‘शब्द नहीं, चाहिए निःशब्दता’ थीम पर कलाकारों ने बनायी पेंटिंग
Published by : GANESH MAHTO Updated At : 21 Oct 2025 12:51 AM
इस भयंकर ध्वनि से केवल इंसान ही नहीं, पशु-पक्षी भी पीड़ित होते हैं.
हुगली. शब्द नहीं, चाहिए निःशब्दता. ठीक वैसे ही जैसे युद्ध नहीं, चाहिए शांति. यही अनकहा भाव आजकल कलाकारों की तूलिका में जीवंत हो उठा है. मौन एक सशक्त संदेश दे रहा है. काली पूजा के समय हर साल शब्द दानवों का तांडव देखा जाता है. रात गहराने के साथ बढ़ता है कान फोड़ देने वाला शोर. प्रतिबंधित पटाखों के खिलाफ जितने भी सख्त कदम उठाये जायें, हर बार वही अनुभव सामने आता है. यह शोर कम नहीं होता है. इस भयंकर ध्वनि से केवल इंसान ही नहीं, पशु-पक्षी भी पीड़ित होते हैं. चंदननगर स्ट्रैंड रोड पर कलाकार सोहेल और अन्य कई चित्रकारों ने इस शब्द आतंक के खिलाफ रंग और तूलिका का सहारा लिया. उन्होंने अपने चित्रों में दिखाया कि कैसे त्योहारों में किस तरह पशु-पक्षी भयभीत होकर आश्रय खोजते-फिरते हैं.
स्ट्रैंड रोड चंदननगर का शांत और स्वच्छ क्षेत्र माना जाता है, जहां सालभर दूर-दूर से लोग गंगा किनारे की शीतलता महसूस करने आते हैं. यहां के पेड़ों में असंख्य पक्षियों का बसेरा है. पर कालीपूजा, छठपूजा और जगद्धात्री पूजा के दिनों में यह शांति शोर में डूब जाती है. इस बार कुछ स्थानीय कलाकारों ने लोगों को जागरूक करने की कोशिश की है, ताकि थोड़ी नि:शब्दता इन बेजुबान जीवों को सुरक्षा दे सके.
आश्रय होम एंड हॉस्पिटल फॉर एनिमल वेलफेयर एसोसिएशन की श्रीरामपुर शाखा के संपादक गौतम सरकार ने इस पहल की सराहना करते हुए कहा : यह एक सराहनीय कदम है. हर साल इस समय शोर का तांडव देखने को मिलता है. लोग भूल जाते हैं कि यह पृथ्वी सिर्फ उनकी नहीं है. पशु-पक्षियों के बिना मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं है. इसलिए यह धरती जितनी हमारी है, उतनी ही उनकी भी है. शब्द आतंक से कई पशु-पक्षी मर जाते हैं और बुजुर्ग या बीमार लोगों को भी कष्ट होता है. इसलिए हमें सजग रहना चाहिए. अपनी खुशी किसी और के दुख का कारण न बने, इस बात का ध्यान रखना चाहिए.
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