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जिया बनी पहली ट्रासजेंडर ओटी टेक्नीशियन

कोलकाता : मानव समाज में नर-नारी के अलावा एक अन्य वर्ग भी है, जो पूरी तरह से न नर है और न ही नारी-जिसे कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने ‘थर्ड जेंडर’ का दर्जा दिया, जिन्हें आमतौर पर ट्रांसजेंडर या हिजड़ा कहा जाता है और उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है, लेकिन […]

कोलकाता : मानव समाज में नर-नारी के अलावा एक अन्य वर्ग भी है, जो पूरी तरह से न नर है और न ही नारी-जिसे कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय ने ‘थर्ड जेंडर’ का दर्जा दिया, जिन्हें आमतौर पर ट्रांसजेंडर या हिजड़ा कहा जाता है और उनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया जाता है, लेकिन उसके के बावजूद ऐसे ट्रांसजेंडर हैं, जो ना केवल अपने समुदाय के लिए बल्कि जनमानस के लिए किसी मिसाल से कम नहीं.
उनमें से एक हैं मालदा जिले की जिया दास है, जो संस्कृत से ग्रेजुएट है. वह भारत की पहली महिला ट्रांसजेंडर है, जो महानगर के अजयनगर स्थित एक प्रतिष्ठित निजी अस्पताल में ओटी टेक्नीशियन के तौर पर इंटर्नशिप कर रही है. वह बतौर किन्नर अपने पैरों पर खड़ा हो कर समाज को मुंह तोड़ जवाब देना चाहती है.
सहपाठी ने हाथ में रस्सी बांधकर घुमाया था
जिया कहती हैं, व्यक्ति का सबसे बड़ा आभूषण ‘विद्या’ होता है. मुझे बचपन से पढ़ने का शौक रहा. मैं बड़े मन से स्कूल जाती थी, लेकिन वहां भी मेरे शारीरिक संरचना को लेकर बच्चे मानसिक और शारीरिक तौर पर प्रताड़ित करते थे. आज भी याद है जब मैं 11वीं कक्षा में थी तो एक सहपाठी ने मेरे हाथ में रस्सी बांधकर पूरे स्कूल में घुमाया था. मैं आहत हो उठी-पढ़ाई छोड़ने का मन भी बना ली, लेकिन घर की माली हालत को देखते हुए मैंने संस्कृत से ग्रेजुएशन किया.
नौकरी की तलाश में किन्नर समुदाय से हुई मुलाकात
जिया का एक छोटा परिवार है- जिनमें उसके माता पापा और एक छोटी बहन है. जिया कहती हैं, पापा दिल के मरीज हैं. पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं नौकरी ढूंढने लगी, लेकिन लोगों ने मेरे काबिलियत से ज्यादा मेरे शरीर को तरजीह दी. लोगों की भद्दी बातें व जुमलों से मैं टूट गयी. थकहार कर किन्नर समुदाय से मिली. उन्हें देखकर हौसला आया कि मैं दुनिया में अकेली नहीं हूं, पर सवाल पेट और परिवार के प्रति जिम्मेदारी का था, सो मैं डिग्री को ताक पर रखकर आरकेस्ट्रा में नाचने लगी.
एक बार उत्तर प्रदेश (यूपी) में कुछ दबंग लोगों ने बंदूक की नोंक पर भी मुझे नचवाया था. उसके बाद मैं नाचना बंद करके ट्रेन में भीख मांगने लगी. जैसे-तैसे जिंदगी चलती रही-आगे चलकर एक स्वंयसेवी संस्था से जुड़ी- जहां चटाई, अचार बनाने का काम सीखा, लेकिन वह भी बंद हो गया, तब प्रांतोकोथा संस्था ने ओटी टेक्नीशियन की पढ़ाई करने का मौका दिया. बस आज मैं खुश हूं कि किन्नर हूं, लेकिन नौकरीपेशा.
मैं शासन और प्रशासन से यह पूछना चाहती हूं कि आखिर क्यों सबके विकास में हमारा विकास शामिल नहीं है? ट्रांसजेंडर बिल हमारे सुनहले भविष्य का दस्तावेज है. फिर क्यों वह अब तक अधर में है.
ट्रांसजेंडर जिया दास, ओटी टेक्निशियन
ट्रांसजेंडर युवा वर्ग को रोजगार पाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है. लगभग डेढ़ साल पहले, मालदा के कौशिक होड़ द्वारा चलाये जाने वाले संतरंगी नामक कार्यक्रम के जरिए हमारी मुलाकात जिया से हुई. उम्मीद है कि इंटर्नशिप पूरा करने के बाद उसे नौकरी उसी अस्पताल में मिल जाये.
बप्पादित्य मुखर्जी, फाउंडर डायरेक्टर , प्रांतोकोथा
Prabhat Khabar Digital Desk
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