बिहार के एक फैसले ने बंगाल में छेड़ी बहस, मांसाहार पर तृणमूल ने फिर भाजपा को घेरा

Bengal News: टीएमसी ने भाजपा पर खानपान को नियंत्रित करने का आरोप लगाया है. पार्टी का कहना है कि भाजपा की सरकार बनी तो बंगाल में भी यही होगा जो बिहार में हो रहा है.
मुख्य बातें
Bengal News: कोलकाता. पश्चिम बंगाल में इसी साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. चुनाव से ठीक पहले बिहार सरकार के एक फैसले ने बंगाल की राजनीति में बड़ी बहस छेड़ दी है. बिहार में सार्वजनिक जगहों पर मांस-मछली की खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी गयी है. तृणमूल कांग्रेस ने बिहार में हुए इस फैसले को लेकर भाजपा पर निशाना साधा है. तृणमूल कांग्रेस ने कहा है कि भाजपा लोगों के खानपान पर नियंत्रण करना चाह रही है. अगर बंगाल में भाजपा की सरकार बनी तो यहां भी मांस-मछली की खरीद-बिक्री पर रोक लगा देगी.
देशव्यापी प्रतिबंध का एजेंडा
दरअसल, बंगाल में भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी पार्टी के अंदर बंगालियत की कमी रही है. यहां बीजेपी को हिंदी भाषी क्षेत्र की पार्टी के रूप में देखा जाता है, जो सांस्कृतिक रूप से बंगालियों से मेल नहीं खाती है. ऐसे में बिहार सरकार के इस फैसले ने तृणमूल को एक मुद्दा दे दिया. इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को भाजपा को एक बार फिर से घेरने का मौका मिल गया है. टीएमसी ने बीजेपी पर खानपान की आदतों पर नियंत्रण रखने का आरोप लगाया है. पार्टी ने आरोप लगाया- पहले मंदिरों के पास के बाज़ार थे, फिर खुले स्थान, अब यह शैक्षणिक और धार्मिक संस्थानों और भीड़भाड़ वाले इलाकों के पास है. हम जो देख रहे हैं वह मांस और मछली के सेवन पर देशव्यापी प्रतिबंध है.
मांस-मछली नहीं बेचने देंगे
बिहार में भाजपा के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने अपने इस फैसले को स्वच्छता के लिए उठाया गया कदम बताया है. विजय कुमार सिन्हा ने कुछ दिनों पहले कहा था कि धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों के पास मछली और मांस की बिक्री पर रोक लगाई जाएगी, ताकि जन स्वास्थ्य और सामाजिक सद्भाव बनाए रखा जा सके. बच्चों में हिंसात्मक प्रवृत्ति को रोका जा सके. विजय सिन्हा के फैसले को सरकार की देशव्यापी नीति करार देते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा- अगर आप बीजेपी को वोट देंगे तो वे हमें बाजार में मछली और मांस बेचने नहीं देंगे. मुझे शाकाहारियों से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन बंगाल में मछली और मांस की बिक्री पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता है.
बंगालियों के अस्तित्व पर खतरा
टीएमसी ने आरोप लगाया कि मछली और चावल खाने वाले बंगाली को निशाना बनाया जा रहा है. टीएमसी ने कहा-हमने हमेशा उनकी संकीर्ण और रूढ़िवादी परिभाषाओं को चुनौती दी है. उनके घुटन भरे दायरे से बाहर निकलकर फलने-फूलने का साहस दिखाया है. जो भाजपा समझ नहीं पाती, उसे मिटाने की कोशिश करती है. लोग अगर भाजपा पर भरोसा करते हैं तो ठीक यही होगा. मछली और मांस पर प्रतिबंध, हमारी थालियों पर निगरानी और अंततः बंगालियों का अस्तित्व खत्म हो जायेगा. इस पूरे मसले पर भाजपा ने भी सफाई दी है. बंगाल भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा- ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है. बिहार हो या पश्चिम बंगाल हो. कहीं भी कोई भी ऐसे प्रतिबंध का पालन नहीं करेगा. बंगाल में मछली और मांस की बिक्री जारी रहेगी. उन्होंने आगे कहा कि पार्टी केवल गोमांस की खुली बिक्री के खिलाफ है.
पश्चिम बंगाल में मांसाहार पर विवाद नया नहीं
सितंबर 2024 में
पीएम मोदी ने कहा था कि नवरात्रि और सावन के महीने में मांस और मछली का सेवन करने वाले विपक्षी नेता मुगल मानसिकता वाले हैं. तब सीएम बनर्जी ने जवाब देते हुए कहा था- भाजपा को तो इस बात से भी आपत्ति है कि कोई मछली खाता है. आप कौन होते हैं यह तय करने वाले कि हम क्या खाएं या पहनें.
दिसंबर 2025 में
कोलकाता में गीता पाठ कार्यक्रम स्थल के पास मांस के टुकड़े बेच रहे एक स्ट्रीट वेंडवेंर पर हमले का वीडियो वायरल होने के बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया था. इस घटना के सिलसिले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था.
जनवरी 2026 में
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हरी झंडी दिखाकर रवाना की गई बंगाल और असम के बीच चलने वाली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन में केवल शाकाहारी भोजन परोसे जाने से टीएमसी भड़क उठी. पार्टी ने एक बार फिर भाजपा पर लोगों के भोजन पर नियंत्रण रखने का आरोप लगाया। इस विरोध के बाद, रेलवे ने यात्रियों को मांसाहारी भोजन का विकल्प भी उपलब्ध कराया.
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लेखक के बारे में
By Ashish Jha
डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव. लगातार कुछ अलग और बेहतर करने के साथ हर दिन कुछ न कुछ सीखने की कोशिश. वर्तमान में बंगाल में कार्यरत. बंगाल की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को टटोलने के लिए प्रयासरत. देश-विदेश की घटनाओं और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स को सीखने की चाहत.
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