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आजादी का अमृत महोत्सव : बोरदोलोई ने असम को पाकिस्तान में मिलाने के प्लान को किया था नाकाम

Updated at : 01 Aug 2022 12:00 PM (IST)
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आजादी का अमृत महोत्सव : बोरदोलोई ने असम को पाकिस्तान में मिलाने के प्लान को किया था नाकाम

जब असम कांग्रेस की स्थापना हुई. इसी वर्ष गोपीनाथ अपनी जमी -जमाई वकालत छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हुए और राष्ट्र सेवा में कूद पड़े. उनके साथ असम के कई अन्य नेताओं ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया, इनमें प्रमुख थे- नवीन चंद्र बोरदोलोई, चंद्रनाथ शर्मा, कुलाधार चलिहा, तरुण राम पुष्कन आदि .

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आजादी का अमृत महोत्सव : जब देश आजाद होने वाला था, तो उससे पहले 1946 में असम में अंतरिम सरकार बनी, जिसमें गोपीनाथ बोरदोलोई को मुख्यमंत्री बनाया गया. उधर जिन्ना नये पाकिस्तान की रूपरेखा तैयार कर रहे थे. इसके तहत असम को पाकिस्तान में मिलाने की योजना थी. अंग्रेज भी इस प्लान का हिस्सा थे. बोरदोलोई जिन्ना और अंग्रेजों की मंशा भांप चुके थे. इसके खिलाफ उन्होंने कई रैलियां की. साथ ही इसकी सूचना वरिष्ठ नेताओं को दी. इसके बाद कांग्रेस के नेता सक्रिय हुए और जिन्ना का प्लान फेल हो गया. इससे प्रभावित होकर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बोरदोलोई को शेर-ए असम की उपाधि दे दी.

नॉर्थ ईस्ट में स्वतंत्रता आंदोलन को दी धार:

बोरदोलोई का जन्म 6 जून, 1890 को असम के नौगांव जिले के राहा कस्बे में हुआ था. उनके पिता बुद्धेश्वर और माता प्राणेश्वरी ने बचपन से ही उन्हें अच्छी शिक्षा दी. बाद में उन्होंने एमए किया और फिर कलकत्ता विवि से कानून की पढ़ाई की. 20 वीं सदी की शुरुआत में स्वतंत्रता आंदोलन तेज हो गया था. कहा जाता है कि जब असम देश के अन्य हिस्सों से कटा रहता था, तो बोरदोलोई ही वह शख्स थे, जिन्होंने वहां पर स्वाधीनता संग्राम की लौ जलायी. बोरदोलोई भी गांधीजी के अहिंसा की नीति के पुजारी थे. उन्होंने जीवन पर्यंत असम और वहां के लोगों के लिए कार्य किया

बोरदोलोई ने समझ ली थी ब्रिटिश सरकार की मंशा

ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1946 में भारत की आजादी के मसले पर कैबिनेट कमीशन की स्थापना की. ब्रिटिश सरकार की बड़ी चाल यह थी कि भारत के विभिन्न भागों को अलग – अलग बांटने के लिए उन्होंने ग्रुपिंग सिस्टम योजना बनायी, जिसके अंतर्गत राज्यों को तीन भागों में रखा गया. बहुत से नेता ब्रिटिश सरकार की इस चाल को समझ नहीं पाये और योजना को स्वीकृति दे दी. पर गोपीनाथ बोरदोलोई इसके विरोध में खड़े रहे और कहा कि असम के संबंध में जो भी निर्णय किया जायेगा अथवा उसका जो भी संविधान बनाया जायेगा, उसका अधिकार केवल असम की विधानसभा और जनता को होगा. उनकी इसी दूरदर्शिता के कारण असम इस षड्यंत्र का शिकार होने से बच सका और भारत का अभिन्न अंग बना रहा.

छोड़ दी थी जमी-जमायी वकालत आंदोलन की वजह से जाना पड़ा जेल

वर्ष 1922 में असम कांग्रेस की स्थापना हुई. इसी वर्ष गोपीनाथ अपनी जमी – जमाई वकालत छोड़ कर कांग्रेस में शामिल हुए और राष्ट्र सेवा में कूद पड़े. उनके साथ असम के कई अन्य नेताओं ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया, इनमें प्रमुख थे- नवीन चंद्र बोरदोलोई, चंद्रनाथ शर्मा, कुलाधार चलिहा, तरुण राम पुष्कन आदि . अपनी वकालत छोड़ने के बाद गोपीनाथ ने लोगों में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से दक्षिण कामरूप और गोआलपाड़ा जिले का पैदल दौरा किया . उन्होंने लोगों से विदेशी माल का बहिष्कार, अंग्रेजों के साथ असहयोग और विदेशी वस्त्रों के स्थान पर खादी से बने वस्त्रों को पहनने का आह्वान किया . उन्होंने लोगों से यह भी कहा कि विदेशी वस्त्रों के त्याग के साथ – साथ उन्हें सूत कातने पर भी ध्यान देना चाहिए . ब्रिटिश सरकार गोपीनाथ बोरदोलोई के कार्यों को विद्रोह के रूप में देखने लगी, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें और उनके साथियों को गिरफ्तार कर एक वर्ष कैद की सजा दी गयी. सजा समाप्त होने के बाद उन्होंने अपने आप को स्वाधीनता आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया .जब चौरी चौरा कांड के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया, तब गोपीनाथ बोरदोलोई ने गुवाहाटी में फिर से वकालत प्रारंभ कर दिया.

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