हृदय प्रत्यारोपण तो नि:शुल्क, पर दवा कैसे खरीदें

Updated at : 05 Aug 2019 5:51 AM (IST)
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हृदय प्रत्यारोपण तो नि:शुल्क, पर दवा कैसे खरीदें

कोलकाता : तीन दिसंबर 1967 को दक्षिण अफ्रीका की राजधानी में केपटाउन में विश्व का पहला हृदय प्रत्यारोपण किया गया. इसके करीब 26 साल बाद दिल्ली एम्स में पहली बार हृदय प्रत्यारोपण किया गया, जबकि मई 2018 में पूर्वी भारत के पश्चिम बंगाल में पहली बार हर्ट ट्रांसप्लांट किया गया. इससे साफ होता है कि […]

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कोलकाता : तीन दिसंबर 1967 को दक्षिण अफ्रीका की राजधानी में केपटाउन में विश्व का पहला हृदय प्रत्यारोपण किया गया. इसके करीब 26 साल बाद दिल्ली एम्स में पहली बार हृदय प्रत्यारोपण किया गया, जबकि मई 2018 में पूर्वी भारत के पश्चिम बंगाल में पहली बार हर्ट ट्रांसप्लांट किया गया. इससे साफ होता है कि हृदय ट्रांसप्लांट के मामले में हम कितना पीछे हैं.

वहीं दूसरी ओर हर्ट ट्रांसप्लांट पर लाखों रुपये का खर्च आता है. इस वजह से किसी जरूरतमंद परिवार का व्यक्ति हृदय प्रत्यारोपण के विषय में सोच भी नहीं सकता. लेकिन खुशी की बात यह है कि पश्चिम बंगाल के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में हर्ट ट्रांसप्लांट नि:शुल्क किये जा रहे हैं.
लेकिन राज्य के स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों की मानें, तो बगैर किसी योजना के सरकारी अस्पतालों में ट्रांसप्लांट किया जा रहा है, क्योंकि प्रत्यारोपण तो नि:शुल्क है, लेकिन अस्पताल से छूटने के बाद दवा तो खुद मरीजों को ही खरीदनी पड़ रही है.
हृदय प्रत्यारोपण की वैश्विक दर : इस समय दुनियाभर में हर साल करीब 3,500 हृदयों का प्रत्यारोपण किया जा रहा है. सबसे ज्यादा प्रत्यारोपण अमेरिका में किये जा रहे हैं. यहां हर साल करीब 2000-2300 लोगों के हृदय का प्रत्यारोपण किया जा रहा है. विश्व भर में हृदय प्रत्यारोपण के लिए मांग और आपूर्ति में भारी अंतर है. इसी वजह से कई जरूरतमंदों को समय पर हृदय नहीं मिल पाते.
प्रत्यारोपण के बाद दवा पर लाखों का खर्च
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी ने बताया कि केवल हर्ट ट्रांसप्लांट करने से मरीज लाभान्वित नहीं हो सकते. बताया कि प्रत्यारोपण के बाद मरीज को संक्रमण हो सकता है. संक्रमण न हो और इम्यूनिटी झमता बढ़ाने के लिए प्रत्यारोपण के बाद मरीज को करीब तीन वर्ष दवा खाना पड़ता है. अस्पताल से छूटने के बाद हर महीने दवा पर 20-25 हजार रुपये का खर्च आता है. सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए पहुंचने वाले ज्यादातर लोग जरूरतमंद होते हैं.
ऐसे मरीजों के लिए हर महीने दवा पर 20-25 हजार रुपये खर्च करना मामूली बात नहीं है. ऐसे में प्रत्यारोपण के बाद दवा पर आने वाले खर्च को सरकार वहन करे. सरकार अब तक इस मुद्दे पर विचार ही कर रही है. बेहतर तो यह होता सरकारी अस्पतालों को हृदय प्रत्यारोपण के लिए लाइंसेस देने से पहले इस मुद्दे पर विचार कर लिया गया होता.
ज्ञात हो कि अब तक राज्य के दो मेडिकल कॉलेज एसएसकेएम (पीजी) व कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में हृदय प्रत्यारोपण किया गया है. पीजी में एक व मेडिकल कॉलेज में तीन हर्ट ट्रांसप्लांट हो चुके हैं. ध्यान रहे कि महानगर में 21 मई 2018 से अब तक 9 हृदय प्रत्यारोपण हो चुके हैं.
तीन दिसंबर 1967 को पहला हृदय प्रत्यारोपण
3 दिसंबर 1967 को दक्षिण अफ्रीका के कैपटाउन में पहला हृदय प्रत्यारोपण किया गया. दक्षिण अफ्रीका के सर्जन क्रिस्टियन बर्नाड ने इस सर्जरी को सफलतापूर्वक अंजाम दिया. क्रिस्टियन बर्नाड की टीम में 30 लोग शामिल थे और हृदय प्रत्यारोपण करने में उसे 9 घंटे का वक्त लगा. बर्नाड ने नॉर्मन सम्वे द्वारा विकसित तकनीक का इस्तेमाल किया था. हालांकि 1905 में भी मानव हृदय प्रत्यारोपण की कोशिश की गयी थी लेकिन यह कामयाब नहीं हो पायी.
भारत में पहली बार डॉ वेणुगोपाल ने किया था प्रत्यारोपण
भारत में पहला हृदय प्रत्यर्पण 3 अगस्त 1994 को दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में सर्जन पी. वेणुगोपाल ने किया था. इस सफल सर्जरी में 20 सर्जन ने योगदान दिया और 59 मिनट में यह सर्जरी की गयी. यह सर्जरी देवी राम नामक शख्स की गयी थी.
सर्जरी के बाद 15 साल तक वह जीवित रहे. इससे पहले हृदय प्रत्यारोपण के लिए विदेश जाना पड़ता था. सबसे बड़ी चुनौती अंगदान करने वालों की सीमित संख्या है.
हालांकि भारत में अंगदान को कई संस्थाओं और सरकारों द्वारा प्रोत्साहित किया जा रहा है लेकिन फिर भी पर्याप्त संख्या में लोग अंगदान खासकर हृदय दान करने के लिए सामने नहीं आ रहे हैं. भारत में हर साल 50,000 लोगों को हृदय प्रत्यारोपण की जरूरत होती है. केवल दिल्ली में ही हर साल 1,000 हृदय प्रत्यारोपण की जरूरत होती है. लेकिन साल 2016 तक महज 350 हृदय ही प्रत्यारोपण किये गये हैं. भारत में दस लाख लोगों में करीब 0.03 लोग ही अंगदान करते हैं.
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