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आम छात्रों के बीच भी पहुंचे रंगमंच

Updated at : 15 Dec 2019 4:12 AM (IST)
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आम छात्रों के बीच भी पहुंचे रंगमंच

अमितेश रंगकर्म समीक्षक इस वर्ष की शुरुआत में दिल्ली विवि के एआरएसडी कॉलेज में एक नाट्य समारोह के लिए नुक्कड़ नाटकों की प्रतियोगिता के लिए हो रही स्क्रीनिंग के दौरान मैं मौजूद था. इसमें लगभग 40 कॉलेजों की टीम ने प्रतिभाग किया था.नुक्कड़ नाटक में अपनायी जानेवाली और लगभग क्लीशे बन चुकी रंगभाषा के बीच […]

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अमितेश

रंगकर्म समीक्षक
इस वर्ष की शुरुआत में दिल्ली विवि के एआरएसडी कॉलेज में एक नाट्य समारोह के लिए नुक्कड़ नाटकों की प्रतियोगिता के लिए हो रही स्क्रीनिंग के दौरान मैं मौजूद था. इसमें लगभग 40 कॉलेजों की टीम ने प्रतिभाग किया था.नुक्कड़ नाटक में अपनायी जानेवाली और लगभग क्लीशे बन चुकी रंगभाषा के बीच कुछ कॉलेजों की टीम ने नुक्कड़ की रंगभाषा में नवाचार किया था और कुछ ऐसे विषय उठाये थे, जिन्हें मुख्यधारा का रंगमंच भी नहीं उठा रहा है.
नुक्कड़ नाटक एक राजनीतिक कला है, यानी समकालीन राजनीति को अभिव्यक्त करने का और सत्ता से सच कहने का सबसे सशक्त माध्यम. यह एक वैकल्पिक मनोरंजन भी है, क्योंकि इसके जरिये समाज के उन वर्गों तक पहुंचा जा सकता है, जिन तक प्रोसेनियम रंगमंच की पहुंच नहीं है.
दिल्ली विवि अपने परिसर रंगमंच (कैंपस थियेटर) के लिए जाना जाता है. किरोड़ीमल कॉलेज की प्लेयर्स, हिंदू कॉलेज की इब्तिदा और अभिरंग, जीटीबी खालसा काॅलेज की अंकुर, सेंट स्टीफेंस की द शेक्सपियर सोसाइटी इत्यादि समेत बहुत से कॉलेजों के रंग समूहों ने उत्कृष्ट मंचीय प्रस्तुतियां की हैं.
इन परिसरों से कई बेहतरीन समीक्षक और आलोचक भी निकले हैं, जिन्होंने एक अलग तरीके से रंगमंच को समृद्ध किया है. जेएनयू में भी बहुरूप जैसी संस्था ने परिसर रंगमंच का मानक गढ़ा है.
परिसर में रंगमंच पर कोई व्यावसायिक या कलात्मक दबाव नहीं रहता, तो यह साहस रहता है कि कलात्मकता और अभिव्यक्ति के क्षेत्र में प्रयोग किये जाते रहें.
परिसर में युवाओं के बीच की जानेवाली रंगमंचीय गतिविधियों का लाभ बहुमुखी है. एक तो सृजनशील रंगकर्मी तैयार होते हैं, जो परिसरों से बाहर निकलने के बाद मुख्यधारा के रंगमंच में अपनी जगह बनाते हैं. दूसरा, ऐसे दर्शक तैयार होते हैं, जिनकी नाटक देखने की आदत विकसित होती है.
इलाहाबाद विवि में जहां परिसर रंगमंच की समृद्ध परंपरा रही है और जिसका लगभग अवसान हो चुका था, उसे यूनिवर्सिटी के छात्रों ने पुनर्जीवित कर यूनिवर्सिटी थियेटर के नाम से समूह बनाया, साल भर के भीतर पचास छात्र इससे जुड़े और तीन प्रस्तुतियां की. जिसके अंतर्गत कहानी और कविता का मंचन किया और गांधी जी की डेढ़ सौवीं जयंती के उपलक्ष्य में प्रस्तुति की ‘जब वी मेट गांधी’.
इस प्रस्तुति का आलेख छात्रों ने ही तैयार किया था. इस पूरी प्रक्रिया में अपने अनुभव और अध्ययन से कैसे अपने ज्ञान का विस्तार किया जाता है, यह सब सीखा और इस ज्ञान को मनोरंजन में ढाल कर समाज और अपने जैसे अन्य विद्यार्थियों को प्रशिक्षित भी किया.
छात्रों की प्रतिभा को पठन-पाठन के साथ रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ने की जरूरत है, खासकर हिंदी प्रदेश के छात्रों की, जहां करियर का दबाव छात्रों पर अधिक हावी रहता है. इसका मतलब यह नहीं है कि विश्वविद्यालयों में केवल नाट्य विभागों के जरिये यह काम किया जाये, बल्कि आम छात्रों के बीच रंगमंच को प्रोत्साहन देना चाहिए. हालत यह है कि अधिकांश जगह इस तरह की कोई पहल नहीं होती.
पटना विवि जो कभी रंगमंचीय गतिविधियों का सक्रिय परिसर था, वहां से रंगमंच की कोई खबर नहीं मिलती. ऐसे समय में जब शिक्षा के संस्थान ही तरह-तरह के संकटों से जूझ रहे हैं, शिक्षकों के अभाव में नियमित कक्षाएं नहीं लग पा रही हैं, छात्र के सामने समस्याओं का अंबार लगा है, तब शैक्षिक परिसर को बचाना ही मुश्किल लग रहा है.
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