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कुड़मी समुदाय को आदिवासी श्रेणी का दर्जा दिलाने के लिए हाइकोर्ट में याचिका

Updated at : 10 Jul 2024 9:48 PM (IST)
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कुड़मी समुदाय को आदिवासी श्रेणी का दर्जा दिलाने के लिए हाइकोर्ट में याचिका

आदिवासी श्रेणी का दर्जा दिलाने के लिए हाइकोर्ट में याचिका

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कोलकाला. आदिवासी नेगाचारी कुड़मी समाज की ओर से इसके अध्यक्ष अनूप महताे द्वारा कलकत्ता हाइकोर्ट में याचिका दायर की गयी है और कुड़मी समुदाय को आदिवासी श्रेणी का दर्जा देने की मांग की गयी है. बुधवार को कलकत्ता हाइकोर्ट की न्यायाधीश न्यायाधीश शंपा सरकार की एकल पीठ पर मामले की सुनवाई हुई. अधिवक्ताओं की दलीलों को सुनने के बाद न्यायाधीश शंपा सरकार ने उक्त रिट पिटीशन को स्वीकार कर लिया. सुनवाई में उपस्थित सभी पक्षों के अधिवक्ताओं ने सरकार और अन्य पक्षों की तरफ से नोटिस स्वीकार कर लिया. मामले की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश ने सभी पक्षों को छह सप्ताह के भीतर हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है और इन हलफनामों के आधार पर याचिकाकर्ता को भी हलफनामा देने के लिए कहा गया है. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि जब अंग्रेजों ने 1865 का भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम लागू किया था, तब छोटानागपुर के सारे आदिवासियों ने उसका विरोध किया, जिसके बाद अंग्रेजों ने तीन मई 1913 के नोटिफिकेशन नंबर 550 द्वारा आदिवासियों को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम से बाहर कर दिया. उन्होंने आगे बताया कि जब अंग्रेजों ने भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 लागू किया, तब भी आदिवासियों को 16 दिसंबर 1931 के नोटिफिकेशन 3563जे के द्वारा उस कानून के घेरे से बाहर रखा.उन्होंने आगे बताया कि अनुच्छेद 342 के अनुसार राष्ट्रपति उस राज्य के राज्यपाल से मशविरा कर किसी कम्युनिटी को नोटिफिकेशन द्वारा आदिवासी घोषित कर सकते हैं या कानून बनाकर किसी कम्युनिटी को आदिवासी की लिस्ट से हटा सकती हैं या जोड़ सकती हैं. लेकिन 10 अगस्त 1950 को जब नोटिफिकेशन द्वारा आदिवासियों की लिस्ट जारी की गयी, तब राष्ट्रपति और राज्यपाल के बीच क्या विमर्श हुआ, इसका कोई दस्तावेज मौजूद नहीं है. हम 70 वर्षों से सरकार के साथ पत्राचार कर रहे हैं, परंतु सरकार इस बारे में कोई जानकारी नहीं दे रही है. उन्होंने आगे कहा कि झारखंड उच्च न्यायालय ने भी ऐसे ही याचिका को स्वीकार कर लिया है. लेकिन हमारी याचिका व और झारखंड में किये गये मुकदमे में अंतर है. झारखंड सरकार हमारी याचिका का विरोध कर रही है और पश्चिम बंगाल सरकार हमारा समर्थन कर रही है. याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका में दावा किया है कि अब तो कुड़मियों के आदिवासी होने के जेनेटिक प्रमाण भी हैं. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के ख्यातिप्राप्त जेनेटिसिस्ट ज्ञानेश्वर चौबे ने कुड़मियों के 180 ब्लड सैंपल की जांच की है और उसमें कुड़मियों के मिटोक्रॉन्ड्रियल डीएनए में एम31 म्यूटेशन मिला, जो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में रहने वाले सबसे पुराने आदिवासी समूह में मिला था. , जिससे यह प्रमाणित होता है कि कुड़मी भी इस देश के सबसे पुराने आदिवासी हैं और छोटानागपुर के पठार पर 65000 साल से रह रहे हैं. उन्होंने कहा कि जब सरकार से न्याय नहीं मिला तो हमने हाइकोर्ट का रूख किया है. उन्होंने कहा कि 1950 की अधिसूचना में भूल हुई है, जिसमें सुधार करने की जरूरत है. बुधवार को अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव और आकाश शर्मा ने कुड़मी समाज की ओर से मामले की पैरवी की.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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