सिलीगुड़ी : घट रहे हैं कला के कद्रदान, निकली कारीगरों की जान

Published at :07 Apr 2018 5:31 AM (IST)
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सिलीगुड़ी : घट रहे हैं कला के कद्रदान, निकली कारीगरों की जान

परिवार के बच्चे अब इस कला को कायम नहीं रखना चाहते विशाल गोस्वामी सिलीगुड़ी : आधुनिकता के इस बदलते दौर में मानव जाति अपनी कला तथा संस्कृति को भूलता जा रहा है. इसी क्रम में अनेकों ऐसी कलाएं हैं जो धीरे-धीरे लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं. वैसे वे विलुप्त भी क्यों ना […]

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परिवार के बच्चे अब इस कला को कायम नहीं रखना चाहते
विशाल गोस्वामी
सिलीगुड़ी : आधुनिकता के इस बदलते दौर में मानव जाति अपनी कला तथा संस्कृति को भूलता जा रहा है. इसी क्रम में अनेकों ऐसी कलाएं हैं जो धीरे-धीरे लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी हैं. वैसे वे विलुप्त भी क्यों ना हो? क्योंकि इन सब हाथ से बने सामानों की जगह चीन निर्मित वस्तुओं ने ले लिया है. ये दाम में कम तथा टिकाउ भी होते है. हम यहां ऐसी ही एक कला बांस से बने सामानों की बात कर रहे हैं. जिससे लोग धीरे-धीरे अपना मुंह मोड़ रहे हैं. उल्लेखनीय है कि किसी जमाने में लोगों के घरों के रसोई से लेकर उनके शयनकक्ष की अधितकर वस्तुए बांस की बनी होती थी.लेकिन आज बांस से बने साज समान वाली वस्तुओं का प्रचलन एक तरह से समाप्त ही हो गया है.
अब कुछ-कुछ वस्तुएं ही ऐसी रह गयी है जिनकी आवश्यकता अब किसी खास मौके पर ही रह गयी है. अब इसी मौके के इंतजार में तो नहीं बैठा रहा जा सकता. इस कला के कलाकारों को आय के लिए पूरे साल काम चाहिए. लेकिन जब मांग ही नहीं रहेगी तो भला काम कहां से होगा. इसी वजह से इस कला को अभी भी ठिकाये रखने वाले कारीगरों को अपने परिवार का भरण पोषण करने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है.कारीगरों ने राज्य तथा केंद्र सरकार का ध्यान इस ओर आकर्षित करते हुए सहयोग की अपील किया है.
परिवार चलाना हुआ मुश्किल
कारीगरों को अपने परिवार का पेट पालने के लिए दो वक्त की रोटी कमाने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. उन कारीगरों ने बताया कि अब उनकी पीढ़ी में कुछ गिने चुने लोग ही बचे हैं जो इस काम को कर रहे है.जब एक दिन वह भी नहीं रहेंगे तो शायद ये कला इतिहास के पन्नों में कहीं कैद होकर रह जायेगी. इस कला को बरकरार रखने के लिए कृष्णा, सुरेश, उमेश जैसे टोकरी बुनने वाले तथा बांस द्वारा सजावट के समान बनाने वालों ने सरकारों से सहायता कि अपील की है.
पुरखों की परंपरा को कुछ ही कलाकार बचा कर रखे हुए हैं
चक्करमारी इलाके के टोकरी बनाने वाले कारीगर सुरेश महतो,कृष्णा महतो, रुपम महतो, उमेश महतो आदि ने बताया कि वे पिछले 40-45 वर्षों से इस काम को करते आ रहे हैं. उनलोगों ने ये कला अपने बाप दादा से सीखी थी. लेकिन आज उन्हीं के बच्चे इस काम को करने से कतराते है.
इसके पीछे केवल एक ही कारण है. बाजारों में इनकी मांग पिछले दस बारह वर्षों में काफी कम हो गयी है. अब लोगों के घरों में बांस की कालाकृति की जगह प्लास्टिक तथा चीन की बनी वस्तुओं ने ले ली है. उन्होंने आगे जानकारी देते हुए कहा कि किसी दौर में उनके द्वारा बनाई गई बांस की वस्तुएं जैसे टोकरी,ढ़ाकी, विभिन्न सजावट की वस्तुओं की सप्लाई सिलीगुड़ी, जलपाईगुड़ी के साथ ही बंगाल, बिहार यहां तक की पड़ोसी देश नेपाल में भी होती थी.
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