ग्राउंड रिपोर्ट: सूखे बिहार में इस बार का छठ “पर्व” जैसा नहीं है, क्यों?

Published at :13 Nov 2018 11:00 AM (IST)
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ग्राउंड रिपोर्ट: सूखे बिहार में इस बार का छठ “पर्व” जैसा नहीं है, क्यों?

‘नहाय-खाय’ के साथ रविवार से छठ का पर्व शुरू हो चुका है. छठ की परंपरा के अनुसार ‘नहाय-खाय’ के दिन से ही व्रत करने वाले चार दिनों का अनुष्ठान शुरू करते हैं. व्रत करने वाले इस दिन जहां संभव होता है गंगा या किसी नदी के जल से या फिर जहां इंतजाम होता है वहां […]

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‘नहाय-खाय’ के साथ रविवार से छठ का पर्व शुरू हो चुका है. छठ की परंपरा के अनुसार ‘नहाय-खाय’ के दिन से ही व्रत करने वाले चार दिनों का अनुष्ठान शुरू करते हैं.

व्रत करने वाले इस दिन जहां संभव होता है गंगा या किसी नदी के जल से या फिर जहां इंतजाम होता है वहां कुंआ अथवा पोखरे के जल से नहाने के बाद लौकी (कद्दु)-चने की दाल की सब्जी और रोटी खाकर खुद को व्रत के लिए शुद्ध करते हैं.

फिर अगले दिन (खरना के दिन) अरवा चावल- गुड़ वाली खीर और रोटी के प्रसाद को सूर्य को चढ़ाने के बाद व्रत करने वाले खुद भी ग्रहण कर छठ का निर्जला उपवास शुरू करते हैं.

भोजपुर के किसान उदय पासवान के यहां भी छठ का पर्व मनाया जा रहा है. लेकिन वे इस बार खुद व्रत नहीं कर पा रहे हैं. हालांकि, उनकी पत्नी इस बार भी व्रत कर रही हैं.

उदय ने पिछले साल पत्नी के साथ खुद भी छठ का व्रत रखा था.

उदय पासवान कहते हैं, "हम धान पटाने के लिए लाइन लगाए हैं. आज-कल में कभी भी लाइन आ जाएगा. अभी दो बार धान का पटवन (सिंचाई) करना है. यही दो-चार दिन है हाथ में. धान में फर (दाना) लगेगा. सूर्य भगवान की महिमा रही तो अगले साल छठ करेंगे."

भोजपुर के चातर गांव के उदय पासवान ने मालगुजारी पर ज़मीन लेकर ढाई बीघा में धान की खेती की है.

पंद्रह कट्ठे में मक्का भी बोया था लेकिन पानी की कमी के कारण मक्के की फसल खेत में ही सूख चुकी है.

धान की फसल पर पूरे साल का घर टिका था, सूखा होने के बावजूद भी चौदह पटवन देकर धान की फ़सल को बचाए हैं.

पासवान कहते हैं, "जो भी धान अभी बधार में दिख रहा है किसी में सोलह-सत्रह पटवन से कम नहीं लगा है. मेरे पास उतनी पूंजी नहीं थी कि सबकी बराबरी कर सकूं. यहां तो सैकड़ों बीघा फसल खेत में ही सूख चुकी है."

सूखे से ग्रस्त बिहार

ये हाल केवल भोजपुर के किसान उदय का नहीं बल्कि बिहार के लाखों किसानों का है. क्योंकि बिहार में इस साल सूखा है.

सरकार का कृषि विभाग इस सूखे की तुलना 1967 के अकाल से कर चुका है. अगर सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो कुल 38 जिलों में से 24 जिले सूखाग्रस्त घोषित किए जा चुके हैं. करीब 276 प्रखंडों इस सूखे की चपेट में हैं.

15 अक्तूबर को बिहार कैबिनेट ने बिहार को सूखाग्रस्त राज्य घोषित कर दिया.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने थोड़े ही दिनों पहले एक सभा में किसानों को संबंधित करते हुए कहा था कि, "खेत में सूखी फसल को खेत में ही छोड़ दें, जब तक कि सर्वे नहीं हो जाता. उसी फसल के आधार पर फसल सहायता योजना की राशि मिलेगी."

भोजपुर के गांवों में एक तरफ उजड़े खेत दिखते हैं तो दूसरी तरफ सूने खलिहान.

उदय जिस जगह बैठ कर बात कर रहे थे वहां पिछले साल इस समय में भरा-पूरा खलिहान लगा था,

उदय बताते हैं, "इस बार मकई खेत में ही सूख गई. धान अभी तक खेत में है. और ये सब हुआ है इस साल हुई सामान्य से बहुत कम बारिश के कारण. एक तो पहले मानसून दगा दे गया. और जब आया भी तो छटांक भर बरसकर रह गया. हम लोग हथिया (नक्छत्र) से आस लगाए मगर वो भी बिना बरसे निकल गया. एक बार मानसून के चले जाने के बाद फिर कभी बारिश नहीं हुई. अब तो स्वाति भी बीत चुकी है. जो होना था हो गया."

किसानों का त्यौहार है छठ

मान्यताओं के अनुसार "छठ" मूल रूप से किसानों का त्यौहार है जिसमें किसान सूर्य (प्रकृति) की आराधना करते हैं. खरीफ की फसल अच्छा होने पर किसान सूर्य का शुक्रिया अदा करते हैं.

ऐसा मानना है कि किसान को जो कुछ भी मिलता है, वह सूर्य की महिमा से ही मिलता है. फिर चाहे वह धूप हो या बारिश. इसलिए किसान जब खरीफ की अपनी फसल काट लेता है तो उसी का हिस्सा सूर्य को समर्पित भी करता है.

छठ के प्रसाद के तौर पर चढ़ने वाले फल, सब्जियां, फूल और पकवान उसकी बानगी पेश करते हैं.

उदय पासवान नहाय-खाय और खरना के परंपरा की बात करते हुए कहते हैं, "पहले नहाय-खाय और खरना में जो भी बनता था वो घर के अनाज से ही बनता था. खरना के दिन बनने वाला प्रसाद तो खास तौर पर नई फसल से बना होता था. नया अरवा चावल और नई ईख से बना गुड़. इस बार तो पानी की कमी के कारण ना तो गन्ना ठीक हुआ है और ना ही धान."

छठ की परंपरा और प्रथा पर बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार निराला बिदेशिया कहते हैं, "छठ के प्रसाद के तौर पर जो चढ़ता है या फिर सूर्य को जो अर्पण होता है, वह सब किसान द्वारा उगायी फसल से ही संबंधित होता है. ठेकुआ से लेकर पटुआ तक और पानीफल से लेकर जमीन के अंदर की ताजी पिली हल्दी तक."

लेकिन इस साल सूखा पड़ गया है. नई फसल अभी तक उपजी नहीं है. जो फसल बर्बाद हो गयी उसने किसानों की कमर तोड़ दी है. सबकुछ का इंतजाम खरीद कर ही संभव है. और महंगाई के इस दौर में उदय जैसे हजारों गरीब भूमिहीन किसानों के लिए फसलों का सूख जाना छठ की उमंग के मर जाने जैसा है.

आशा से टिका आसमान

भोजपुर के मीरगंज गांव के अनिल राय ने हाल ही में अपने खेत का पटवन किया है. कहते हैं, "डीजल से पटवन का रेट 200 रुपये घंटा है. जबकि जहां बिजली है, वहां प्रति बीघा 400 रुपये पटवन का रेट है. अगर किसी ने 15 पटवन भी किया है तो समझ लीजिए कि इधर दो बीघा भी धान उगाने में कितना खर्च है."

मगर छठ तो छठ है. सभी ने किसी न किसी तरह से अपने प्रसाद का इंतजाम कर लिया है.

पत्रकार से किसान बने पुर्णिया के चनका गांव के निवासी गिरिन्द्रनाथ झा कहते हैं, "हम आशावान हैं, महंगाई के इस दौर में भी. आप गाम – घर हो आइये तो देखेंगे कि लोगबाग छठ की तैयारी में जुट गए हैं. गागर, निम्बू, सूथनी, डाब निम्बू और हल्दी -अदरक आदि लोग जुटा चुके हैं."

"उत्सव के माहौल ने हम किसानों के घर-दुआर में ऊर्जा का संचार कर दिया है, सूखे की मार को हम फिलहाल भूलकर छठी मैय्या की आराधना में लग गए हैं, इस उम्मीद के साथ अगली फसल अच्छी होगी."

बिहार के 12 ज़िले पूर्णत: सूखाग्रस्त

इस साल बिहार के 12 जिलों को पूर्णत: सूखाग्रस्त घोषित किया गया है.

इनमें नालंदा, नवादा, गया, जमुई, शेखपुरा, दरभंगा, समस्तीपुर, सारण, सीवान, गोपालगंज, बांका और सहरसा शामिल हैं.

जिन जिलों को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है, उनमें से कई जिलों की स्थिति भयावह है.

कुछ जिलों में सामान्य से 40-85 फीसदी तक कम बारिश हुई है. जिससे खेत में रोपी गई फसल समय पर पानी नहीं मिलने के कारण खेत में ही सूख गई.

धान पर इसका असर भले अब देखने को मिल रहा हो. मगर मक्का, बाजरा और अन्य फसलें पहले ही सूख चुकी हैं.

कभी मक्का उत्पादन में रिकार्ड उत्पादन करने वाला राज्य बिहार इस बार सूखे के कारण फिसड्डी बनने के कगार पर है.

कृषि विभाग के अधिकारी लगातार सूखाग्रस्त प्रखंडों का दौरा कर अद्यतन रिपोर्ट विभाग को सौंप रहे हैं जिससे किसानों को मुआवजा देने में सहुलियत हो.

बिहार सरकार ने इस बार सूखे से निपटने के लिए 1400 करोड़ रुपए खर्च करने की योजना बनाई है.

क्या फसल रोपने में भी हुई देरी

लेकिन इस बार सूखे की वजह से खेत में ही फसल का मर जाना किसानों के लिए छठ के उत्साह को कम करने जैसा है. इस बार खेती में देरी भी हुई है. कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार जून-जुलाई के महीने में जब रोपनी का समय था तब किन्ही इलाकों में 80-85 फीसदी तक कम बारिश हुई थी.

इसका असर धान की रोपनी पर भी पड़ा था. किन्ही इलाकों में 50 फीसदी से भी कम जमीन पर रोपनी हो पाई थी. इसलिए अधिकांश इलाकों में जहां छठ के दौरान कटनी हो चुकी होती थी, वहां धान की फसल अब भी खेतों में लगी हुई है.

जिन खेतों में मक्के की फसल सूख गई है, वहां अब तक जुताई नहीं हो पायी.

क्योंकि पिछली फसल बर्बाद होने से छोटे और भूमिहीन किसानों की कमर टूट गई है.

उत्पादन के बाद बिक्री पर मिलने वाले लाभ की आकांक्षा लिए किसानों के हाथ में अभी तक पैसा नहीं आया है कि खेत को जुतवा सकें.

ऐसे में जब नई फसल का अनाज अब तक घर नहीं आया और सुखाड़ आने से पिछली फसल बर्बाद होने साथ-साथ किसान की पूंजी भी डूब गई, लगता है जैसे छठ का उमंग भी कम पड़ गया.

चूंकि, अभी भी अगली फसल के अच्छा होने की उम्मीद है. और वह अच्छी तभी होगी जब सूर्य की महिमा होगी. इस बार भी किसान छठ मनाएंगे तो जरूर मगर अपने आराध्य सूर्य को क्या कहकर थैंक्यू बोलेंगे.

इस सवाल के जवाब में गिरिन्द्र नाथ झा कहते हैं, "छठ उत्सव से अनुराग है. यह उत्सव मुझे खेत-खलिहान और नदी से इश्क करना सिखाता है. यही वह पूजा है, जहां हम प्रकृति के सबसे करीब होते हैं. किसानी करते हुए यह पर्व मुझे खेत से और करीब ला देता है."

झा कहते हैं, "इस बार धान की खेती ने निराश किया है. पानी के अभाव में फसल कम हुई. मन निराश है लेकिन छठ के आगमन ने मन को मजबूत कर दिया है. किसानी करते हुए हमने यही सीखा है कि प्रकृति आपको हर साल निराश नहीं करेगी. इस बार धान कम हुआ तो शायद सूर्य की उपासना से मक्का और आलू की पैदावार बम्पर हो जाए.

सरकार की ओर से दी जा रही राहत

बिहार में सूखा विकराल रूप ले चुका है. इसमें कोई दो राय नहीं है. और खुद बिहार सरकार इस बात को स्वीकार कर चुकी है.

सूखे की समस्या से राहत दिलाने के लिए कैबिनेट ने 1450 करोड़ रुपए जारी किया है. इस राशि में से 1430 करोड़ रुपए कृषि इनपुट अनुदान पर खर्च होंगे. वहीं ट्रक-टैंकर से पेयजल की ढुलाई पर 5 करोड़ रुपए और कुओं की मरम्मत के लिए 15 करोड़ रुपए दिए गए हैं.

बीबीसी के साथ बातचीत में कृषि विभाग के पटना प्रमंडल के संयुक्त निदेशक उमेश कुमार मंडल कहते हैं, "ऐसा नहीं कि सभी जिलों में पूरा का पूरा सूखा हो गया है. कुछ जिलों के कुछ प्रखंडों में ही सूखे का असर है. हालांकि, कुछ जिले ऐसे भी हैं जो पूर्ण रूप से सूखा प्रभावित है."

"किसानों को इनपुट सब्सिडी देने का काम चल रहा है. सभी एप्लिकेशन ऑनलाइन डालने हैं. प्रावधानों के मुताबिक 25 दिनों के अंदर किसानों को सब्सिडी की राशि मिल जाएगी. अधिकतम दो हेक्टेयर जमीन के लिए इनपुट सब्सिडी दी जाएगी. वर्षा आधारित फसल क्षेत्र के लिए प्रति हेक्टेयर 6800 रुपए, सुनिश्चित सिंचाई आधारित फसल क्षेत्र के लिए प्रति हेक्टेयर 13500 रुपए और न्यूनतम 1000 रुपए का अनुदान मिलेगा. फसल सहायता राशि के लिए आवदेन की आखिरी तारीख 15 नवंबर है."

जब उनसे ये सवाल किया गया कि सरकार उस दिशा में क्या प्रयास कर रही जिससे इस सूखाड़ का असर अगली फसल पर ना पड़े तो उमेश कुमार कहते हैं, "जब तक खेत में नमी नहीं आएगी, अगली फसल की बुआई संभव नहीं है. जिन इलाकों में एकदम बारिश नहीं हुई है, वहां नमी की कमी है. लेकिन कुछ ऐसे भी इलाके भी हैं जहां नमी अभी भी बरकरार है. कहीं-कहीं तो मसूर की बुआई भी हो गई है."

जिन जिलों में सूखे का असर है वहां के किसानों को कृषि विभाग उन फसलों की खेती करने के लिए प्रेरित कर रहा है जिनमें नमी की कम आवश्यकता होती है.

कैंपेन चलाकर इसके लिए किसानों को ट्रेनिंग दी जाएगी. इसी के तहत अधिक से अधिक बिजली के कृषि कनेक्शन भी देना है जिससे सिंचाई की बाधा पर पार पाया जा सके.

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