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घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों को चीरते हुए रेल पहुंची मिजोरम की राजधानी आइजोल

Updated at : 30 Aug 2025 1:35 AM (IST)
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घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों को चीरते हुए रेल पहुंची मिजोरम की राजधानी आइजोल

51.38 किलोमीटर लंबी रेल लाइन से मिजोरम वासियों का जीवन होगा आसान

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चट्टानों का सीना चीर कर रेलवे ने बनाये 48 सुरंग और 153 ब्रिज

श्रीकांत शर्मा, आइजोल (मिजोरम)

वह दिन अब दूर नहीं जब दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों के बीच बसे मिजोरम की राजधानी आइजोल तक ट्रेन दौड़ेगी. जी हां यह संभव कर दिखाया है भारतीय रेलवे के इंजीनियरों की टीम ने. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नार्थ ईस्ट-राज्यों की विकास के संकल्प को धरातल पर लाते हुए रेलवे ने 51.38 किमी लंबी बइरबी-सायरंग रेल लिंक परियोजना से मिजोरम को देश के अन्य हिस्सों से जोड़ दिया है. 13 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस नयी रेल लाइन को उद्घाटन कर सकते हैं. इस रेल लाइन के पांच स्टेशनों को सजाने-सवांरने का काम जोरों पर है. 51.38 किमी लंबी इस रेल लाइन में कुल पांच स्टेशन बइरबी, हार्तुकी, कनपुई, मुलखांग और सायरंग हैं. उत्तर पूर्वी सीमांत रेलवे के तहत पड़ने वाली इस रेल लाइन का मिजोरम में प्रवेश करते ही पहला स्टेशन बइरबी और अंतिम स्टेशन सायरंग है.

मनोरम वादियों में स्थित कुतुबमीनार से भी ऊंचा रेल ब्रिज इंजीनियरिंग का नायाब उदाहरण

बइरबी-सायरंग रेल लाइन जहां इंजीनियरिंग का श्रेष्ठतम उदाहरण है वहीं यह अपनी प्राकृतिक मनोरम वादियों के लिए भी जानी जायेगी. 52 किलोमीटर लंबी इस रेल लिंक लाइन के रास्ते में 50 से ज्यादा दुर्गम पहाड़, चट्टानें और सैकड़ों पहाड़ी नाले और वॉटर फॉल हैं.

पहाड़ों की तलहटी में स्थित चट्टानों का सीना चीरकर 49 सुरंगें बनायी गयीं, साथ ही दुर्गम घाटियों को जोड़ने के लिए 153 रेलवे ब्रिज तैयार किये गये हैं. बइरबी-सायरंग रेल लाइन का ब्रिज संख्या 196 इंजीनियरिंग कौशल का श्रेष्ठतम नजीर पेश करता है.

ब्रिज की ऊंचाई 114 मीटर है, ब्रिज के खंभे कुतुबमीनार से भी ऊंचे हैं. उत्तर पूर्व सीमांत रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी नीलांगन दे ने बताया कि सायरांग स्टेशन के पास स्थित ब्रिज संख्या 196 देश का दूसरा सबसे ऊंचा ब्रिज है. यानी पिलर पर बना देश का यह दूसरा सबसे ऊंचा ब्रिज है. इसके पिलर की ऊंचाई कुतुबमीनार से भी 15 मीटर ऊंची है.

पहाड़ियों पर क्रेन ले जाने के लिए बनानी पड़ी 200 किमी सड़क

यह रेल लाइन बेहद ही दुर्गम इलाकों में बिछायी गयी है. दुर्गम पहाड़ियों और विपरीत प्राकृतिक मौसम, रेल लाइन को तैयार करने में सबसे बड़े बाधक रहे. इन बाधाओं के कारण मात्र 51.38 किमी लंबी रेल लाइन बनने में 11 वर्षों का वक्त लग गया. उत्तर पूर्वी सीमांत रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी नीलांगन दे कहते हैं कि मिजोरम का प्रतिकूल मौसम काम करने में सबसे बड़ा बाधक था. यहां वर्ष भर भारी बारिश होती है. दिसंबर से मार्च तक मात्र चार महीने ही यहां मौसम साफ रहता है. पहाड़ों पर भारी मशीनों व कल-पूर्जों को पहुंचाना भी एक गंभीर चुनौती थी. सर्वे के बाद सबसे पहले लगभग दो सौ किमी लंबी सड़कें तैयार की गयीं. सड़कों के बनने के बाद हेवी ट्रकों से बड़ी-बड़ी क्रेनों को पहाड़ों पर पहुंचाया गया. रेल लाइन के रास्ते में घने जंगल के कारण भी काम शुरू करना कठिन था. 8071 करोड़ की लागत से बनी बइरबी-सायरंग रेल लाइन से मिजोरम की राजधानी आइजोल देश के अन्य हिस्सों से जुड़ने को तैयार है. 27 मई 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मालेगांव रेलवे स्टेडियम से बइरबी-सायरंग रेल लिंक परियोजना का शिलान्यास किया था, 11 वर्षों बाद एकबार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, इस रेल लाइन को उद्घाटन कर मिजोरम में विकास की नयी गाथा लिखने को तैयार हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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GANESH MAHTO

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By GANESH MAHTO

GANESH MAHTO is a contributor at Prabhat Khabar.

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