उम्मीदों के पहाड़ के बोझ से बचपन बचाइए

Updated at : 22 Jun 2014 1:08 PM (IST)
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उम्मीदों के पहाड़ के बोझ से बचपन बचाइए

बच्चों पर बड़ों की उम्मीदों का पहाड़ लदा है. वे उसके नीचे दबे हुए हैं. कोई व्यक्ति जब अपने जीवन में खुद के तय किये लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाता तो उसे अपने बच्चों के कोमल कंधे पर थोप देता है. बच्चे के खुद के सपने, सोच और चाह इसके नीचे दब जाते हैं. […]

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बच्चों पर बड़ों की उम्मीदों का पहाड़ लदा है. वे उसके नीचे दबे हुए हैं. कोई व्यक्ति जब अपने जीवन में खुद के तय किये लक्ष्य को पूरा नहीं कर पाता तो उसे अपने बच्चों के कोमल कंधे पर थोप देता है. बच्चे के खुद के सपने, सोच और चाह इसके नीचे दब जाते हैं. मां-बाप बच्चे की शिकायत शिक्षक से करते हैं और शिक्षक मां-बाप से. घर और स्कूल दोनों उसके लिए यातना गृह बन जाते हैं. मां-बाप बच्चे से यह उम्मीद करते हैं कि वह पढ़ कर डॉक्टर बने, इंजीनियर बने या पैसे बनाने वाले किस अन्य पेशे में जाये. जबकि उसे सबसे पहले एक अच्छा इनसान और स्वतंत्र व्यक्तित्व का स्वामी बनाया जाना जरूरी है. उसके बाद वह अपनी इच्छा, रुचि व क्षमता के अनुसार किसी पेशे में जा सकता है.

बढ़ाये बच्चों का जीवन कौशल
बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था प्लान इंडिया के अनूप होरे कहते हैं बच्चों के विकास के लिए जरूरी है कि सबसे पहले उनका जीवन कौशल बढ़ाया जाये. उनके अनुसार, कोई मां-बाप बच्चों पर अत्याचार नहीं करना चाहता है और अगर वह ऐसा कर रहा है तो इसके मूल में कोई और कारण होगा. यानी अगर मां-पिता बच्चे को पढ़ाई के लिए पीटते हैं, तो इसका कारण यह हो सकता है कि उनकी अपेक्षा होगी कि वह पढ़ेगा नहीं तो अच्छी नौकरी नहीं मिलेगी, जो उनके परिवार के लिए अच्छा नहीं होगा. होरे कहते हैं कि बच्चों के साथ होता यह है कि स्कूल में यह समझा जाता है कि उसको जीवन कौशल के बारे में घर में बताया जाता होगा और घर के लोग सोचते हैं कि यह चीज स्कूल में बतायी जा रही होगी. ऐसे में दूसरे तरह के कौशल के विकास के लिए उस पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है.

बच्चों की न करें अधिक देखभाल
मनोविज्ञानी भी मानते हैं कि बच्चों के आसपास अधिक व्यापक व कड़ा सुरक्षा कवच बनाना उनके व्यक्तित्व के लिए खतरनाक होता है. बच्चे भी नन्हें पौधे की तरह होते हैं. जैसे अधिक घेराबंदी पौधे के विकास में रोड़ा बनती है, वैसा ही हाल बच्चों का भी होता है. बाल मनोविज्ञान की समझ रखने वाले अनूप होरे कहते हैं कि अगर आप बच्चे की अधिक देखभाल करेंगे, तो हो सकता है वह आगे जाकर खुले नहीं. इसलिए उसे खुला छोड़ दें. हर बच्चे के जीवन में एक डिस्कवरी फेज (खोज करने का दौर) आता है. जब बच्च इस फेज या दौर से गुजर रहा है, तो उसे रोकना नहीं चाहिए. बच्चों का ज्यादा निर्देश देना भी उनके विकास के लिए अच्छा नहीं होता है. आप उनके चिंतन को समङों और उसी अनुरूप उसके विकास की राह तैयार करें.

नंबर को सफलता की सीढ़ी मानना गलत
स्कूल में अधिक नंबर लाना ही बच्चे की सफलता की सीढ़ी है, यह धारणा गलत है. इस धारणा ने बच्चों का बड़ा नुकसान किया है. स्कूल से लेकर घर तक वे इस कारण मानसिक व शारीरिक रूप से प्रताड़ित होते रहे हैं. सामान्य शैक्षणिक पृष्ठभूमि के बहुत सारे बच्चों ने जीवन की ऊंचाइयों को छुआ है. इस धारणा को खत्म करने के लिए सरकार भी पहल कर रही है. इसलिए अब बच्चों के लिए ग्रेडिंग सिस्टम लागू किया जा रहा है. यानी उन्हें ग्रेड दिया जा रहा है. इससे थोड़े नंबर के फासले के कारण बच्चों के अंदर हीन भावना नहीं उत्पन्न हो पायेगी और घर वाले या शिक्षक भी उसे उसके लिए प्रताड़ित नहीं कर सकेंगे.

बच्चों को नैतिक शिक्षा देना जरूरी
बच्चों के व्यक्तित्व विकास के लिए यह आवश्यक है कि उसे नैतिक शिक्षा दी जाये. उसे अच्छे और बुरे का भेद बताया जाये. अगर उसके सामने भ्रष्टाचार के माध्यम से काफी पैसा बनाने वालों का महिमा-मंडन करेंगे, तो वह उसे सफल मानेगा और समाज की नजर में आने के लिए वैसा ही बनना चाहेगा. बच्चे को सच व झूठ का भेद व उसके परिणाम बताना भी जरूरी है. उसके सामने समाज के सच्चे व ईमानदार लोगों को नायक के रूप में पेश करना ही बेहतर है, भले वह व्यक्ति बहुत पैसे वाला व ऊंचे पद न हो. छोटी उम्र के बच्चों पर बहुत दबाव डालना भी उचित नहीं है.

बाल नेतृत्व से ही आयेगा बच्चों की स्थिति में बदलाव
नियमत: हर गांव में एक बाल सुरक्षा समिति बननी चाहिए. जिसकी जिम्मेवारी होनी चाहिए कि वह बच्चों के सभी मुद्दों पर नजर रखे. पर, अबतक ज्यादातर गांवों में बाल सुरक्षा समिति नहीं बन पायी है. जिन गांवों में बाल सुरक्षा समिति बनी भी है, उसमें बच्चों के लिए कोई जगह नहीं है. जबकि सैद्धांतिक तौर पर बाल सुरक्षा समिति में एक लड़के व एक लड़की को शामिल किया जाना चाहिए. यह माना जाता है कि बच्चे बच्चों को समस्या को सबसे बेहतर ढंग से समझते हैं. स्कूल में कक्षाओं का नेतृत्व शिक्षक नहीं करते हैं, बल्कि कक्षा का मॉनीटर करता है. शिक्षक पर सिर्फ शैक्षणिक काम की जिम्मेवारी होती है. जबकि मॉनीटर अपनी कक्षा के 100-150 बच्चों का नेतृत्व करता है. वह शिक्षक के नहीं रहने की स्थिति में उन्हें अनुशासित रखता है. उनके कक्षा के अंदर व बाहर जाने पर नजर रखता है और तमाम तरह का आयोजन करता है, उसके लिए चंदा भी इकट्ठा करता है.

पूरे स्कूल के लिए यह काम सबसे सिनियर कक्षा का एक छात्र हेड ऑफ स्टूडेंट या छात्रों का अगुवा बन कर करता है. यानी यह व्यवस्था बच्चों के भीतर से बच्चों का नेतृत्व विकास करने के लिए है. ऐसे में पंचायत के मुखिया-वार्ड मेंबर को भी यह ध्यान देना चाहिए कि वह अपने गांव में बाल सुरक्षा समिति बनवायें और उसमें अनिवार्यत: एक लड़के व एक लड़की को शामिल करायें. इसके पीछे यह भी एक सिद्धांत है कि बच्चे अपने मां-पिता व परिवार वाले से भी अधिक बातें अपने हमउम्र मित्र से साझा करते हैं. यानी समिति में ऐसे बच्चों के रहने का अधिक लाभ होगा. बच्चों के लिए काम करने वाली संस्था प्लान इंडिया ने झारखंड के गांवों में इस तरह के कुछ प्रयोग किये हैं. बच्चों को विद्यालय प्रबंधन समिति में भी इसी तरह ध्यान देना चाहिए. यह भी आवश्यक है कि हर स्कूल में बाल संसद का गठन हो. हजारीबाग, खूंटी, चाईबासा में इस तरह के कुछ प्रयोग हुए हैं. प्लान इंडिया ने एक पहल की है कि 60 गांवों से एक-एक लड़के-लड़की का चयन किया है और उन 120 बच्चों को 30-30 के समूह में बांट कर प्रशिक्षण दिया है. उन बच्चों के जीवन कौशल का विस्तार करने के बाद उन्हें उनके समुदाय व समाज के बीच भेज दिया जाता है. अब वे अपनी सीख व अनुभव से दूसरे बच्चों को प्रभावित करते हैं. जैसा कि प्लान इंडिया के अनूप होरे बताते हैं कि यह देखने में आया है कि इस प्रक्रिया के बाद जिस गांव के पांच बच्चे पहले बाहर जाते थे, अब वहां से तीन बच्चे बाहर जा रहे हैं. यह एक सकारात्मक बदलाव है. इस तरह की पहल को व्यापक विस्तार देने की जरूरत है.

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