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आमजनों का चित्रकार लोवे कय्याली

Updated at : 06 Jan 2019 7:30 AM (IST)
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आमजनों का चित्रकार लोवे कय्याली

अशोक भौमिक चित्रकार पूरे विश्व में चित्रकला के इतिहास का एक विशाल हिस्सा देवी-देवताओं, राजा-रानियों, धनिकों, वीरों, नेताओं और नायकों के चित्रों का है. ऐसे चित्र अपने निर्धारित संदर्भों, ऐतिहासिक तथ्यों और वर्णनों से जुड़े रहते हैं. पर इसके सामानांतर, भले ही संख्या में कम हो; आम लोगों के चित्र भी हमें मिलते हैं. ऐसे […]

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अशोक भौमिक
चित्रकार
पूरे विश्व में चित्रकला के इतिहास का एक विशाल हिस्सा देवी-देवताओं, राजा-रानियों, धनिकों, वीरों, नेताओं और नायकों के चित्रों का है. ऐसे चित्र अपने निर्धारित संदर्भों, ऐतिहासिक तथ्यों और वर्णनों से जुड़े रहते हैं. पर इसके सामानांतर, भले ही संख्या में कम हो; आम लोगों के चित्र भी हमें मिलते हैं.
ऐसे चित्रों में चित्रित स्त्री, पुरुष और बच्चों का विस्तृत परिचय हम शायद न जानते हों, पर इन्हें पहचानने में हमें कठिनाई नहीं होती है. हम आसानी से किसी चित्र में खेत में काम कर रहे किसान को या कारखाने के मजदूर को पहचान लेते हैं, बावजूद इसके कि हम उनका नाम या अन्य कोई अतिरिक्त परिचय नहीं जानते.
ऐसे ही आम परिचय विहीन लोगों को अपने चित्रों में जिन आधुनिक चित्रकारों ने बखूबी से चित्रित किया है, उनमें सीरियाई चित्रकार लोवे कय्याली का नाम बेहद महत्वपूर्ण है.
लोवे कय्याली का जन्म सीरिया के एलेप्पो शहर में 1934 में हुआ था. बचपन से ही कय्याली इतने मेधावी थे कि महज 11 वर्ष की आयु में ही उन्होंने विधिवत चित्रकला की शिक्षा लेना आरंभ कर दिया था और जब अपने चित्रों की पहली एकल प्रदर्शनी की, तब वे केवल 18 वर्ष के थे. कय्याली, बाद में इटली जाकर चित्र कला में अपनी पढाई पूरी की.
साल 1965 में फिलिस्तीन अरब शरणार्थियों की व्यथा-कथा को कय्याली ने लकड़ी पर तैलरंग से इस चित्र को गहरी संवेदना के साथ चित्रित किया था. इस चित्र में आठ औरतें, एक पुरुष, एक बच्ची और एक किशोर है.
चित्र में सभी ग्यारह शरणार्थी नंगे पैर दिख रहे हैं, जो उनके अपने घरों को छोड़ने की मजबूरी को दर्शाते हैं. अपने साथ बिना कुछ लाये खाली हाथ, बिना जूतों के भागने को मजबूर इन शरणार्थियों के चेहरों पर अनिश्चयता के भाव स्पष्ट हैं. पुरुष के झुके हुए कंधों से दो असमर्थ हाथ मानों लटक रहे हैं, जबकि अन्य सभी आठों औरतों और एक बच्ची के चेहरे पर भय की काली परछाईं ठहरी हुई है, लेकिन चित्र में किशोर की निर्वाक किंतु आत्मविश्वास भरी उपस्थिति दर्शकों को अलग से आकर्षित करती है. यह बच्चा शायद इस बुरे वक्त में भी बेहतर कल के सपने देखने की हिम्मत कर पा रहा है.
यह सच है कि इस ग्यारहों शरणार्थियों के पास कोई भी सामान नहीं है, पर यह लड़का अपने हाथों में बड़े जतन से एक कबूतर को संभाले हुए है. युद्ध की विभीषिका में बच्चे के हाथों में श्वेत शांति दूत, इस विषाद से (और शायद विलाप से भी) भारी, चित्र में एक सकारात्मक तरंग बन अपनी उपस्थिति दर्ज करता है.
चित्र लगभग चौकोर है और संरचना की दृष्टि से चित्र का अधिकांश हिस्सा शरणार्थियों के कपड़ों का है, जो सभी एक रंग के होने के कारण एक-दूसरे से मिल कर चित्र के विस्तृत मध्य भाग को लगभग एक सपाट काले हिस्से के रूप में दिखते हैं. शरणार्थियों के चारों ओर पीले रंग की सीमित पृष्ठभूमि चित्र की संरचना में एक घुटन पैदा करता है, जो चित्र के मूल भाव को और भी ज्यादा प्रभावशाली बनाता है.
अरब क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण जनपक्षधर चित्रकार लोवे कय्याली एक ऐसे चित्रकार के रूप में याद किये जाते हैं, जिन्होंने अपने चित्रों में गरीब किसानों, मछुवारों, लाचार लोगों, मेहनती महिलाओं और मजबूर बच्चों को चित्रित किया.
आमजनों के प्रति इस प्रेम के लिए उनके चित्रों को ‘निराशावादी’ कहा गया और उन्हें कटु आलोचना सहनी पड़ी. साल 1967 में दमस्कस अरब सांस्कृतिक केंद्र में उन्होंने युद्ध प्रभावित लोगों के सहायतार्थ अपनी एकल प्रदर्शनी लगायी. प्रदर्शनी में उनके चारकोल माध्यम से बने 30 चित्र प्रदर्शित थे. बावजूद कय्याली के इस ईमानदार पहल के, समीक्षकों और उनके साथी चित्रकारों ने प्रदर्शनी की तीव्र आलोचना की. ऐसे अप्रत्याशित प्रतिक्रिया से क्षुब्ध कय्याली ने प्रदर्शनी के अंत में, ‘युद्ध क्षेत्र में एक आदमी’ शीर्षक के चित्र को छोड़कर अन्य सभी चित्रों को जला कर नष्ट कर दिया था.
इस घटना के बाद लोवे कय्याली मानसिक रूप से अस्वस्थ रहने लगे थे और एक लंबे समय के लिए उन्होंने चित्रकला से संन्यास ले लिया था. विश्व कला जगत साल 1978 में कय्याली की मृत्यु के बाद ही उनके महत्व को जान सका, साथ ही एक ऐसे चित्रकार के संपूर्ण कलाकर्म से परिचित भी हो सका, जो पूरी तरह से आमजनों के प्रति समर्पित था.
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