विश्वभारती विश्वविद्यालय में हिंदी भवन की आचार्य परंपरा पर हुई सारगर्भित चर्चा

Updated at : 30 Jan 2025 9:49 PM (IST)
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विश्वभारती विश्वविद्यालय में हिंदी भवन की आचार्य परंपरा पर हुई सारगर्भित चर्चा

विश्वभारती विश्वविद्यालय के हिंदी भवन की स्थापना की 85वीं वर्षगांठ पर केंद्रीय हिंदी निदेशालय के सहयोग से दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी हुई, जिसमें विश्वविद्यालय के हिंदी भवन की समृद्ध आचार्य परंपरा पर हिंदी के शिक्षाविदों व अन्य बुद्धिजीवियों के बीच सारगर्भित चर्चा हुई.

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बोलपुर.

विश्वभारती विश्वविद्यालय के हिंदी भवन की स्थापना की 85वीं वर्षगांठ पर केंद्रीय हिंदी निदेशालय के सहयोग से दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी हुई, जिसमें विश्वविद्यालय के हिंदी भवन की समृद्ध आचार्य परंपरा पर हिंदी के शिक्षाविदों व अन्य बुद्धिजीवियों के बीच सारगर्भित चर्चा हुई. संगोष्ठी के पहले दिन की परिचर्चा का विषय ””हिंदी साहित्य : रवींद्रनाथ और शांतिनिकेतन का हिंदी भवन”” था. संगोष्ठी का उद्घाटन दीप प्रज्वलन, मंगलाचरण एवं अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ.

मौके पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की शहादत पर कुछ देर के लिए मौन रख कर लोगों ने नमन किया. उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि प्रो सुनील बाबूराव कुलकर्णी (निदेशक, केंद्रीय हिंदी निदेशालय) रहे, जिन्होंने हिंदी भाषा के संवर्द्धन व विकास में निदेशालय की भूमिका पर प्रकाश डाला. प्रथम सत्र का विषय ‘हिंदी भवन की आचार्य परंपरा’ था, जिसकी अध्यक्षता प्रो रणजीत साहा ने की. वक्ताओं ने गुरुदेव रबींद्रनाथ ठाकुर, क्षितिमोहन सेन, रामसिंह तोमर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, कपिलेश्वर मिश्र सहित प्रमुख आचार्यों के हिंदी भवन में योगदान पर चर्चा की. संगोष्ठी में सोमा बंधोपाध्याय, मनोरंजन प्रधान, सविता प्रधान, रामेश्वर मिश्र, चंद्रकला पांडेय, कलानाथ मिश्र, विजय कुमार भारती, सत्यकेतु सांकृत्यायन, नीहारिका सिन्हा सहित कई कॉलेज व विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने अपने-अपने विचार रखे. शिक्षाविदों ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के जीवन व कृतित्व पर बातचीत की. साथ ही शांतिनिकेतन, हिंदी भवन एवं गुरुदेव रबींद्रनाथ ठाकुर के प्रति द्विवेदी जी के समर्पण पर भी चर्चा की. उस दौरान हिंदी भवन के अध्यक्ष सुभाष चंद्र राय भी मौजूद रहे. संगोष्ठी के आयोजन में मुक्तेश्वरनाथ तिवारी, जगदीश भगत, राहुल सिंह, शकुंतला मिश्रा, अर्जुन कुमार, श्रुति कुमुद, मैरी हांसदा सहित विभाग के अनेक शिक्षकगण मौजूद रहे. संगोष्ठी हिंदी भवन की समृद्ध परंपरा व हिंदी साहित्य के विकास पर केंद्रित थी.

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