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खरसावां गोलीकांड : 76 साल बाद भी अबूझ पहेली व आंखों में आंसू बरकरार

Updated at : 31 Dec 2023 6:43 AM (IST)
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खरसावां गोलीकांड : 76 साल बाद भी अबूझ पहेली व आंखों में आंसू बरकरार

गोलीकांड की जांच के लिए ट्रिब्यूनल का गठन किया गया, पर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई. घटना में कितने लोग मारे गये, इसका कोई दस्तावेज तक नहीं है.

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खरसावां, शचिंद्र कुमार दाश/प्रताप मिश्रा : आजाद भारत का पहला सबसे बड़ा नरसंहार खरसावां गोलीकांड 76 साल बाद भी अबूझ पहेली बनी हुई है. एक जनवरी, 1948 को खरसावां हाट में अपने हक के लिए शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे आदिवासियों पर अंधाधुंध फायरिंग की गयी थी. गोलीकांड की जांच के लिए ट्रिब्यूनल का गठन किया गया, पर उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई. घटना में कितने लोग मारे गये, इसका कोई दस्तावेज तक नहीं है. गोलीकांड में बड़ी संख्या में लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी. खरसावां के शहीदों की कुर्बानी को इतिहास भी कभी भूला नहीं सकता है.

खरसावां व सरायकेला रियासतों का ओडिशा में विलय होना था

बताया जाता है कि 15 अगस्त, 1947 को देश आजादी के बाद राज्यों के पुनर्गठन के दौर से गुजर रहा था. तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने देसी रियासतों को मिलाकर देश के एकीकरण की प्रक्रिया शुरू की. रियासतों को 3 श्रेणियों ए- बड़ी रियासतें, बी- मध्यम और सी श्रेणी में छोटी रियासतों को रखा गया. उस समय खरसावां और सरायकेला छोटी रियासतें थीं. इन्हें सी-श्रेणी में रखा गया था. अनौपचारिक तौर पर 14-15 दिसंबर को खरसावां व सरायकेला रियासतों का ओडिशा में विलय का समझौता हो चुका था. एक जनवरी, 1948 से समझौता लागू होना था.

जनसभा में पहुंचे लोगों पर हुई थी अंधाधुंध फायरिंग

एक जनवरी, 1948 को आदिवासी नेता जयपाल सिंह ने खरसावां व सरायकेला को ओडिशा में विलय के विरोध में खरसावां हाट मैदान में विशाल जनसभा का आह्वान किया. जनसभा में कोल्हान के विभिन्न क्षेत्रों से हजारों लोग पहुंचे थे. इसे देखते हुए पर्याप्त संख्या में पुलिस बल तैनात किये गये थे. किसी कारणवश जनसभा में जयपाल सिंह नहीं पहुंच सके. पुलिस व जनसभा में पहुंचे लोगों में किसी बात को लेकर संघर्ष हो गया. अचानक पुलिस के जवानों ने अंधाधुंध फायरिंग कर दी. इसमें सैकड़ों लोगों को गोली लगी. खरसावां हाट मैदान आदिवासियों के खून से लाल हो गया था.

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लाशों को कुआं में डालकर मिट्टी से भर दी गयी

गोलीकांड में मृतकों की संख्या का आजतक पता नहीं चल सका है. बताया जाता है कि लाशों को खरसावां हाट मैदान स्थित एक कुआं में भरकर ऊपर से मिट्टी डाल दी गयी. यही स्थल आज शहीद बेदी व हाट मैदान शहीद पार्क में तब्दील हो गया है. बताया जाता है कि गोलीकांड के बाद पूरे देश में प्रतिक्रिया हुई. तत्कालीन समाजवादी नेता डॉ राम मनोहर लोहिया ने खरसावां गोलीकांड की तुलना जलियांवाला बाग हत्याकांड से की थी.

ओडिशा में विलय नहीं चाहते थे बिहार के राजनेता

उन दिनों देश की राजनीति में बिहार के नेताओं का अहम स्थान था. वे सरायकेला व खरसावां का विलय ओडिशा में नहीं चाहते थे. इस घटना का असर ये हुआ कि दोनों रियासतों को ओडिशा के बजाय बिहार राज्य में विलय किया गया.

शहीदों की संख्या बताने वाला कोई सरकारी दस्तावेज नहीं

– 30 केएसएन 3 : तीन जनवरी 1948 को अंग्रेजी अखबार ‘द स्टेट्समैन’ में घटना के संबंध में प्रकाशित खबर

– 30 केएसएन 4, 5 : पूर्व सांसद और महाराजा पीके देव की किताब ””मेमोयर ऑफ ए बायगॉन एरा””, जहां इस घटना में दो हज़ार लोगों के मारे जाने की बात कही गयी है.

खरसावां गोलीकांड पर वरिष्ठ पत्रकार सह ‘प्रभात ख़बर’ झारखंड के कार्यकारी संपादक अनुज कुमार सिन्हा की किताब ‘झारखंड आंदोलन के दस्तावेज़ : शोषण, संघर्ष और शहादत’ में एक अलग से अध्याय है. वो लिखते हैं, मारे गए लोगों की संख्या के बारे में बहुत कम दस्तावेज़ उपलब्ध हैं. पूर्व सांसद सह महाराजा पीके देव की किताब ”मेमोयर ऑफ ए बायगॉन एरा” के मुताबिक घटना में दो हज़ार लोग मारे गये थे. हालांकि, तब कलकत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित अंग्रेजी अख़बार द स्टेट्समैन ने घटना के तीसरे दिन तीन जनवरी के अंक में घटना से संबंधित एक खबर छापी, जिसका शीर्षक था- ‘35 आदिवासी किल्ड इन खरसावां’. अखबार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि खरसावां का ओडिशा में विलय का विरोध कर रहे 30 हजार आदिवासियों पर पुलिस ने फायरिंग की. इस गोलीकांड की जांच के लिए ट्रिब्यूनल का गठन किया गया था, पर उसकी रिपोर्ट का क्या हुआ, किसी को पता नहीं.

सरकारी स्तर पर दो शहीदों के आश्रितों को मिला सम्मान

वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुबर दास ने खरसावां गोलीकांड के दो शहीद महादेव बुटा (खरसावां) के सिंगराय बोदरा व बाइडीह (कुचाई) के डोलो मानकी सोय के आश्रितों को एक-एक लाख रुपये की राशि देकर सम्मानित किया था. इनके अलावे सरकारी स्तर पर किसी अन्य शहीद की पहचान नहीं हो सकी है. स्थानीय विधायक दशरथ गागराई भी इस मुद्दे को लेकर विस में काफी मुखर रहे हैं. वे विस में कई बार शहीदों के आश्रितों को सरकारी स्तर पर सम्मानित करने की मांग कर चुके हैं.

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2.20 करोड़ रुपये से बना है खरसावां शहीद पार्क

वर्ष 2016 में करीब 2.20 करोड़ रुपये की लागत से शहीद पार्क का निर्माण किया गया. शहीद पार्क का रंग-रोगन कर दुरुस्त किया गया. शहीद पार्क परिसर में शहीद बेदी है, जहां लोग श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. इसी स्थान पर एक जनवरी को लोग श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. विजय सिंह बोदरा अभी शहीद स्थल के पुरोहित हैं. उनका परिवार यहां पीढ़ियों से पूजा करा रहा है. विजय ने बताया कि एक जनवरी को शहीदों के नाम पर पूजा की जाती है. शहीद स्थल पर फूल-माला के साथ-साथ तेल भी चढ़ाया जाता है.

पहले दिउरी करेंगे पूजा, इसके बाद लोग देंगे श्रद्धांजलि

एक जनवरी को खरसावां के शहीदों की बरसी पर सुबह से देर शाम तक श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा रहता है. सबसे पहले बेहरासाही के दिउरी विजय सिंह बोदरा विधिवत रूप से पूजा- अर्चना कर श्रद्धांजलि देते हैं. इसके बाद आम से लेकर खास लोग श्रद्धांजलि देने के लिए पहुंचते हैं. विभिन्न सामाजिक व राजनीतिक संगठन खरसावां के शहीदों को श्रद्धांजलि दी जायेगी.

जगह-जगह बनाये गये तोरण द्वार

खरसावां शहीद दिवस को लेकर खरसावां शहीद पार्क की ओर जाने वाली सड़कों पर तोरण द्वार बनाये गये हैं. तोरण द्वार के नाम शहीदों पर रखे गये हैं. खरसावां के चांदनी चौक व आसपास के क्षेत्रों में विभिन्न राजनीतिक दल व सामाजिक संगठनों की ओर से जगज-जगह पर तोरण द्वार लगाये गये हैं. शहीद पार्क में जूता-चप्पल पहन कर या राजनीतिक दल का झंडा-बैनर लेकर प्रवेश करने पर रोक है. शहीद पार्क के मुख्य गेट के पास कंट्रोल रूम बना है.

शहीद पार्क में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम, सीसीटीवी कैमरे से निगरानी

शहीद दिवस कार्यक्रम में हाई प्रोफाइल नेताओं के आगमन को लेकर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये गये हैं. शहीद दिवस कार्यक्रम को लेकर अलग-अलग स्थानों पर ड्रॉप गेट बना कर सुरक्षा बल व दंडाधिकारी की प्रतिनियुक्ति की गयी है. सुरक्षा के दृष्टिकोण से शहीद पार्क के भीतर व चांदनी चौक में सीसीटीवी कैमरे लगा कर निगरानी की जा रही है. ड्रोन कैमरा का भी उपयोग किया जायेगा. शहीद पार्क के मुख्य गेट से अंदर जाने व बाहर निकलने के लिए दो अलग-अलग गेट बनाये गये हैं.

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