‘भोरेर आलो’ के नये रास्ते से पर्यावरणप्रेमी चिंतित
Updated at : 24 Jun 2019 5:07 AM (IST)
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छोटी गाड़ियों की बेलगाम संख्या ने चिंता बढ़ायी जंगल और वन्य प्राणियों पर हो सकता है बुरा असर पर्यावरण अनुकूल वाहन चलाने की उठी मांग सरस्वती रानी दे, सिलीगुड़ी : गाजोलडोबा बैराज को एक बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में सजाने में राज्य पर्यटन विभाग जुटा हुआ है. यहां बनाये जा रहे पर्यटक हब ‘भोरेर […]
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- छोटी गाड़ियों की बेलगाम संख्या ने चिंता बढ़ायी
- जंगल और वन्य प्राणियों पर हो सकता है बुरा असर
- पर्यावरण अनुकूल वाहन चलाने की उठी मांग
सरस्वती रानी दे, सिलीगुड़ी : गाजोलडोबा बैराज को एक बेहतरीन पर्यटन स्थल के रूप में सजाने में राज्य पर्यटन विभाग जुटा हुआ है. यहां बनाये जा रहे पर्यटक हब ‘भोरेर आलो’ के जरिये आसपास के बेहद पिछड़े इलाके में बसे लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं. बहुत से स्थानीय लोग वहां पहुंचनेवाले पर्यटकों को कच्ची सब्जी व मछली, पकौड़े, मछली का चॉप, भजिया आदि बेचकर रोजगार में लग गये हैं.
अधिक से अधिक लोग वहां पहुंचे, इसके लिए सिलीगुड़ी से गाजोलडोबा जाने का नया रास्ता बनाया गया है. लेकिन यह नया रास्ता पर्यावरणप्रेमियों को चिंता में डाल रहा है. उन्हें डर सता रहा है कि कहीं इससे वन्यजीवन पर बुरा असर नहीं पड़े.
सालुगाड़ा स्थित बंगाल सफारी से गाजोलडाबा के लिए बने नये रास्ते ने दूरी को नौ किलोमीटर कम कर दिया है. जंगल से गुजरनेवाली एक पगडंडी को सड़क का रूप दिया गया है. यह सड़क महानंदा अभयारण्य, सरस्वतीपुर चाय बागान व बस्ती से होते हुए सीधे भोरेर आलो के पास निकलती है.
जब तक पगडंडी थी, यहां से केवल वनकर्मी व सरस्वतीपुर चाय बागान जानेवाले इक्का-दुक्का लोग पैदल या गाड़ी से गुजरते थे. लेकिन अब आम रास्ता होने के बाद गाड़ियों की संख्या बढ़ने लगी है. जंगल के बीच से गुजरने के रोमांच के लिए बहुत से लोग सिलीगुड़ी से गाजोलडाब के ड्राइव पर निकल पड़ रहे हैं. गाड़ियों की बढ़ी संख्या ही पर्यावरणप्रेमियों को चिंता में डाल रही है.
नयी सड़क से भारी वाहन नहीं गुजरें, इसके लिए दोनों छोर पर गेट लगाने की बात पर्यटन मंत्री ने कही है. लेकिन छोटी गाड़ियों की संख्या पर कोई नियंत्रण नहीं होगा. इस रास्ते से होकर हाथियों, जंगली सुअर व अन्य वन्यप्राणियों का आना-जाना रहता है. गाड़ियों की आवाजाही बढ़ने से जंगली जानवरों के इंसानों के संघर्ष की नयी कहानी की शुरुआत भी हो सकती है. गाड़ियों के धुएं से भी जंगल का पारिस्थितकी तंत्र भी प्रभावित हो सकता है.
ऐसे में पर्यावरणप्रेमियों की ओर से मांग उठ रही है कि अगर जंगल के बीच से पर्यटकों को ले जाना ही है तो इसके लिए बैटरी चालित विशेष सफारी गाड़ियों की व्यवस्था की जाये. इससे एक ओर जहां पर्यटक आकर्षित होंगे, वहीं पर्यावरण को बचाना भी संभव होगा. पर्यावरणप्रेमी अनिमेष बोस ने बताया कि उत्तर बंगाल के विभिन्न संरक्षित जंगलों जैसे महानंदा अभयारण्य, जलदापाड़ा टाइगर रिजर्व में सफारी की व्यवस्था है. वहां डीजल की जगह खास पेट्रोल गाड़ियों को ले जाने की अनुमति है, जिनसे प्रदूषण कम फैलता है.
गाजोलडोबा के नये रास्ते का हाथी तथा अन्य जंगली जानवर अपने कॉरिडोर के रूप में इस्तेमाल करते हैं. उन्होंने कहा कि इसे रास्ते पर गाड़ियों की संख्या नियंत्रित रखी जाये तथा पर्यावरण के अनुकूल गाड़ियां ही चलायी जायें, ताकि पर्यावरण के साथ पर्यटन का संतुलन बना रहे.
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