Chipko Movement पर गूगल का डूडल : जानें क्या है चिपको आंदोलन? लोग क्यों चिपक जाते थे पेड़ों से...!
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 Mar 2018 8:13 AM
नयी दिल्ली :दुनिया का सबसे बड़ा सर्च इंजन, गूगल आज चिपको आंदोलन की 45वीं सालगिरह मना रहा है. इस खास दिन की अहमियत समझते हुए और मौके को यादगार बनाने के लिए गूगल ने इसके लिए खास डूडल भी तैयार किया है. गूगल ने अपने इस डूडल में आंदोलन के उद्देश्य के अनुसार पेड़ के […]
नयी दिल्ली :दुनिया का सबसे बड़ा सर्च इंजन, गूगल आज चिपको आंदोलन की 45वीं सालगिरह मना रहा है. इस खास दिन की अहमियत समझते हुए और मौके को यादगार बनाने के लिए गूगल ने इसके लिए खास डूडल भी तैयार किया है.
गूगल ने अपने इस डूडल में आंदोलन के उद्देश्य के अनुसार पेड़ के आसपास घेरा बनाकर खड़ी महिलाओं को दिखाया है.
दरअसल चिपको आंदोलन की शुरुआत पर्यावरण की रक्षा के लिए की गयी थी. शांतिपूर्णतरीके से पेड़ों को न काटने का आंदोलन पूरे गांधीवादी तरह से चलाया गया,जिसकी चर्चा दुनियाभर में हुई.
इस आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड राज्य जो तत्कालीन समय में उत्तर प्रदेश का भाग था, के एक छोटे से चमोली जिले में हुई थी. इस आंदोलन में किसानों ने वृक्षों की हो रही कटाई का विरोध प्रदर्शन किया था.
दरअसल, साल 1973 में राज्य के वन विभाग के ठेकेदारों ने जंगलों के वृक्षों पर अपना अधिकार जता कर कटाईशुरू कर दी थी, जिसे रोकने के लिए यह चिपको आंदोलन चलाया गया. इस आंदोलन में वृक्ष के चारों तरफ यानी वृक्षों से चिपक कर किसानों ने वृक्षों की कटाई रोकने की पहल की थी.
1974 में शुरू हुए विश्वविख्यात ‘चिपको आंदोलन’ की प्रणेता गौरा देवी थी. गौरा देवी ‘चिपको वूमन’ के नाम से मशहूर हैं. धीरे-धीरे पूरे उत्तरप्रदेश के हिमालय वाले जिलों में फैल गया.
इस आंदोलन को व्यापक रूप पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा, चंडीप्रसाद भट्ट, गोबिंद सिंह रावत, वासवानंद नौटियाल और हयात सिंह जैसे जागरूक लोगों ने दिया.
इस आंदोलन में बिश्नोई समाज का बड़ा हाथ था. जोधपुर का महाराजा ने जब पेड़ों को काटने का फैसला सुनाया तो बिशनोई समाज की महिलाएं पेड़ से चिपक गयी थीं और पेड़ों को काटने नहीं दिया था. बिश्नोई समाज का नाम भगवान विष्णु के नाम पर पड़ा है.ये लोग पर्यावरण की पूजा करते हैं.
किसानों के इस चिपको आंदोलन के बाद ही केंद्रीय राजनीति में पर्यावरण की सुरक्षा एक मजबूत मुद्दा बना दिया था. यह कहना गलत नहीं होगा कि भारत में 1980 का वन संरक्षण अधिनियम और केंद्र सरकार में पर्यावरण मंत्रालय का गठन भी चिपको आंदोलन की वजह से संभव हो पाया.
1980 में इस आंदोलन ने एक बड़ी जीत हासिल की और इसी के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी हिमालयी वनों में वृक्षों की कटाई पर 15 साल के लिए रोक लगा दी थी.
यही नहीं बाद में इस आंदोलन की सफलता का असर कई राज्यों में देखने को मिला और पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता भी बढ़ी.
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