बांग्लादेश में आम चुनाव से पहले जमात-ए-इस्लामी में फूट, महागठबंधन से निकली अहम पार्टी

बांग्लादेश की राजनीति में चुनाव से पहले उथल-पुथल. फोटो- एआई जेनेरेटेड.
बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद जमात ए इस्लामी की ताकत मजबूत हुई है. 12 फरवरी को होने वाले चुनावों के लिए उसने 11 पार्टियों का गठबंधन बनाया था. हालांकि, चुनाव के नजदीक आते ही इसमें फूट पड़ गई है.
बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव से पहले जमात इस्लामी ने एकजुटता की कोशिश की थी. उसने इस्लाम समर्थकों का एक गठबंधन तैयार किया था. लेकिन एक प्रमुख इस्लामी राजनीतिक दल ने शुक्रवार को जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले गठबंधन से अलग होने की घोषणा की. इससे आगामी आम चुनाव में सभी इस्लाम समर्थक मतों को बटोरने की पहल प्रभावी रूप से समाप्त हो गई है. इस गठबंधन से अलग होने वाली पार्टी का नाम है इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश.
इस्लामी आंदोलन बांग्लादेश के वरिष्ठ संयुक्त महासचिव गाजी अताउर रहमान ने पत्रकारों से कहा कि उनकी पार्टी ने सीट बंटवारे में ‘न्याय से वंचित’ किया गया. इस वजह से उसने 11-दलीय गठबंधन छोड़ने का फैसला किया है. उन्होंने जमात-नेतृत्व वाले समूह पर “इस्लामी आदर्शों से भटकने” का भी आरोप लगाया. अताउर रहमान ने कहा, “बांग्लादेश इस्लामी आंदोलन अपने दम पर चुनाव में हिस्सा लेगा. हम 300 में से 268 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे.” उन्होंने यह भी जोड़ा कि शेष सीटों पर उनकी पार्टी योग्य उम्मीदवारों को समर्थन देगी.
बिना चर्चा तारिक रहमान से मिले जमात प्रमुख
अताउर रहमान के अनुसार, जमात के प्रमुख ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के चेयरमैन तारीक रहमान के साथ मुद्दों को सुलझाने की बात कही. लेकिन इस मुद्दे पर उन्होंने इस्लामी आंदोलन के साथ कोई चर्चा नहीं की गई. इस घोषणा के साथ ही जमात-नेतृत्व वाले गठबंधन में ‘आंदोलन’ की भागीदारी औपचारिक रूप से समाप्त हो गई. यह घटनाक्रम उस बैठक के एक दिन बाद सामने आया, जिसमें महागठबंधन ने 179 सीटें जमात को और 30 सीटें छात्र-नेतृत्व वाली नेशनल सिटिजन पार्टी को देने का फैसला किया था, जबकि 47 सीटें इस्लामी आंदोलन के लिए खाली छोड़ी गई थीं. इस बैठक का इस्लामी आंदोलन ने बहिष्कार किया था.
‘सत्ता के नजदीक आते ही रुख से पीछे हट रहे’
अताउर रहमान ने कहा, “हम तब हैरान रह गए जब जमात के अमीर डॉ. शफीकुर रहमान ने स्पष्ट रूप से कहा कि सत्ता में आने पर वे देश का शासन मौजूदा कानूनों के अनुसार करेंगे, न कि इस्लामी शरिया के अनुसार.” उन्होंने आरोप लगाया कि जमात ने चुनाव से पहले एक समझौता कर लिया है, जिससे यह आशंका पैदा होती है कि “क्या यह एक दिखावटी (स्टेज्ड) चुनाव होगा.” रहमान ने कहा, “जमात का नारा था- ‘हमें अल्लाह का कानून चाहिए, हमें ईमानदार लोगों का शासन चाहिए.’ लेकिन अब जब उनके सत्ता में आने का माहौल बनता दिख रहा है, तो वे उस रुख से पीछे हट रहे हैं और सत्ता को प्राथमिकता दे रहे हैं.”
पीटीआई-भाषा के इनपुट के साथ.
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By Anant Narayan Shukla
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.
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