जिले में कुटीर उद्योग का रूप ले रहा मुखौटा शिल्प
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 18 Jul 2019 12:59 AM
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महिषबाथान गांव में बने मुखौटे गोवा, मुंबई, राजस्थान, पंजाब और तमिलनाडु के शहरों में पा रहे शोभा रायगंज : दक्षिण दिनाजपुर जिला सदर बालुरघाट से 75 किमी की दूरी पर स्थित है महिषबाथान गांव. इस गांव को खुनियाडांगी के नाम से भी लोग जानते हैं. गांव की साढ़े चार सौ आबादी मुखौटा शिल्प से अतिरिक्त […]
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महिषबाथान गांव में बने मुखौटे गोवा, मुंबई, राजस्थान, पंजाब और तमिलनाडु के शहरों में पा रहे शोभा
रायगंज : दक्षिण दिनाजपुर जिला सदर बालुरघाट से 75 किमी की दूरी पर स्थित है महिषबाथान गांव. इस गांव को खुनियाडांगी के नाम से भी लोग जानते हैं. गांव की साढ़े चार सौ आबादी मुखौटा शिल्प से अतिरिक्त आय कर रहे हैं. जानकारी अनुसार यह शिल्प मुख्य रुप से राजवंशी समुदाय में लोकायत जीवन दर्शन पर आधारित है. हालांकि कई लोगों का मानना है कि उत्तरबंगाल में भूटान के लोगों का भी आवागमन रहा है. वहां के महायान बौद्ध मत में भी मुखौटा नृत्य विख्यात है. इस नृत्य को छाम-नृत्य कहते हैं.
स्थानीय लोगों के अनुसार राजवंशी लोगों में गम्भीरा पूजा का प्रचलन था. इसी पूजन उत्सव को लेकर मुखौटे बनाने का रिवाज चला जो आज भी कायम है. हालांकि आज वह पूजा लुप्तप्राय हो गयी है. महिषबाथान के लोग बांस, सोला से मुखौटा बनाते हैं जो बेहद आकर्षक होते हैं. इन कलाकृतियों को गोवा, मुंबई, राजस्थान, पंजाब, तमिलनाडू के बड़े बड़े मेलों में बिकते हैं. इस कलाकृति के निर्माण में ये लोग नीम की लकड़ी का खासतौर से इस्तेमाल करते हैं.
इनकी बिक्री से इन ग्रामीणों को अतिरिक्त आय हो जाती है. ये मुखौटे विभिन्न राज्यों के शहरों के आभिजात्य वर्ग के घरों में शोभा पा रहे हैं. ये कलाकार सहकारी समिति के माध्यम से अनुभवी कलाकारों के मार्गदर्शन में इस कला का व्यावहारिक ज्ञान हासिल करते हैं. इस कला के जरिये ये राजवंशी अपनी पुरानी परंपरा को भी कायम रखे हुए हैं. दक्षिण दिनाजपुर जिले के लोगों में इस बात की चर्चा हो रही है कि भविष्य में जिले में विश्वविद्यालय बनने की संभावना है. अगर ऐसा होता है तो महिषबाथान इस जिले का दूसरा शांति-निकेतन बन सकता है.
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