रावण की जन्मभूमि बिसरख में आज मंदिर निर्माण के जश्न के साथ टूटी परंपरा, 60 साल पहले बीच में बंद करायी गई थी रामलीला...

श्रीरामलला की जन्मभूमि अयोध्या में बुधवार को हुए मंदिर निर्माण के भूमिपूजन को लेकर पूरे देश में उल्लास का माहौल बना हुआ है.एक तरफ जहां पूरे अयोध्या को सजाया गया है.वहीं आज रावण की जन्मभूमि माने जाने वाले बिसरख गांव में भी मंदिर के भूमिपूजन को लेकर खुशी का माहौल है.
श्रीरामलला की जन्मभूमि अयोध्या में बुधवार को हुए मंदिर निर्माण के भूमिपूजन को लेकर पूरे देश में उल्लास का माहौल बना हुआ है.एक तरफ जहां पूरे अयोध्या को सजाया गया है.वहीं आज रावण की जन्मभूमि माने जाने वाले बिसरख गांव में भी मंदिर के भूमिपूजन को लेकर खुशी का माहौल है.
ग्रेटर नोएडा से करीब 10 किलोमीटर की दूरी पर गौतमबुदध नगर जिला का बिसरख गांव, जिसे रावण का जन्मस्थल भी माना जाता है और जिसका जिक्र शिवपुराण में भी किया गया है. आज पूरा बिसरख गांव रामलला के मंदिर निर्माण की खुशियां मना रहा है. इस गांव में रावण की पूजा की जाती है. यहां रावण का एक मंदिर भी स्थापित है. जिसमें भगवान शिव की पूजा की जाती है. मंदिर स्थल को रावण का जन्मस्थल माना जाता है.
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इस गांव में कभी दशहरा नहीं मनाया जाता और ना ही रावण दहन होता है. लेकिन अयोध्या में मंदिर निर्माण के साथ इस गांव में भी कार्यक्रम होने की शूरूआत ग्रामीणों ने कर दी है. रावण के मंदिर के महंत श्री श्री रामदास जी महाराज के अनुसार, राम और रावण अलग नहीं हैं . वो दोनो एक दूसरे के बिना अधूरे हैं. उनके अनुसार राम और रावण दोनो को उस युद्ध का परिणाम पहले से पता था. हर हिंदू की यह इच्छा थी कि अयोध्या में भव्य राममंदिर बने. इसलिए इस उपलक्ष्य पर पुरातन रावण मंदिर में भी कार्यक्रमों की शुरूआत कर दी गई है.सोमवार को मंदिर में खीर का प्रसाद बंटा. मंगलवार को मंदिर में भंडारा किया गया. वहीं बुधवार को भूमिपूजन के दिन भजन-किर्तन के बाद लड्डू बांटे जाएंगे.
कहा जाता है कि त्रेता युग में इस गांव में ऋषि विश्रवा का जन्म हुआ था. इस गांव में उन्होंने एक शिवलिंग की स्थापना की थी. उनके घर में ही रावण का जन्म हुआ था. इस गांव में अनेकों ऐसी घटनाएं हैं जो चर्चा का विषय रही हैं. इस गांव में अब तक 25 शिवलिंग मिल चुके हैं. वहीं एक शिवलिंग की गहराई इतनी है कि खुदाई के बाद भी उसका कहीं छोर नहीं मिला है. ये सारे शिवलिंग अष्टभुजा के हैं.
वहीं इस गांव में लगभग छह दशक पहले रामलीला का आयोजन किया गया था. लेकिन अचानक गांव में एक मौत होने के कारण बीच में ही रामलीला बंद करनी पड़ी थी. जब इसे दोबारा शुरू किया गया तो वही घटना फिर से घटी. जिसके बाद अब इस गांव में ना ही रामलीला होती है और ना ही रावण का पुतला दहन होता है.
Posted by : Thakur Shaktilochan Shandilya
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