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Bhaukaal 2 Review: नाम भर ही रह गयी भौकाल 2, पढ़ें पूरा रिव्यू

Updated at : 20 Jan 2022 3:08 PM (IST)
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Bhaukaal 2 Review: नाम भर ही रह गयी भौकाल 2, पढ़ें पूरा रिव्यू

इस सीरीज का पहला सीजन दर्शकों को काफी पसंद आया था जिससे दूसरे सीजन से उम्मीदें बढ़ गयी थी लेकिन वेब सीरीज भौकाल 2 कमज़ोर लेखन की वजह से मनोरंजन की कसौटी पर औसत रह गयी है.

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वेब सीरीज- भौकाल 2

निर्माता- अप्पलॉज एंटरटेनमेंट और हरमन बावेजा

निर्देशक-जतिन वागले

कलाकार- मोहित रैना, सिद्धांत कपूर, प्रदीप नागर,बिदिता बाग और अन्य

रेटिंग- ढाई

जाबांज पुलिस अधिकारी नवनीत सिकेरा की वास्तविक ज़िंदगी पर वेब सीरीज भौकाल आधारित है. इस सीरीज का पहला सीजन दर्शकों को काफी पसंद आया था जिससे दूसरे सीजन से उम्मीदें बढ़ गयी थी लेकिन वेब सीरीज भौकाल 2 कमज़ोर लेखन की वजह से मनोरंजन की कसौटी पर औसत रह गयी है. जिसे देखने में मज़ा नहीं आएगा तो समय भी बर्बाद नहीं होगा.

कहानी की बात करें तो इस बार भी मुज़्ज़फ़रनगर में कहानी को स्थापित किया है. जहां पर गुंडा राज है. पहले सीजन का अंत एक क्रिमिनल गैंग के लीडर शौकीन अली ( अभिमन्यु सिंह) के अंत से होता है. अब डेढा ब्रदर्स मुज़्ज़फरपुर में अपना भौकाल लाना चाहते हैं. रंगदारी, हत्या और अपहरण का वह राज अब वह अपने नाम से मुज़्ज़फरनगर में करना चाहते हैं लेकिन एसएसपी नवीन सिकेरा मुज़्ज़फरनगर से जुर्म को खत्म कर देना चाहता है तो इसबार नवीन सिकेरा बनाम डेढा ब्रदर्स की कहानी है.

सीरीज की शुरुआत बहुत धीमी हुई है. पहले के पांच एपिसोड में कहानी बिल्डअप करने में ही चले गए हैं. छठवें एपिसोड में कहानी रफ्तार पकड़ती है लेकिन फिर कमज़ोर क्लाइमेक्स सीरीज के प्रभाव को और कमतर कर गया है. पूरा फोकस डेढा भाइयों बनाम नवीन सिकेरा पर ही सिमट कर रह गया है. यह बात अखरती है.वेब सीरीज में रोमांच के साथ सब प्लॉट्स की कमी है. किसी भी किरदार का कोई भी ट्विस्ट एंड टर्न अचरज में नहीं डालता है. पुलिस महकमे में ही डेढा ब्रदर्स का आदमी है और उस भेदिए को उसके अंजाम तक पहुंचाने में सीरीज के आखिरी एपिसोड का इंतज़ार किया गया है. डेढा ब्रदर्स और नवीन सिकेरा की भिड़ंत से रोमांच गायब है. 10 एपिसोड्स की इस सीरीज में नवीन सिकेरा का किरदार मुश्किल से डेढा ब्रदर्स को चुनौती दे पाया है. सिस्टम के आगे वे ज़्यादातर लाचार ही नज़र आए हैं. इसके साथ ही सीरीज में दिवंगत अभिनेता विक्रमजीत की मौजूदगी के साथ पॉलिटिक्स को भी जोड़ा गया है लेकिन कहानी में उसका इस्तेमाल भी नहीं हो पाया है.

अभिनय की बात करें तो मोहित रैना एसएसपी नवीन सिकेरा की भूमिका में वो छाप नहीं छोड़ पाए हैं।जो पहले सीजन में उन्होंने किया था. इसकी एक वजह उनके बढ़ते वजन को दिया जा सकता है. फ़िल्म के क्लाइमेक्स के एक्शन सीक्वेंस में उनकी फिटनेस में खामियां उभरकर सामने आयी हैं. सीरीज के लेखन में पिंटू भइया का किरदार नवीन सिकेरा के मुकाबले ज़्यादा सशक्त है और अभिनेता प्रदीप नागर ने प्रभावी ढंग से उसे जिया भी है. किरदार की बॉडी लैंग्वेज , लहजा या फिर आंखें हो प्रदीप ने इन सभी के मेल से अपने किरदार को पर्दे पर बखूबी उतारा है. सिद्धांत कपूर और विक्रमजीत पाल भी अपनी भूमिका में जंचे हैं. बिदिता बाग को इस बार ज़्यादा मौका नहीं मिल पाया है शायद सीजन तीन में उनके किरदार को ज़्यादा मौका पाए. बाकी के किरदारों का काम अच्छा रहा है.

दूसरे पहलुओं की बात करें तो अपराध पर आधारित सीरीज में जमकर गाली गलौज होना ओटीटी का फॉर्मूला बन चुका है. इससे यह सीरीज भी अछूती नहीं रह गयी है. हर दूसरे संवाद में गालियां हैं. यह कहना गलत ना होगा. फ़िल्म में 90 के दशक वाले गीत संगीत को रखा गया है. सीरीज की सिनेमेटोग्राफी कहानी के अनुरूप है.

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कोरी

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By कोरी

कोरी is a contributor at Prabhat Khabar.

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