सात दिन बाद भी लापता 6 बच्चों का कोई सुराग नहीं

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 11 Nov 2016 1:44 AM

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सिलीगुड़ी. बाल सुधार गृह से भागे दस में से छह बच्चे अब भी लापता हैं. सात दिनों के बाद भी इनका कोइ सुराग पुलिस को नहीं मिला है. इन छह बच्चों की कोइ खबर ना तो बाल सुधार गृह(होम) प्रबंधन के पास है और ना ही पुलिस प्रशासन के पास. होम प्रबंधन का कहना है […]

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सिलीगुड़ी. बाल सुधार गृह से भागे दस में से छह बच्चे अब भी लापता हैं. सात दिनों के बाद भी इनका कोइ सुराग पुलिस को नहीं मिला है. इन छह बच्चों की कोइ खबर ना तो बाल सुधार गृह(होम) प्रबंधन के पास है और ना ही पुलिस प्रशासन के पास. होम प्रबंधन का कहना है कि वे बच्चों की तलाश में उनके घर तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि पुलिस भी अपनी ओर से बच्चों को ढूढ़ने की पूरी कोशिश करने की दलील दे रही है.

उल्लेखनीय है कि बीते गुरुवार की सुबह कन्सर्न होम से एक साथ दस बच्चे भाग निकले थे. घटना खबर मिलते ही होम प्रबंधन में हड़कंप मच गया. प्रबंधन की ओर से तुरंत सिलीगुड़ी व आस-पास के सभी स्वयंसेवी संस्थाओ को आगाह किया और साथ निकटवर्ती न्यू जलपाइगुड़ी थाने में मामले की प्राथमिकी दर्ज करायी. स्वयंसेवी संस्थाओ और पुलिस की तत्परता ने उसी दिन चार बच्चों को ढूंढ़ निकाला गया. बाकी छह बच्चों का आज तक कुछ पता नहीं चल पाया है. कन्सर्न संस्था से संपर्क करने पर डक्यूमेंटेशन ऑफिसर श्रेयसी घटक ने बताया कि दस में से चार बच्चों को अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं और पुलिस की मदद से ढूंढ़ लिया गया है.

छह बच्चों का कुछ पता नहीं चला है. हालांकि हम अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहे हैं. लापता उन छह बच्चों के घर तक पहुंचने की कोशिश की जा रही है. इससे पहले भी कइ बार कन्सर्न व अन्य स्वयंसेवी संगठन के चंगुल से बच्चे भाग निकलते हैं. बाद में उनका कुछ पता नहीं चलता है. जिन बच्चों को सड़क से उठाकर, तस्करी व बाल मजदूरी से बचाकर उनके अच्छे भविष्य के लिये इस तरह के होम में लाया जाता है, आखिरकार वहां से बच्चे भागते क्यों हैं? यह एक बड़ा सवाल है.

संगठनों से मिली जानकारी के अनुसार सभी स्वयंसेवी संगठन बच्चों की अच्छी देखभाल करने का उद्देश्य बनाकर ही चलते हैं. इस प्रकार की घटना को रोका नहीं जा सकता है. कन्सर्न होम प्रबंधन से मिली जानकारी के अनुसार यह एक ओपन सेल्टर है. दार्जिलिंग जिले में सरकारी होम नहीं है. कन्सर्न के इस ओपन सेल्टर को प्रशासन एक शॉर्ट होम के रूप में इस्तेमाल कर रही है. कन्सर्न की डक्यूमेंटेशन ऑफिसर श्रेयसी घटक से मिली जानकारी के अनुसार होम में आनेवाले अधिकांश बच्चे स्ट्रीट चाइल्ड होते हैं. इसके अतिरिक्त तस्करी से, बाल मजदूरी से बाल विवाह आदि से बचाये गये बच्चों को जिला चाइल्ड वेलफेयर कमिटी (सीडब्लूसी) के निर्देश पर होम में रखा जाता है. स्ट्रीट चाइल्ड में से अधिकांश ही डेंडराइड व अन्य नशे के आदि होते हैं. नशे की तलब में ये किसी भी हद को पार कर सकते हैं. उन्होंने बताया कि गुरूवार को भी नशेड़ियों के झांसे में आकर कुल दस बच्चे होम से भाग निकले. उन दस बच्चो में से तीन नशे के आदि थे, वे बार-बार नशे की मांग करते थे. गुरूवार की सुबह मौका पाकर अपने साथ और भी सात बच्चों को लेकर भाग निकले. श्रेयसी घटक ने बताया कि उन सभी को दो मंजिले पर रखा गया था. वे लोग खिड़की का ग्रिल स्क्रू ड्राइवर से खोलकर निकल भागे. दो मंजिले की खिड़की से निकलने के चक्कर में सभी जख्मी भी हुए. फिर भी उसी अवस्था भाग निकले. उन्होंने बताया कि होम में रहने वाले बच्चे एक दूसरे से जरूर बातें करते हैं. काउसिलिंग के रूप में मानसिक सहायता किये जाने के बाद भी नशे के आदि बच्चे निकल भागने की योजना बनाते रहते है. इनकी योजना सुनकर अन्य बच्चों को भी घुटन का एहसास होता है और फिर जोश में आकर निकल भागने को तैयार हो जाते हैं. श्रेयसी घटक ने कहा कि जिले में एक भी सरकारी होम नहीं है. फलस्वरूप नेपाल, भूटान व सिक्किम से भागे या सताये बच्चे पकड़ में आने पर प्रशासन सीडब्ल्यूसी को जानकारी दे कर यहां ले आती हैं.

उन बच्चों के साथ स्थानीय बच्चों का मेल-जोल नहीं बढ़ता है. इनके बीच भाषा व अन्य क्रिया कलापों में काफी असमानताएं होती है. इसके अतिरिक्त बच्चों के भागने का कारण और भी है. उन्होंने बताया कि कन्सर्न को सरकारी नियमानुसार ओपन सेल्टर के रूप में बनाया गया था. दिन में कार्यरत महिलाएं अपने बच्चों को दिन भर के लिये यहां छोड़ जायेंगी और फिर लौटते समय ले जायेंगी. इसके अतिरिक्त सीडब्ल्यूसी व प्रशासन की सहायता के लिये शॉर्ट होम की व्यवस्था की गयी. धीरे-धीरे कन्सर्न ओपन सेल्टर एक स्थायी होम में बदलता जा रहा है. यहां तीन बच्चे ऐसे हैं जो पिछले चार माह से रह रहे हैं. कानूनन तीन से चार दिन तक बच्चों को आश्रय देने वाला यह होम चार महीने से बच्चों को रख रहा है. श्रेयसी घटक ने बताया कि अपराधिक इतिहास से जुड़े कुछ बच्चे भी यहां आते हैं. प्रशासन अपनी सुविधा के लिये उम्र आदि कम कर सीडब्ल्यूसी को अपने हिसाब से जानकारी देकर होम में रखवाने की व्यवसथा करती है. जिसका हमें पालन करना पड़ता है. घर से काम के लिये निकले बच्चे या अपराधिक मामलो से जुड़े बच्चे ना तो पढ़ना चाहते और ना ही होम में रहना चाहते हैं. उन्हें काम करने की लालसा रहती है. जबकि वोकेशनल प्रशिक्षण की कोइ व्यवस्था जिले में नहीं है.

उन्होंने आगे बताया कि हमारे यहां 25 बालक और 25 बालिकाओं के रहने की व्यवस्था है. उसी के मुताबिक कर्मचारी भी रखे गये हैं. ऐसे अधिकांशत: यहां बच्चों की संख्या काफी अधिक रहती है. वर्तमान में कन्सर्न होम में कुल 32 बालक और 13 बालिकाएं है.

सरकारी होम बनने की बात हुयी पुरानी

उल्लेखनीय है कि दार्जिलिंग जिले में एक भी सरकारी होम नहीं है. जिसकी वजह से बचाये गये इन बच्चों को कन्सर्न जैसे स्वयंसेवी संगठनो के होम में रखना पड़ता है. कन्सर्न की श्रेयसी घटक ने कहा कि यदि जिले में एक सरकारी होम बन जाये तो काफी हद तक समस्याओं का समाधान हो जायेगा. उन्होंने कहा जिले के कइ स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से जिले में एक सरकारी होम बनाने का प्रस्ताव दिया जा चुका है . उल्लेखनीय है कि पहले भी दार्जिलिंग जिला शासक अनुराग श्रीवास्तव ने दार्जिलिंग जिले में एक सरकारी होम बनाने की बात कही थी. इसके लिये जमीन भी देखी गयी थी, यह परियोजना अभी भी सरकारी पेंच में फंसा हुआ है.

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