ePaper

''ख़ुदा करे, यह दंगा आखि़री साबित हो''

Updated at : 26 Nov 2018 5:39 PM (IST)
विज्ञापन
''ख़ुदा करे, यह दंगा आखि़री साबित हो''

"सीतामढ़ी में अमूमन हर साल दशहरे के समय छिटपुट हिंसा की घटना होती है. लेकिन, इस साल स्थिति इतनी भयानक होगी, इसका अंदाज़ा नहीं था. ग़लती प्रशासन की थी. जब पहले दिन ही झड़प हो गयी थी तो दशहरे के दिन अतिरिक्त बल को तैनात क्यों नहीं किया गया? इनकी ग़लती ने एक बुज़ुर्ग की […]

विज्ञापन

"सीतामढ़ी में अमूमन हर साल दशहरे के समय छिटपुट हिंसा की घटना होती है. लेकिन, इस साल स्थिति इतनी भयानक होगी, इसका अंदाज़ा नहीं था. ग़लती प्रशासन की थी. जब पहले दिन ही झड़प हो गयी थी तो दशहरे के दिन अतिरिक्त बल को तैनात क्यों नहीं किया गया? इनकी ग़लती ने एक बुज़ुर्ग की जान ले ली. ख़ुदा करे, यह दंगा आखि़री साबित हो".

यह मानना है एक स्थानीय व्यवसायी का, जो अपनी पहचान ज़ाहिर करना नहीं चाहते.

दरअसल, बिहार की राजधानी पटना से क़रीब 170 किमी. उत्तर में स्थित सीतामढ़ी में 20 अक्तूबर को उग्र भीड़ ने लगभग 82 साल के एक बुज़ुर्ग ज़ैनुल अंसारी को चाक़ू मारने के बाद ज़िंदा जला दिया था.

उसी दिन भीड़ के दूसरे शिकार इसी गांव के मोहम्मद साबिर अंसारी बने थे.

पेशे से मज़दूर लगभग 65 साल के साबिर दवा ख़रीदकर आ रहे थे तभी उन पर हमला हुआ.

मोहम्मद साबिर कहते हैं, "जख़्म इतना गहरा था कि अस्पताल में मुझे कुल 36 टांके लगे. किसी तरह जान बच गई".

क्या हुआ था उस दिन

भोड़हा गांव के पूर्व मुखिया और मृत ज़ैनुल अंसारी के रिश्तेदार नन्हें अंसारी उस दिन की घटना के बारे में बताते हैं, "सुबह क़रीब दस-ग्यारह बजे मैं भोड़हा से मधुबन जाने के लिए निकला. गांव से क़रीब दस किमी. दूर गौशाला चौक पर देखा की बड़ी बाज़ार पूजा समिति की मां काली की मूर्ति ट्रक पर विसर्जन के लिए जानकी स्थान से आ रही है. मैं वहीं रुक गया. वहां से भीड़ पूरब की ओर मुरलियाचौक की ओर मुड़ गयी."

"लेकिन, कुछ ही देर में हल्ला हुआ कि हंगामा हुआ है, यहां से भागो. मैं गांव के चौक पर वापस आकर लोगों को उधर जाने से रोकता रहा. शाम में किसी ने सूचना दी कि गौशाला चौक के समीप किसी व्यक्ति को दंगाइयों ने ज़िंदा जला दिया है. दूसरे दिन (21 अक्तूबर) रीगा थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करायी. इसके बाद वरीय अधिकारियों से मिलकर मैंने अपनी बात उन्हें बतायी."

"ज़िलाधिकारी ने मुझसे कहा कि हम लोगों ने एक जली हुई लाश बरामद की है. आप मुज़फ़्फ़रपुर अस्पताल जाकर उसकी पहचान कर लीजिये. मैं वहां गया, लेकिन लाश इस क़दर जली हुई थी की उसको पहचान नहीं पाया. 22 अक्तूबर को एक घंटे के लिए इंटरनेट बहाल हुआ. इसके बाद एक तस्वीर वायरल हुई, जिसमे एक बुज़ुर्ग को जलाते हुए दिखाया गया था."

नन्हें अंसारी कहते हैं, "हमने दलितों से ऐसी उम्मीद कभी नहीं थी, लेकिन ऐसा हुआ. यह हमारी समझ से परे है. ख़ैर, मैंने डीएम को वह तस्वीर दिखाई और तब शव की पहचान हुई. प्रशासन ने दो बस उपलब्ध कराईं और हम लोगों ने मुज़फ्फ़रपुर जाकर शव का कफ़न-दफ़न किया".

मृतक ज़ैनुल अंसारी के बड़े बेटे अख़लाक़ अंसारी सूरत, गुजरात में दर्ज़ी का काम करते हैं.

अख़लाक़ कहते हैं कि उन्हें सूरत गए हुए महज़ तीन दिन ही हुए थे कि उन्हें इस घटना की जानकारी मिली. किसी बुज़ुर्ग के साथ कोई ऐसा कैसे कर सकता है.

हनुमान की प्रतिमा विसर्जन पर हंगामा

स्थानीय लोगों के मुताबिक़ पहली झड़प 19 अक्तूबर को उस वक़्त हुई थी जब मधुबन गांव से भगवान हनुमान की प्रतिमा विसर्जन के लिए चली.

मुरलियाचौक गांव में ज़ोरदार पत्थरबाज़ी हुई, लेकिन ज़िला प्रशासन ने इसे समय पर नियंत्रित कर लिया था .

ठीक दूसरे दिन काली पूजा समिति, मिरचैया बाज़ार ने मूर्ति के विसर्जन के लिए जानकी स्थान- गौशालाचौक- मुरलियाचौक का रास्ता तय किया.

काली पूजा समिति मूर्ति का विसर्जन वैशाली ज़िले के पहलेजा घाट में करती है.

स्थानीय लोगों के अनुसार समिति ने पांच साल तक पहलेज़ा घाट पर मूर्ति विसर्जन की मान्यता मान रखी है. यह तीसरा वर्ष था.

स्थानीय पत्रकार उमेश चंद्र झा के अनुसार, "पहले दिन समझा-बुझाकर मामला शांत करा लिया गया था. दूसरे दिन काली पूजा समिति की मूर्ति को प्रशासन की जगह अल्पसंख्यक समाज के लोगों ने रोका. लोग मान नहीं रहे थे. फिर प्रशासन ने बीच-बचाव किया और प्रतिमा को लौटा दिया गया. इस विवाद का अंकुरण हो गया और दोनों ओर से जमकर टकराव हुआ."

"इसी बीच एक बुज़ुर्ग की हत्या ने भीड़ उग्र कर दी. प्रशासन की ओर से पीड़ित के परिवार को पांच लाख रुपये दिए गए. काली पूजा समिति के आयोजकों ने ज़िला प्रशासन से पूजा की अनुमति प्राप्त की थी या नहीं, यह फ़िलहाल पता नहीं चला है".

गाड़ियां जलीं, दुकानें लूटी गईं

विजयादशमी के दिन सीतामढ़ी शहर के इस इलाक़े में हर चौक-चौराहे पर भारी भीड़ जमा रही. कई गाड़ियां जलाई गयीं और दुकानें लुटी गईं.

प्रशासन की ओर से कम से कम दस राउंड फ़ायर और आंसू गैस के गोले छोड़े गए.

पूरे शहर में 20 से 31 अक्तूबर तक धारा 144 लगी रही और पांच दिनों तक इंटरनेट सेवा बंद रखी गयी.

समूचे मामले में नगर थाना, सीतामढ़ी में कुल पांच प्राथमिकी दर्ज की गयी है. 35 लोगों को हिरासत में लिया गया है.

स्थानीय जानकार बताते हैं कि सीतामढ़ी शहर और आसपास के इलाक़ों में 1992 के बाद से लगभग हर साल कहीं न कहीं सांप्रदायिक तनाव की छोटी-बड़ी घटनायें होती रही हैं. प्रशासन जब-जब ढीला-ढाला रवैया अपनाता है, तब-तब हालात बेक़ाबू होते हैं.

इस साल भी यही हुआ, लेकिन इसके लिए किसी की ज़िम्मेदारी तय नहीं की गयी.

कोई नहीं कह सकता कि सीतामढ़ी का कौन-सा दंगा आख़िरी होगा.

ये भी पढ़ें:

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

]]>

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola