एंटीक चीजों के शौकीन हैं हजारीबाग के सुरेंद्र प्रसाद ,100 साल पुरानी लालटेन और इन चीजों को रखा है संभालकर

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 13 Apr 2023 5:03 PM

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सुरेंद्र प्रसाद सिन्हा रिटायर्ड असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर थे. वे अपने पद से 1994 में रिटायर हुए हैं. उन्होंने बताया कि उनके दादा जी ने यह लालटेन खरीदा था, जो उनके खानदानी मकान जोकि डालटनगंज में स्थित है वहीं रखा था.

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वर्तमान दौर में अगर किसी किशोर या किशोरी से यह पूछा जाये कि क्या तुमने लालटेन इस्तेमाल किया है? तो निश्चित तौर पर उनका जवाब ना ही होगा. आज के आधुनिक युग में लालटेन जैसी चीजें लुप्तप्राय सी होती जा रही हैं इस दौर में हजारीबाग के सुरेंद्र प्रसाद सिन्हा एक ऐसे व्यक्ति हैं जो कई पुरानी और एंटीक चीजों को अपने पास संजोकर रखे हुए हैं. प्रभात खबर के साथ बातचीत में उन्होंने बताया कि उनके पास एक सौ साल से अधिक पुरानी एक लालटेन है, जिसे उन्होंने संजोकर रखा है और वह आज भी रौशनी देने में समर्थ है.

सौ साल पुरानी है लालटेन

सुरेंद्र प्रसाद सिन्हा रिटायर्ड असिस्टेंट सेटलमेंट ऑफिसर थे. वे अपने पद से 1994 में रिटायर हुए हैं. उन्होंने बताया कि उनके दादा जी ने यह लालटेन खरीदा था, जो उनके खानदानी मकान जोकि डालटनगंज में स्थित है वहीं रखा था. उन्होंने बताया कि लालटेन के शीशे पर 12-4-23 अंकित है. यानी अब यह लालटेन सौ वर्ष की हो चुकी है. इस लालटेन पर मेड इन न्यूयार्क लिखा हुआ है.

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पुरानी चीजों से जुड़ी हैं भावनाएं

सुरेंद्र जी ने बताया कि उनका जन्म 1936 में दुमका हुआ था. कामकाज के सिलसिले में वे चाईबासा और रांची में भी रहे. खानदानी मकान डालटनगंज से 1970 में वे इस लालटेन को लेकर आये थे. सुरेंद्र प्रसाद ने बताया कि उन्हें पुरानी चीजों को संभालकर रखने की आदत है क्योंकि उनसे भावनाएं और यादें जुड़ी होती हैं.

45 रुपये में खरीदी थी साइकिल

सुरेंद्र प्रसाद सिन्हा ने बताया कि उनके पास एक रेले साइकिल भी है जो उनके जन्म के समय ही खरीदी गयी थी. उन्होंने बताया कि मेरी आयु अभी 87 साल है, मेरा जन्म 1936 में हुआ था और उसके कुछ ही महीने बाद मेरे पिताजी ने रेले (इंग्लिश) साइकिल खरीदी थी. उस साइकिल को मैंने काफी चलाया. आज भी वह साइकिल मेरे पास है. साइकिल का फ्रेम, उसका हैंडिल और मर्ड गार्ड ओरिजिनल है. मैंने इस साइकिल का कैश मैमो रखा है, जिसपर 45 रुपये अंकित है. चूंकि साइकिल कोलकाता से आई थी इसलिए उसपर ट्रांसपोर्टेशन चार्ज पांच रुपये लगा था. उन्होंने बताया कि टायर-ट्यूब बदलवा देने से यह साइकिल अभी भी चल सकती है. मैंने इस साइकिल से रांची में 10 हजार किलोमीटर तक की दूरी तय की है. रांची शहर और तैमारा घाटी तक मैं इस साइकिल से जाता था. उस वक्त रांची में इतनी भीड़ नहीं होती थी.

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मेड इन स्वीडन स्टोव
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सुरेंद्र प्रसाद सिन्हा ने बताया कि मेरे पास एक स्टोव भी है जो मेड इन स्वीडन है और वह 1927-28 का है. पहले वह स्टोव हमारे घर में इस्तेमाल होता था लेकिन अब मैंने उसे एंटीक के रूप में सहेज कर रखा है. सुरेंद्र प्रसाद ने बताया कि उनके पास एक काफी पुराना चरखा भी था, लेकिन एक बार घर में चोरी हुई तो चोरों ने उसे भी निशाना बना लिया. उन्हें पुराने सिक्के भी जमा करने का शौक था. उनके पास 12 पाई और आने के भी सिक्के थे, लेकिन सब चोरों ने उड़ा लिया. इसके अलावा और भी कई चीजें हैं, जो वर्षों से उनके पास है, जिनमें पुराने समय के ताले, पलंग, संदूक एवं बरतन इत्यादि शामिल हैं. सुरेंद्र प्रसाद वर्तमान में हजारीबाग के रामनगर में रहते हैं. 87 साल की उम्र में भी ऊर्जावान हैं और काफी एक्टिव रहते हैं. वे यह कहते हैं कि कुछ दिन में वे अपनी साइकिल को फिर से चलायेंगे. वे वर्षों से पेंशनधारियों की निशुल्क सेवा में जुटे रहते हैं.

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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