जापानी सिनेमा में नयी चमक
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :02 Dec 2018 8:16 AM (IST)
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अजित राय संपादक, रंग प्रसंग, एनएसडी इस समय जिस जापानी स्त्री फिल्मकार की दुनिया में चर्चा है, उनका नाम है- नाओमी क्वासे. साल 2020 में होनेवाले टोक्यो ओलिंपिक पर फिल्म बनाने के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने चुन लिया है. उनकी फिल्में न सिर्फ कान फिल्मोत्सव में पांच बार मुख्य प्रतियोगिता खंड के लिए […]
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अजित राय
संपादक, रंग प्रसंग, एनएसडी
इस समय जिस जापानी स्त्री फिल्मकार की दुनिया में चर्चा है, उनका नाम है- नाओमी क्वासे. साल 2020 में होनेवाले टोक्यो ओलिंपिक पर फिल्म बनाने के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने चुन लिया है. उनकी फिल्में न सिर्फ कान फिल्मोत्सव में पांच बार मुख्य प्रतियोगिता खंड के लिए चुनी गयी हैं, बल्कि वे खुद 2013 में जूरी की सदस्य और 2016 में सिनेफाउंडेशन और शार्ट फिल्म की जूरी की अध्यक्ष रह चुकी हैं.
उन्होंने अपनी बेमिसाल फिल्मों से यह साबित किया है कि स्त्री जब कैमरा उठाती है, तो सिनेमा बदलने लगता है. क्वासे सबसे कम उम्र में प्रतिष्ठित कान फिल्म समारोह में अपनी पहली ही फिल्म ‘सुजाकू’ के लिए (1997) ‘कैमरा डि ओर’ (बेस्ट न्यू डायरेक्टर) पुरस्कार जीत चुकी हैं. साल 2007 में उन्हें ‘मॉरनिंग फॉरेस्ट’ के लिए ‘ग्रैंड प्रिक्स’ पुरस्कार भी मिल चुका है.
क्वासे की नयी फिल्म ‘हिकारी’, जिसे अंग्रेजी में ‘रेडियंस’ (चमक) कहते हैं, आधुनिक जापानी सिनेमा में मील का पत्थर बनने की राह पर है. अपनी पिछली फिल्मों- ‘स्टील द वाटर’ (2014) और ‘स्वीट बींस’ (2015) की भावभूमि का विस्तार करते हुए उन्होंने आश्चर्यजनक मेलोड्रामा रचा है.
एक लगभग अंधे हो चुके फोटोग्राफर मासाया नाकामोरी (माजातोसी नगाशे)और अंधे लोगों के लिए फिल्मों का वर्णन लिखनेवाली उत्साही लड़की मिसाको ओजाकी (अयामें मिसाकी) की दोस्ती के आईने में दिन-रात, जंगल-समुद्र, गांव-शहर, धरती-आकाश को देखने में रोशनी की चमक को महसूस किया जा सकता है. नगीसा ओशीमा की बहुचर्चित फिल्म ‘द रेल्म आफ द सेंसेज’ (1976) के नायक तत्सुआ फुजी की उपस्थिति फिल्म को काव्यात्मक बनाती है.
नाओमी क्वासे ने अंधे हो रहे नायक की संवेदना से ध्वनियों का कोलाज रचा है. हवा-पानी-लहर से लेकर कैमरे की क्लिक और प्रकृति की हर आवाज से दृश्य बनाने की कोशिश की है.
एक फिल्म शो में दोनों मिलते हैं और चित्रों के जरिये अपने-अपने अतीत का वह चमकदार संसार देखते हैं, जो अब तक उनसे ओझल था. वह कहता है- ‘हमारी आंखों के सामने जो गायब हो जाता है, उससे अधिक खूबसूरत कुछ भी नहीं है.’
एक मार्मिक दृश्य में सड़क पर गिरने के बाद एक युवक उसका कैमरा लेकर भाग जाता है. वह उसके स्टूडियो जाकर कैमरा वापस छीनते हुए कहता है- ‘कैमरा मेरा दिल है, भले ही मैं इसे इस्तेमाल नहीं करता.’ उसकी पत्नी उसको छोड़ गयी है. उसके पास अतीत की सुनहरी यादें हैं, जब वह फोटोग्राफी का नायक था. उसकी आंखों में जो रोशनी बची है, कैमरा वहां से चीजों को दिखाता है.
वह अपनी रोजमर्रा की गतियों में विलक्षण है. मिसाको आोजाकी को बार-बार अपनी सनकी मां से मिलने गांव जाना पड़ता है, जो अपने मृत पति की वापसी की उम्मीद लिये बैठी है. उन दोनों का सूर्यास्त के समय का एक फोटो फिल्म में पार्श्व संगीत की तरह है. मिसाको अंधे लोगों के लिए ‘रोमांस’ फिल्म की कमेंट्री लिखते हुए कब सिनेमा का हिस्सा बन जाती है, पता ही नहीं चलता. कई बार सिनेमा का सब कुछ पर्दे से उतरकर हमारी जिंदगी में आ जाता है. क्वासे कहती भी हैं- ‘मैं चाहती हूं कि मेरा सिनेमा दर्शक तक उम्मीद का सच्चा अहसास पहुंचाये.’
पुरुष वर्चस्व वाली जापानी फिल्म उद्योग में नाओमी क्वासे ने हिम्मत से अपनी जगह बनायी है. उन्होंने जापानी सिनेमा के पारंपरिक फ्रेम को तोड़ा है. उनके यहां कल्पना और यथार्थवादी डाॅक्यूमेंट्री का संगम मिलता है, जिसमें उनकी फिल्में सच्ची कहानियों पर आधारित लगती हैं. वे संकीर्ण राजनीतिक और स्त्रीवादी विचारधारा से परे सिनेमा में बड़े बदलावों को संभव बनाती हैं.
यहां सेक्स, हिंसा, कौतुक, मार्शल आर्ट्स और ऐतिहासिक आख्यानों की जगह चरित्र और रिश्तों की केमिस्ट्री को महत्व दिया जाता है. पूंजीवादी सभ्यता के अतिरेकी मुकाम पर पहुंचे जापानी समाज के लिए नाओमी क्वासे की फिल्में मशीन से मनुष्य बनने की प्रक्रिया की ओर ले जाती हैं.
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