बांकुड़ा में क्रांतिवीरों को समर्पित कालीपूजा, स्वतंत्रता संग्राम से आज तक कायम है परंपरा

Updated at : 17 Oct 2025 9:47 PM (IST)
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बांकुड़ा में क्रांतिवीरों को समर्पित कालीपूजा, स्वतंत्रता संग्राम से आज तक कायम है परंपरा

बांकुड़ा. बांकुड़ा जिले में स्थित प्राचीन और ऐतिहासिक ‘बड़ा काली माता’ की पूजा आज भी अपनी विशिष्ट परंपरा और क्रांतिकारी इतिहास के कारण प्रसिद्ध है.

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प्रणव कुमार बैरागी, बांकुड़ा.

बांकुड़ा. बांकुड़ा जिले में स्थित प्राचीन और ऐतिहासिक ‘बड़ा काली माता’ की पूजा आज भी अपनी विशिष्ट परंपरा और क्रांतिकारी इतिहास के कारण प्रसिद्ध है. यह वही स्थान है, जहां कभी स्वतंत्रता आंदोलन के क्रांतिकारी मां काली की आराधना कर शक्ति और साहस प्राप्त करते थे. इस मंदिर की पहचान आज भी ‘क्रांतिकारी घराने की काली’ के रूप में की जाती है.

क्रांतिकारियों का गुप्त ठिकाना और शक्ति का केंद्र

कहा जाता है कि लगभग 450 वर्ष पहले रघु डकैत ने इस पूजा की शुरुआत की थी. स्वतंत्रता सेनानियों का इस काली मंदिर से गहरा संबंध रहा है. अलीपुर बम कांड के आरोपी क्रांतिकारी भी यहां गीता पाठ और मंत्र साधना करते थे. मंदिर के पास स्थित एक घर अनुशीलन समिति का गुप्त ठिकाना था, जहां क्रांतिकारी ब्रिटिश पुलिस की नजरों से बचकर रहते थे. इसी घर के एक गुप्त कमरे में हथियार छिपाए जाते थे. बाघा जतिन और भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारियों की यादें इस पूजा से जुड़ी हैं. आज भी तांत्रिक परंपरा के अनुसार यहां पूजा की जाती है और काली पूजा के दिनों में श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगती हैं.

स्थानीय लोगों के बीच मां काली को ‘बड़ा मां’ या ‘बड़ा काली’ के नाम से पुकारा जाता है. लोक मान्यताओं के अनुसार, लगभग 500 साल पहले लुटेरों का एक दल किसी घर को लूटने के बाद मां की प्रतिमा लेकर लौटा था, और उसी स्थान पर आज यह मंदिर स्थित है. कहा जाता है कि शाम के समय आज भी मां के कदमों की नूपुर ध्वनि सुनी जा सकती है, जिसे भक्त चमत्कार मानते हैं.

ब्रह्मचारी और बनर्जी परिवार की संयुक्त परंपरा

जिले के नाद्राग्राम में स्थित बनर्जी परिवार की काली पूजा भी बांकुड़ा की सबसे प्राचीन पूजाओं में गिनी जाती है. यह पूजा ब्रह्मचारी और बनर्जी परिवारों के विलय से शुरू हुई थी और लगभग 1200 वर्षों से चली आ रही है. बनर्जी परिवार का दावा है कि उनकी 25 पीढ़ियों से इस पूजा का आयोजन लगातार हो रहा है. तंत्र परंपरा के अनुसार, मां की पूजा 25 प्रसादों के साथ की जाती है, प्रत्येक प्रसाद एक पीढ़ी का प्रतीक होता है.

काली पूजा के अगले दिन मंदिर परिसर में भव्य भोज का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं. बांकुड़ा की यह पूजा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के गौरवशाली इतिहास की भी जीवित निशानी है.

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