सिलीगुड़ी की कहानी महानंदा की जुबानी : 5 अंग्रेजों ने भूटान से लीज पर लेकर बनाया दार्जिलिंग का गेट-वे

Published at :15 Oct 2017 8:50 AM (IST)
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सिलीगुड़ी की कहानी महानंदा की जुबानी : 5  अंग्रेजों ने भूटान से लीज पर लेकर बनाया दार्जिलिंग का गेट-वे

मैं महानंदा हूं. जिस तरह से मेरी धाराएं अनंत यात्रा पर निकलते हुए पहले गंगा के साथ और उसके बाद सागर में मिल जाती हैं उसी तरह मेरा शहर सिलीगुड़ी भी मेरे ही सामने लगातार विकसित होता हुआ उत्तरोत्तर विस्तार लाभ कर रहा है. मेरी कहानी की ही तरह सिलीगुड़ी की कहानी भी कम रोचक […]

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मैं महानंदा हूं. जिस तरह से मेरी धाराएं अनंत यात्रा पर निकलते हुए पहले गंगा के साथ और उसके बाद सागर में मिल जाती हैं उसी तरह मेरा शहर सिलीगुड़ी भी मेरे ही सामने लगातार विकसित होता हुआ उत्तरोत्तर विस्तार लाभ कर रहा है. मेरी कहानी की ही तरह सिलीगुड़ी की कहानी भी कम रोचक नहीं है. जिस तरह दार्जिलिंग को ब्रिटिश सरकार ने तत्कालीन सिक्किम से लीज पर लिया था और उसे हिल स्टेशन की रानी बना दिया उसी तरह से सिलीगुड़ी को भी ब्रिटिश भारत सरकार ने भूटान से मात्र 2000 रुपए के वार्षिक कर के एवज में 1842 में अधिग्रहण किया था. इस तरह से उसने सिलीगुड़ी और जलपाईगुड़ी को बसाया. ब्रिटिश सरकार ने 1860 में कर देना बंद कर दिया, पर उसका अधिकार इन इलाकों पर कायम रहा.
सिलीगुड़ी: सिक्किम के छोग्याल ने सिलीगुड़ी को ब्रिटिश सरकार को एक फरवरी 1835 को हस्तांतरित किया. (दुलाल दास के अनुसार) उस समय भी सिलीगुड़ी को दार्जिलिंग का गेट-वे कहा जाता था. उस समय सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग जाने में 86 घंटे लगते थे. 1842 में पहली सड़क सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग वाया पंखाबाड़ी बनी. 1860 में सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग जानेवाली वाली सड़क हिलकार्ट रोड का निर्माण कार्य शुरु हुआ जो 1869 में पूरा हुआ. उस समय सिलीगुड़ी से साहेबगंज तक सड़क निर्माण की योजना ली गयी. इस सड़क का दो भागों में निर्माण हुआ. एक गंगा से सिलीगुड़ी और दूसरा सिलीगुड़ी से दार्जिलिंग. इसके बाद सिलीगुड़ी का महत्व उत्तरोत्तर बढ़ने लगा. 1860 में रेल कंपनी ने साहेबगंज तक रेलमार्ग का विस्तार किया. 1878 में सिलीगुड़ी तक सड़क का विस्तार हुआ. 1881 में रेलमार्ग तैयार होने पर उसका नामकरण सिलीगुड़ी-दार्जिलिंग ट्राम-वे रखा गया. उसके बाद उसका नाम बदलकर दार्जिलिंग-हिमालयन रेलवे रखा गया. उस समय रेलमार्ग का विस्तार किशनगंज तक किया गया. 1902 में सिलीगुड़ी से बागराकोट तक और फिर उसका असम तक विस्तार किया गया. कलकत्ता से सिलीगुड़ी और यहां से असम जाने वाले यात्रियों का यहां आगमन होने लगा. 1918 में सिलीगुड़ी तक रेलमार्ग का विस्तार हुआ. 1915 में पद्मा नदी (बांग्लादेश) पर तत्कालीन हार्डिंग ब्रिज का निर्माण हुआ. उसी समय सिलीगुड़ी से सीधे कलकत्ता तक का रेल संपर्क हार्डिंग ब्रिज होते हुए शुरू हुआ. इसके पूर्व पाकासी और भेड़ामारा के बीच प्रवाहित पद्मा नदी को यात्री स्टीमर से पार करते थे.
1890 में खुला स्कॉच मिशनरी प्राइमरी स्कूल: सन 1890 में शहर में पहली बार डीआइ फंड मार्केट में स्कॉच मिशनरी प्राइमरी स्कूल की स्थापना हुई. वह स्कूल आज भी वहीं पर स्थित है. हालांकि उसका ढांचा पहले से काफी निखरा है. उसे पादरी स्कूल के नाम से लोग जानते थे. स्कूल की स्थापना रेवरेन फादर तूलक ने की थी. 20 वीं सदी के प्रथम चरण में एक मिडल इंगलिश स्कूल क्वींस स्कूल के नाम से की गई. स्कूल की स्थापना कैप्टन जैकब ने की थी और उस स्कूल के प्रथम प्रधानाचार्य बने शिवपूजन पांडेय जिनकी ख्याति सामाजिक कार्यकर्ता के रुप में एसपी पांडेय के नाम से हुई. सुरेंद्र नाथ भट्टाचार्य के प्रयास से 1918 में एक बांग्ला माध्यम के स्कूल की स्थापना की गई. वही बाद में ब्वॉयज हाई स्कूल के नाम से मशहूर हुआ. स्कूल के प्रधान शिक्षक थे प्रख्यात रंगकर्मी सुधींद्र नाथ राहा. 1928 में सिलीगुड़ी बेंगॉली गर्ल्स प्राइमरी स्कूल. वर्तमान में वही ज्योत्सनामयी उच्च माध्यमिक बालिका विद्यालय है.
स????िलीगुड़ी के विभिन्न जोत: सिलीगुड़ी शहर रूप में बसने से पहले यह एक बड़ा सा गांव था. 1930 में देशबंधुपाड़ा का नाम राजराजेश्वरी जोत था जबकि हाकिमपाड़ा का नाम ब्रजसिंह जोत था. भारतनगर का नाम जोगेन जोत था जबकि महानंदापाड़ा का नाम लम्बदास मोहनजोत था और बाबूपाड़ा का नाम सबुरजोत था. आज जहां सेठश्रीलाल मार्केट है वह जगह खाली थी. उसके पूर्वी हिस्से में विधान मार्केट था. वहां धान सुखाया जाता था. बारिश में धान को बचाने के लिये उसे बिस्कुट के टिन से ढका रहता था. धान के भूसे से धान को उबाला जाता था. टिन के घरों में धान की बोरियां जमा रहती थीं. बॉयलर से धुआं निकलता था.

इस जगह का नाम बेंगॉल राइस मिल था. इसी बेंगॉल राइस मिल वाली जमीन में सेठश्रीलाल मार्केट बना. आज यह शहर का एक पॉश मार्केट कांप्लेक्स है. 60-70 के दशक तक सिलीगुड़ी में मल्टीप्लेक्स सिनेमा हॉल की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी. 60 के दशक में सिनेमा हॉल के नाम से केवल मेघदूत सिनेमा हॉल था. बाद में टाउन स्टेशन के रेलवे इंस्टीच्यूट को भी टॉकिज का रुप दे दिया गया.

यह न्यू सिनेमा के नाम से आज भी यह एसी सिनेमा हॉल बना हुआ है. उसके बाद दूसरा सिनेमा हॉल बना झंकार सिनेमा जो अब बंद हो चुका है. लेकिन झंकार मोड़ के नाम से उसकी स्मृति आज भी बनी हुई है. बाद में आनंदलोक और विश्वदीप के बाद बनने वाले सिनेमा हॉल थे पायल और विशाल. सामुदायिक हॉल में तब केवल मित्र सम्मिलनी का हॉल था जहां नाटकों का मंचन समेत सांस्कृतिक और राजनैतिक कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं. दीनबंधु मंच का निर्माण 80 के दशक में वाममोर्चा सरकार के कार्यकाल में हुआ. मेघदूत सिनेमा औरा विवेकानंद मार्केट के पीछे वाले हिस्से को रजनी बागान बोला जाता था. न्यू सिनेमा हॉल के समीपवर्ती इलाके में रेलवे इंजन में पानी लिया जाता था. इसीलिये इस जगह का नाम पड़ा पानीटैंक. जाजोदिया मार्केट की जगह एक तालाब था. वहां आसपास के पुरुष महिलाएं स्नान करते थे.

चाय उद्योग ने बदली सिलीगुड़ी की तकदीर
सिलीगुड़ी की विकास-यात्रा सबसे पहले चाय उद्योग से शुरू हुई. सन 1856 में ब्रिटिश सरकार ने चाय की खेती शुरू की. दार्जिलिंग में उत्पादित चाय को कोलकाता होकर देश व विदेश भेजा जाने लगा. धीरे धीरे सिलीगुड़ी चाय के व्यापार का एक प्रमुख केंद्र के बतौर विकिसत हुआ और फिर सिलीगुड़ी का महत्व बढ़ने लगा. एक सौ साल पहले सिलीगुड़ी के आसपास घने जंगल थे. सुकना में तब बाघ पानी पीने आया करते थे, जिन्हें स्थानीय लोगों ने अपनी आंखों से देखा है. धीरे धीरे चाय और लकड़ी का व्यवसाय फलने-फूलने के चलते यहां की आबादी बढ़ने लगी जिसके बाद आसपास के जंगल साफ किये जाने लगे. हालांकि यह मानना पड़ेगा कि ब्रिटिश शासक आधुनिक विज्ञान के पोषक थे. उन्होंने जंगलों की कटाई से होने वाले दुष्प्रभावों को महसूस किया. वनों के संरक्षण के लिये उन्होंने सुकना में वन विभाग की स्थापना की. आज तो वहां बाजार से थोड़ा हटकर एक संग्रहालय भी है जहां तराई अंचल की जैव विविधता की सजीव जानकारी के अलावा वन्य प्राणियों के बारे में जरूरी जानकारी मिलती है.

गैंजेस रोड अब बन गया है वर्द्धमान रोड
उस समय बाहर से सिलीगुड़ी होते हुए दार्जिलिंग जाने के लिए गैंजेस रोड से होकर गुजरना पड़ता था. वर्तमान में यह वर्द्धमान रोड के नाम से परिचित है. उस समय भी यह सड़क 50 फीट चौड़ी थी. सड़क की लंबाई 126 मील थी. बिहार की गंगा से काढ़ागोलाघाट से पूर्णिया, डोंगराघाट, किशनगंज, तेंतुलिया होते हुए सिलीगुड़ी तक विस्तृत थी. बाद में इसका विस्तार कर्सियांग तक किया गया. ब्रिटिश सरकार ने इस सड़क के निर्माण में वर्दवान के महाराजा की मदद ली थी. इसी वजह से इसका नामकरण वर्दवान रोड पड़ा जो बाद में वर्द्धमान रोड हो गया. उस समय इस सड़क से होकर यात्रा करने में सात से आठ रोज लगते. 15-16 मील बैलगाड़ी या पालकी में यात्रा करनी होती थी. बीच बीच में बने होते थे सराय जहां यात्री रात्रिवास करते थे. उसके अगले रोज फिर सफर शुरू हो जाता. उसी समय जलपाईमोड़ से आलूपट्टी तक स्टेशन फीडर यानी एसएफ रोड बनाया गया.
आवागमन की सुविधा के साथ बढ़ी आबादी
आवागमन की सुविधा बनने के बाद सिलीगुड़ी में आबादी बढ़ने लगी. खास तौर पर वकील, काठ व्यवसायी और रेलवे में काम करने वाले कर्मचारियों का आगमन शुरू हुआ. साथ में आये बिहार व छोटानागरपुर डिवीजन से आदिवासी समुदाय के लोग जिनसे चाय बागान आबाद होने लगे. सबसे पहले वर्तमान के महानंदापाड़ा में लोग बसे. वर्तमान सिलीगुड़ी बनने के बाद पुरानी सिलीगुड़ी हालांकि पृष्ठभूमि में चली गयी लेकिन उसका वाणिज्यिक महत्व आज भी खालपाड़ा और नेहरू बाजार के रूप में कायम है. पुरानी सिलीगुड़ी वर्तमान की मिलनपल्ली है. उस समय रविवार और बुधवार को डीआइ फंड मार्केट में हाट लगती थी. यहां मारवाड़ी, बंगाली और बिहारी समुदाय के लोगों की दुकानें थीं. काठ के दोतल्ले में डायाम होटल था. कालीबाड़ी रोड पर बसु बोर्डिंग होटल था. बाद में अगलगी में वह जल गया. आज का हाशमी चौक पहले का रेलवे जंक्शन था. विधानरोड, कचहरी रोड, हिलकार्ट रोड के मिलनस्थल के निकट है हाशमी चौक. यहां डीएचआर (दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे) के कर्मचारियों के काठ के क्वार्टर और एक चिकित्सा केंद्र था. वर्तमान में यहां रेलवे का सिटी बुकिंग सेंटर है. कंचनजंघा स्टेडियम के मुख्य गेट से प्रवेश करने पर जो जगह है वहां रेल इंजन घुमाने वाला यंत्र रखा रहता था. लाइन पर रखे रेल इंजन का सामने वाला हिस्सा रेल कर्मचारी अपनी सुविधा के अनुसार घुमा लेते थे. बगल में ही ब्वॉयज हाई स्कूल का खेल मैदान था. वर्तमान टेलिफोन भवन तक सिलीगुड़ी टाउन क्लब का मैदान था. आज जहां कंचनजंघा स्टेडियम है वहां मैदान के चारों ओर लकड़ी की गैलरी दर्शकों के लिये बनी थी. उस समय उसे तिलक मैदान के नाम से जाना जाता था. उस समय महावीरस्थान में नक्सलबाड़ी और बागडोगरा के लिए बस स्टैंड था.
काठ के मकान थे शहर की पहचान
शहर में ज्यादातर काठ के मकान होते थे. इसकी मुख्य वजह उस समय लकड़ी की प्रचुरता के साथ भूकम्प का आना भी बताया जाता है. अब तो पहाड़ों में भी लोग पक्का मकान बनाने लगे हैं हालांकि इस तरह से वे खतरे से ही खेलते हैं. सुदूर अतीत में शहर के एकमात्र जमींदार और महाजनी कारोबार से जुड़े हरसुंदर मजूमदार का पक्के का दालाननुमा मकान था. उन्होंने फांसीदेवा महकमा अदालत में काफी दिनों तक वकालती की. इनके अलावा कुछ गिने चुने पक्का मकान सरकारी कार्यालयों के थे जैसे ईस्टर्न बेंगॉल रेलवे का स्टेशन भवन जो अब टाउन स्टेशन के नाम से जाना जाता है. कुछ रेलवे क्वार्टर थे. उस समय सरकारी अनुमोदन के बिना कोई पक्का मकान नहीं बना सकता था. तब आज की तरह बड़े बड़े बाजार नहीं थे. शहर में कुछ ही किराने की दुकान, स्टेशनरी और मिठाई की दो एक दुकानें थीं. केवल फूलचंद ब्रदर्स का हार्डवेयर स्टोर था. खास वस्तुओं के लिए जलपाईगुड़ी जाना पड़ता था.
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