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झारखंड के लिए कृषि क्षेत्र का विकास जरूरी

Updated at : 29 Jun 2023 7:55 AM (IST)
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झारखंड के लिए कृषि क्षेत्र का विकास जरूरी

झारखंड की अर्थव्यवस्था में 2000-17 के बीच सालाना औसतन छह प्रतिशत का विकास हुआ, और सेवा क्षेत्र में जारी उछाल और औद्योगिक क्षेत्रों के विकास का उसमें सबसे ज्यादा योगदान रहा.

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झारखंड की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर निर्भर है, और यहां की लगभग 80 फीसदी आबादी की आजीविका प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर कृषि से चलती है. लेकिन, झारखंड भारत के सबसे गरीब प्रदेशों में गिना जाता है. खनिज पदार्थों से संपन्न होने के बावजूद विकास के सभी मानकों पर झारखंड का स्थान काफी नीचे है. हालांकि, वर्ष 2000 में बिहार से बंटवारे के बाद झारखंड में तेजी से आर्थिक विकास हुआ है. वर्ष 2005-2015 के बीच, झारखंड में कृषि के क्षेत्र में मध्य प्रदेश के बाद सबसे तेज विकास हुआ. झारखंड की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर भी हुई, क्योंकि जहां बाकी प्रदेश चार प्रतिशत के विकास के लिए भी जूझ रहे थे, वहीं झारखंड में कृषि क्षेत्र में तेज विकास हो रहा था. लेकिन, झारखंड में कृषि प्रकृति पर अत्यधिक आश्रित है और उसे कम निवेश, कम उत्पादकता, अपर्याप्त सिंचाई संसाधनों और छोटी जोतों जैसी चुनौतियों से जूझना पड़ रहा है.

झारखंड की अर्थव्यवस्था में 2000-17 के बीच सालाना औसतन छह प्रतिशत का विकास हुआ, और सेवा क्षेत्र में जारी उछाल और औद्योगिक क्षेत्रों के विकास का उसमें सबसे ज्यादा योगदान रहा. अर्थव्यवस्था में काफी ढांचागत बदलाव भी हुए हैं, तथा राज्य की सकल घरेलू आय में कृषि व इससे जुड़े क्षेत्रों के योगदान में मामूली कमी दर्ज की गयी, और यह वर्ष 2000-02 के 16.8 प्रतिशत से घटकर 2014-16 में 14.8 फीसदी हो गया. इसकी तुलना में, सेवा क्षेत्र में लगभग 20 फीसदी की गति से तेज विकास हुआ. इसके बावजूद, देश में कृषि क्षेत्र में सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है. पिछले पांच दशकों में, भारतीय अर्थव्यवस्था में कृषि से जुड़े श्रम की तुलना में सकल घरेलू उत्पाद या जीडीपी में कृषि के योगदान में तेजी से गिरावट आयी है. इस वजह से कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों में काम करनेवालों की आय में असमानता आती गयी. हालांकि, झारखंड में वर्ष 2000-18 के बीच प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है, मगर इसमें उतार-चढ़ाव आता रहा है.

कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन मुख्यतः फसल की पैदावार पर निर्भर रहा है, और कृषि के प्राथमिक क्षेत्र के कुल उत्पादन मूल्य में लगभग 55 फीसदी हिस्सा फसलों का रहा. वर्ष 2000-01 से 2016-17 के बीच फसल उत्पादन के मूल्य में सालाना 8.31 फीसदी की वृद्धि हुई. इस दौरान कृषि से जुड़े अन्य क्षेत्रों में भी वृद्धि दर्ज की गई, पशुपालन क्षेत्र में 7.85, वन क्षेत्र में 11.19 और मत्स्य पालन क्षेत्र में 6.69 फीसदी की वृद्धि हुई, जो कि राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है. झारखंड में बागवानी क्षेत्र तेजी से उभर रहा है, और कृषि क्षेत्र के कुल उत्पाद का लगभग आधा हिस्सा बागवानी से आता है.

झारखंड के समग्र आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण होने के बावजूद, आर्थिक विकास में कृषि के योगदान और इसमें विविधता के बारे में ठीक से अध्ययन कम ही हुआ है. इस बारे में हुए एक अध्ययन में प्रदेश में कृषि क्षेत्र के विकास के कारकों के साथ इस क्षेत्र से जुड़े विविध कारकों के योगदान की पड़ताल की गयी. इसमें इस बात की पुष्टि होती है कि प्रदेश की कृषि सिंचाई की कमी तथा बारिश से जुड़ी खेती की वजह से मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर है. झारखंड में वर्ष 2000 के बाद से फसलों की श्रेणी में भी बड़ा बदलाव आया है तथा दलहन, मक्का और तिलहन की खेती बढ़ी है. प्रदेश में सीमित जल संसाधनों के समुचित इस्तेमाल के लिए तकनीकी विकास की जरूरत है जिसमें मिट्टी तथा जल संचयन पर ध्यान दिया जाना चाहिए. साथ ही, यहां की हल्की मिट्टी के अनुकूल कम अवधि वाली तिलहन फसलों, जैसे तिल, तीसी, कुसुम तथा हरा व काला चना और बंगाल चना जैसी दलहन फसलों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

अर्थव्यवस्था के विकास में ग्रामीण सड़कों का एक अहम योगदान होता है. झारखंड में अभी भी देश के अन्य हिस्सों की तुलना में सड़कों की सघनता कम है, जिसे बढ़ाया जाना चाहिए. इसी प्रकार, झारखंड में प्रति हेक्टेयर उर्वरक का इस्तेमाल भी कम है और इसकी खपत में वृद्धि से भी प्रदेश के कृषि क्षेत्र का विकास हो सकता है. इसके अतिरिक्त, झारखंड में सिंचाई की कमी की वजह से भू-भाग के एक बड़े हिस्से पर खेती नहीं हो पाती. लघु सिंचाई तकनीकों को अपना कर सिंचाई क्षेत्र का विस्तार किया जा सकता है. हालांकि, कृषि क्षेत्र में तकनीक के अपेक्षाकृत योगदान में गिरावट चिंता का विषय है.

कृषि के लिए निवेश में कमी और खास तौर पर कृषि से जुड़े शोध की अक्षमता इसके कारण हो सकते हैं. इनका प्रभाव कृषि से जुड़े शोध और विकास कार्यों पर पड़ता है. अध्ययन से यह भी पता चलता है कि 2008-15 के बीच कृषि क्षेत्र के विकास में फसलों की विविधता का योगदान भी घटा है. इस दिशा में भी ज्यादा उत्पादकता वाली फसलों के इस्तेमाल की जरूरत है, जिनसे कृषि क्षेत्र के विकास में मदद मिल सकती है. झारखंड में श्रम की कमी नहीं है, और इसके समुचित इस्तेमाल से विविधता लायी जा सकती है. बागवानी से जुड़ी फसलों का उत्पादन बढ़ाने की भी प्रचुर संभावनाएं हैं, क्योंकि झारखंड पश्चिम बंगाल, बिहार और ओडिशा से जुड़ा है जो इन फसलों के लिए बड़े बाजार सिद्ध हो सकते हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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डॉ घनश्याम

लेखक के बारे में

By डॉ घनश्याम

प्रोफेसर, एसआरएम विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश

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