कांग्रेस के पूर्व दिग्गज पर ममता बनर्जी ने जताया भरोसा

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कांग्रेस के गढ़ में तृणमूल ने कांग्रेस के ही एक पूर्व विधायक पर अपना दांव खेला है. उत्तर दिनाजपुर जिले के ग्वालपोखर विधानसभा केंद्र को आज भी कांग्रेस का गढ़ माना जाता है. एक तरह से देखा जाये तो यहां अभी कांग्रेस के बीमार नेता तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दास मुंशी के नाम का […]

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कांग्रेस के गढ़ में तृणमूल ने कांग्रेस के ही एक पूर्व विधायक पर अपना दांव खेला है. उत्तर दिनाजपुर जिले के ग्वालपोखर विधानसभा केंद्र को आज भी कांग्रेस का गढ़ माना जाता है. एक तरह से देखा जाये तो यहां अभी कांग्रेस के बीमार नेता तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रियरंजन दास मुंशी के नाम का डंका बजता है. कांग्रेस के अलावा माकपा के शरीक दल फॉरवार्ड ब्लॉक के समर्थक भी काफी हैं.
सिलीगुड़ी : 1972 से लेकर 2001 तक फॉरवार्ड ने लगातार इस सीट पर अपना कब्जा बनाये रखा. कांग्रेस व फॉरवार्ड ब्लॉक के विधायकों के इतने वर्ष तक रहने के बाद भी यहां समस्याओं का अंबार लगा हुआ है.
पेयजल की समस्या काफी पुरानी है. पेयजल में आर्सेनिक व आयरन इतना अधिक है कि यहां के लोगों के स्वास्थ्य पर इसका सीधा असर पड़ रहा है. नागरिकों को बरगला कर राजनीतिक पार्टियां सिर्फ वोट बैंक की राजनीति कर रही है. आज के इस अत्याधुनिक दौर में भी उत्तर दिनाजपुर जिले का ग्वालपोखर विधानसभा सीट सबसे अधिक पिछड़ा इलाका माना जाता है.
पेयजल के अलावा स्वास्थ्य, शिक्षा और सड़क व्यवस्था की हालत भी काफी खराब है. बिजली के खंभे और तार ग्रामीण इलाकों तक पहुंचाये गये हैं.हांलाकि बिजली नहीं मिलने की शिकायत लोग करते हैं.स्थानीय लोगों ने इस बार विकास के नाम पर मतदान करने का निर्णय लिया है.
अधिकांश लोग जहां माकपा समर्थित कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में हैं वहीं कुछ लोग ममता बनर्जी से भी प्रभावित हैं. स्थानीय लोगों के साथ बातचीत के बाद कुछ इसी प्रकार के परिणाम सामने आये हैं.
तृणमूल कांग्रेस ने इस बार जिसे अपना उम्मीदवार बनाया है वर्ष 2011 से पहले वह कांग्रेस की शान थे. वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में दीदी की तूती बोल रही थी लेकिन तृणमूल ने इस सीट पर अपना उम्मीदवार तक खड़ा नहीं किया. इस चुनाव में कांग्रेस के गुलाम रब्बानी ने फॉरवार्ड उम्मीदवार को 13 हजार 413 वोटों से परास्त किया था. जीत मिलते ही गुलाम रब्बानी तृणमूल में शामिल हो गये. इस बार के चुनाव में दीदी ने गुलाम रब्नी पर भरोसा जताते हुए उम्मीदवारी सौंपी है.
वर्ष 1957 में कांग्रेस के मुज्जफर हुसैन यहां से पहले विधायक बने. इसके बाद 1962 से लेकर लगातार तीन बार प्रजा समाजवादी पार्टी ने इस सीट पर कब्जा बनाये रखा. 1962 में मोहम्मद हयात अली एवं 1967 में मोहम्मद सलीमुद्दीन विजयी हुए.
वर्ष 1971 के चुनाव में कांग्रेस के शेख शराफत हुसैन ने प्रजा समाजवादी पार्टी से यह सीट छीन ली़ इसके बाद फॉरवार्ड ब्लॉक के मो़ रमजान हुसैन ने यहां कब्जा जमाया. रमजान हुसैन इस सीट से लगातार चार बार विजयी होकर 1996 तक विधायक बने रहे. 1996 के चुनाव में फॉरवार्ड ब्लॉक के हाफिजी आलम सैरानी यहां से विजयी हुए, 2001 के विधानसभा चुनाव में भी इस सीट पर अपना कब्जा उन्होंने बरकरार रखा.
प्रियरंज दासमुंशी की पत्नी दीपा दासमुंशी ने वर्ष 2006 में फिर से इस सीट को कांग्रेस की झोली में डाल दिया़. वर्ष 2009 में सांसद बनने की वजह से दीपा दासमुंशी ने विधायक पद से इस्तीफा दिया. 2009 के उप चुनाव में फॉरवार्ड ब्लॉक के अली इमरान रम्ज विजयी हुए. वर्ष 2011 के विधानसभा चुनाव में गुलाम रब्बानी ने फॉरवार्ड ब्लॉक के सैफूर रहमान को धूल चटा दी थी.
वहीं भाजपा, बीएसपी, एसयूसीआई व निर्दलीय उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गयी. वर्ष 2011 के चुनाव में 1 लाख 70 हजार 158 मतदाताओं में से मात्र 73.46 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था.
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