गोड्डा की लाइफ लाइन कझिया नदी आज विलुप्त होने के कगार पर, लगातार दोहन के कारण हुई ऐसी हालत

Updated at : 18 Jan 2022 4:43 PM (IST)
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गोड्डा की लाइफ लाइन कझिया नदी आज विलुप्त होने के कगार पर, लगातार दोहन के कारण हुई ऐसी हालत

jharkhand news: नदियों के लगातार दोहन से इसका अस्तित्व ही मिटने लगा है. यही हाल गोड्डा की लाइफ लाइन कहे जाने वाली कझिया नदी की है. कभी कलकल कर बहती कझिया नदी आज ऊबड़-खाबड़ मैदान सी दिखने लगी है. कझिया नदी की स्थिति अलार्मिंग हो गयी है.

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Jharkhand news: गोड्डा जिले के कझिया केवल एक नदी ही नहीं है, बल्कि इस जिले की लाइफ लाइन मानी जाती थी. यह सुंदरपहाड़ी के ढलानों से सनसनाती हुई नीचे उतरती थी. कभी कलकल करती हुई बहती यह नदी आज मृत्युशैया पर पड़ी है. विलुप्त होने जैसा हो गयी है. इसकी स्थिति अलार्मिंग है.

राज्य मेें 24 जिलों की 196 नदियों में 133 नदियां सूख चुकी है. कझिया भी उसी में से एक है. संताल परगना की प्रमुख पहाड़ी नदी में से एक कझिया नदी की स्थिति अलार्मिंग है. तकरीबन 15 सालों से कझिया का अनवरत दोहन हुआ है. यह वही कझिया थी जिसके बूते कभी सैकड़ों गांवों की फसलें लहलहाती थीं. किसानों को भरपूर पानी मिलता था. हजारों एकड़ जमीन सिंचित होती थी. यह यहां के लोगों की लाइफ लाइन थी.

दूसरी ओर, पिछले कई वर्षों से इसका भरपूर दोहन किया गया. खूब लूटी-खसोटी गयी, जो आज भी जारी है. अब नदी से बदलकर ऊबड़-खाबड़ मैदान सी दिखती है. कझिया सहित अन्य नदियों को लेकर सरकार उदासीन और समाज भी असंवेदनशील दिखता है.

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अपनी दुर्दशा पर रो रही

एक रिपोर्ट के मुताबिक, झारखंड में 1100 से 1400 मिलीमीटर बारिश होती है. लेकिन, समुचित जल प्रबंधन के अभाव में 80 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता है. वहीं, यह भी बताया जाता है कि 2050 तक प्रति व्यक्ति 3120 लीटर भू-जल ही बचेगा. भूमिगत जल की मात्रा भी लगातार घट रही है. अभी इसकी उपलब्धता 5120 लीटर प्रति व्यक्ति है. यही वर्ष 1951 में 14,180 लीटर थी. समझिए स्थिति क्या है.

अनुमान यह भी लगाया जा रहा है कि वर्ष 2025 तक यह 1951 की तुलना में हर दिन केवल 25 फीसदी पानी ही बचेगा. और कझिया जैसी नदियां केवल एक नदी नहीं होती वह परंपरा, संस्कृति और इतिहास की वाहक भी होती हैं. लोगों का सीधा जुड़ाव इनसे होता है.

कझिया नदी का भी गोड्डा के जनजीवन पर जबरदस्त दखल रहा है. जो इन दिनों अपनी दुर्दशा पर रो रही है. इसकी बदहाली का असर यहां की खेती, पशुपालन और गंभीर रूप से भू-जल स्तर पर पड़ा है. दरअसल, राज्य में नदियों को लेकर हॉलिस्टिक पॉलिसी बनाकर काम नहीं हुआ है. तत्काल जरूरत कझिया और तमाम नदियों के दोहन पर रोक लगाने और उसके कैचमेंट एरिया को विकसित करने की है, ताकि उन्हें जीवनदान मिल सके.

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संताल परगना में नदियों की स्थिति अलार्मिंग

संताल परगना की प्रमुख नदियों में अजय, मयूराक्षी, ब्राह्मनि, बांसलोई, गुमानी जैसी नदियां हैं. अजय नदी का उद्गम बिहार के चकाई से पांच किलोमीटर दूर बटपांड से है. यह देवघर और जामताड़ा जिले में बहती है. पतरो और जयंती इसकी सहायक नदियां हैं. मोर या मयूराक्षी के साथ भी कई छोटी नदियां जैसे टिपरा, पुसारो, भामरी, दौना और धोवाई बहती है. ब्राह्मनि का उद्गम दुमका के दुधवा पहाड़ी से है. इसके साथ ही गुमरो और एरो नदी बहती है. बांसलोई गोड्डा से और गुमानी राजमहल की पहाड़ी से निकलती है. गोड्डा जिले में कझिया के अलावा सुंदरनदी, चीर, हरना, नीलक्षी, सांपिन और गेरुआ नदी बहती है. यहां की नदियां बरसाती नदी मानी जाती है. बावजूद इसके वो लाइफ लाइन थीं.

रिपोर्ट : प्रवीण तिवारी, गोड्डा.

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