चाय के बाद दार्जिलिंग के नारंगी ने भी तोड़ा दम

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भूकंप से हुआ भारी नुकसान, उत्पादन में 70 प्रतिशत की कमी, किसान और मजदूर परेशान, बांग्लादेश में निर्यात पूरी तरह से बंद नागपुर के संतरे ने बनाइ पकड़, राज्य सरकार पूरी तरह से उदासीन सिलीगुड़ : विश्व प्रसिद्ध दार्जिलिंग चाय की खस्ताहाली के बाद अब दार्जिलंग के स्वादिष्ट नारंगी की बारी है़ पूरे पर्वतीय क्षेत्र […]

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भूकंप से हुआ भारी नुकसान, उत्पादन में 70 प्रतिशत की कमी, किसान और मजदूर परेशान, बांग्लादेश में निर्यात पूरी तरह से बंद
नागपुर के संतरे ने बनाइ पकड़, राज्य सरकार पूरी तरह से उदासीन
सिलीगुड़ : विश्व प्रसिद्ध दार्जिलिंग चाय की खस्ताहाली के बाद अब दार्जिलंग के स्वादिष्ट नारंगी की बारी है़ पूरे पर्वतीय क्षेत्र में नारंगी की खेती दम तोड़ने के कगार पर है़ वर्ष 2012 से इसकी बदहाली शुरू हुयी और अब तो यह एक तरह से खत्म होने के कगार पर है़
यही वजह है कि इस बार दार्जिलिंग नारंगी के पैदावार में करीब सत्तर प्रतिशत की गिरावट आयी है़ प्राप्त जानकारी के अनुसार राज्य सरकार की उदासीनता और पिछले वर्ष आए भूकंप ने इस उद्योग की कमर तोड़ दी है़ नारंगी की खेती और कारोबार से जुड़े लोगों से प्राप्त जानकारी के अनुसार भूकंप की वजह से दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र की जमीन खिसक गयी है़
जिसकी वजह से नारंगी के पेड़ सूख रहे हैं. इसके अलावा एक प्रकारी की विशेष बीमारी ने भी नारंगी के पेड़ों को अपने चपेट में ले लिया है़ इस बीमारी ने वर्ष 2012 से ही नारंगी के पेड़ो को बीमार बना दिया है़ जिसकी वजह से उत्पादन तो कम हो ही रहा है साथ ही नारंगी के स्वाद और आकार में भी भारी कमी आयी है़ अब दार्जिलिंग नारंगी का आकार काफी छोटा हो गया है़ इसके अलावा नारंगी के फलों में कीड़े भी लग रहे हैं.इसी वजह से उत्पादन में भारी कमी आयी है़ एक अनुमान के अनुसार पहले पहाड़ से करीब 100 ट्रक नारंगी सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट में आते थे़ अब यह नजारा बदल गया है़ रेगुलेटेड मार्केट के नारंगी व्यवसायी पहाड़ से नारंगियों के आने की राह तकते रहते हैं.
अब मात्र चार से पांच ट्रक प्रतिदिन नारंगियों की ही आवक है़ स्वाभाविक है,इसकी वजह से नारंगियों के दाम भी काफी बढ़ गए हैं.
नारंगी के एक थोक बिक्रेता आकाश देवनाथ ने बताया कि लोग बढ़ी कीमतों पर भी दार्जिलिंग की नारंगी खरीदना चाहते हैं,लेकिन समस्या यह है कि आवक ही नहीं के बराबर है़ इसी वजह से अब नागपुर के संतरों ने सिलीगुड़ी सहित पूरे उत्तर बंगाल के बाजार में अपनी पकड़ बना ली है़ नागपुर के संतरे की कीमत कम भी पड़ती है़
अकेले सिलीगुड़ी में प्रतिदिन 10 ट्रक नागपुरी संतरे की आवक है़ सबसे उम्दा क्वालिटी के नागपुर संतरे की कीमत सिलीगुड़ी के खुदरा बाजार में सात से आठ सौ रूपये प्रति सैकड़ा है़ जबकि चार सौ से पांच सौ रूपये प्रति सैकड़े की दर से भी नागपुर के संतरे मिल जाते हैं. दार्जिलिंग में संतरे की खेती करने वाला एक किसान रबीन राइ ने बताया कि पिछले तीन वर्षो से संतरे के उत्पादन में लगातार गिरावट आ रही है़ इसक अलावा भूकंप ने तो इस उद्योग की कमर ही तोड़ दी़
कइ बार कृषि विभाग से इस बात की शिकायत की गयी,लेकिन कोइ लाभ नहीं हुआ़ संतरे की खेती को इतना बड़ा नुकसान होने के बाद भी राज्य सरकार की नींद नहीं टूटी है़
किसानो के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वो अपने दम पर मिट्टी की जांच करायें और संतरे की फसल को होने वाली बीमारियां से निपटे़ पहाड़ पर संतरे के उत्पादन में कमी होने से काफी मजदूर भी बेकार हो गए है़ पहले संतरे को तोड़ने से लेकर उसको पैक आदि करने के काम में काफी मजदूर लगे रहते थे़ अब ऐसी स्थिति नहीं है़ उत्पादन कम है तो पैकिंग का काम भी कम हो गया है़
स्वभाविक रूप से कइ मजदूर बेकार हो गया हैं.एक मजदूर रीना साहा ने कहा कि पहले दार्जिलिग से संतरे को ट्रकों पर लाद कर लाया जाता था और उसकी पैकिंग यहां होती थी़ यहां से पैकिंग की संतरे को उत्तर बंगाल में अन्य स्थानों पर भेजा जाता था़ इसके अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी दार्जिलिंग के संतरे की भारी मांग है़
अब न तो दार्जिलिंग संतरे की उतनी आवक है और ना ही पैकिंग का काम़ रीना साहा ने बताया कि वह पहले हर दिन ही पैकिंग के काम मे लगी रहती थी़ अब कभी कभी ही काम मिल रहा है़ यदि यही आलम रहा तो एक दिन वह पूरी तरह से बेरोजगार हो जायेगी़ इसबीच,संतरे के कम उत्पादन का असर इसके निर्यात पर भी पड़ा है़
पहले बांग्लादेश में नारंगी संतरे का बड़े पैमाने पर निर्यात होता था,जो अब पूरी तरह से बंद है़ एक एक्सपोर्टर गोपाल प्रसाद का कहना है कि राज्य सरकार की उदासीनता की वजह से ही स्थिति इतनी खराब हुयी है़ यदि राज्य सरकार ने जल्द कोइ कार्यवाही नहीं की तो विश्व प्रसिद्ध यह संतरा भी पहाड़ से लुप्त हो जायेगा़ श्री प्रसाद ने कहा कि अब ऐसे स्थानों पर संतरे की खेती होने लगी है,जहां इसके होने की उम्मीद नहीं थी़
महाराष्ट्र के अलावा गुजरात,हरियाणा और राजस्थान में भी संतरे की खेती होने लगी है़ ऐसा वहां के किसानों के साथ ही वहां की राज्य सरकारों की वजह से ही संभव हुआ है़ दूसरी तरफ दार्जिलिंग जहां संतरे की पारंपरिक खेती होती रही है,वहीं यह अब दम तोड़ रहा है़
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