-बाग और वृक्षों को लोग निर्दयतापूर्वक काटेंंगे. भूमि में बोये बीज ठीक प्रकार से नहीं उगेंगे, खेतों की उपजाऊ शक्ति समाप्त होगी, तालाब-चारागाह, नदियों के तट की भूमि पर भी अतिक्रमण होगा. इसका असर पड़ेगा. जनपद जनशून्य होने लगेंगे. चारों ओर प्रचंड तापमान संपूर्ण तालाबों, सरिताओं और नदियों के जल को सुखा देगा लंबे काल तक पृथ्वी पर वर्षा बंद हो जायेगी.
वेदव्यास इस प्रसंग में यहीं तक नहीं रुकते. वे मार्कंडेय ऋषि से इस पर्यावरणीय परिवर्तन का समाज पर पड़नेवाले असर की चर्चा करते हैं. वे लिखते हैं— ऐसी स्थिति में लोग एक जगह से दूसरी जगह पलायित होंगे.
जनपदों की अपनी विशिष्टता खत्म होगी. सभी लोग एक स्वभाव-एक वेषभूषा धारण करने लगेंगे. खाद्यान्न के लिए दूसरों पर निर्भर होगा. थोड़े धन संग्रह कर धनाढ़ वर्ग उन्मत्त हो उठेगा. गृहस्थ लोग शासकीय कर और महंगाई की मार से परेशान और भयभीत होकर लुटेरे बन जायेंगे. समाज के ज्ञानी कपटपूर्ण जीविका चलाने को मजबूर होंगे.
लोग अपनी चिंता ही ज्यादा करेंगे और कैसे भी समृद्धि प्राप्त हो, इसी जुगत मगन रहेंगे. युवक, युवावस्था में ही बूढ़े हो जायेंगे. सोलह वर्ष में ही उनके बाल पकने लगेंगे, उनका स्वभाव बचपन व किशोरावस्था में ही बड़ों जैसा दिखने लगेगा. जब अपना मूल छूट जायेगा तो लोग अपनी-अपनी चिंता में रहेंगे और अधिकांशत: एक-दूसरे को धोखा देनेवाले और गलत शील-स्वभाव वाले हो जायेंगे.
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