महाछठ पर गंगा के किनारे बुलाते हैं जिलाशासक को

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आसनसोल. पटना (बिहार) के मूल निवासी सह बर्दवान के जिला शासक डॉ सौमित्र मोहन ने बिहारियों की सबसे बड़ी व महत्वपूर्ण पर्व छठ को लेकर अपनी बचपन की यादों को ताजा करते हुए कहा कि घर में उनकी मां छठ करती है. छठ के समय ही सुबह घाट पर जाने के लिए ठंड के लिए […]

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आसनसोल. पटना (बिहार) के मूल निवासी सह बर्दवान के जिला शासक डॉ सौमित्र मोहन ने बिहारियों की सबसे बड़ी व महत्वपूर्ण पर्व छठ को लेकर अपनी बचपन की यादों को ताजा करते हुए कहा कि घर में उनकी मां छठ करती है.
छठ के समय ही सुबह घाट पर जाने के लिए ठंड के लिए पहली बार अलमारी से गर्म वस्त्र निकलते थे. दीपावली के पटाखों को छठ के लिए बचाकर रखा जाता था. शाम और भोर में घाटों पर पटाखें जलाते थे. भोर में उठते ही घर के पास पटाखे फोड़कर खुद के जागने के साथ सभी को जगाने का कार्य होता था. खरना के दिन रसिआव रोटी खाने के लिए घर पर काफी लोगों को आमंत्रित किया जाता था. गंगा नदी के कृष्णा घाट पर डाला लेकर चल रहे पिताजी के साथ मां का हाथ थामकर जाने के आनंद का बखान नहीं किया जा सकता है. सुबह घाट से लौटने के बाद पड़ोसियों के घर घर जाकर प्रसाद पहुंचाना आदि बचपन की यादें छठ आते ही ताजा हो जाती है. भारतीय प्रशासनिक सेवा में आने के बाद छठ में कभी घर नहीं जा पाए. कार्य क्षेत्र में जहां भी रहें वहां के लोग शांति रुप से अपना पर्व और त्यौहार मना सके, यही जिम्मेदारी हर समय निभानी पड़ती है. सभी के खुशी की जिम्मेदारी निभाते हुए अपनों के साथ त्योहार मनाने सुख व खुशी को त्याग करना पड़ता है.
देव के सूर्यकुंड की यादें जीवंत होती है डीटी एके सिंह की
आसनसोल. औरंगाबाद (बिहार) जिला अंतर्गत देव के मूल निवासी सह इसीएल के तकनीकी निदेशक अजय कुमार सिंह ने कहा कि देव में स्थित सूर्य मंदिर की ख्याति पुरे विश्व में है. वहां के घर घर में छठ होता है. छठ भगवान सूर्य के उपासना का पर्व है. उनके घर में उनके जन्म के पहले से ही छठ होता है. मां जब तक जीवित थी, मां छठ करती रही. नौकरी के सिलसिले में गांव से बाहर निकल जाने के बाद छठ की परंपरा को पिछले 25 वर्षो से उनकी पत्नी निभा रही है. गांव पर भी बड़ी भाभी तथा उनकी पुत्रवधू सभी छठ करते है. समय मिलने पर सपरिवार गांव में जाकर छठ किया जाता है. देव के सूर्यकुंड पर घाट बना है. जहां छठ होता है. दो वर्ष पूर्व गांव पर ही जाकर सपरिवार छठ मनाए थे.
इस बार कंपनी के बंगलों में ही जल कुंड बनाया गया है. जहां छठ होगा. उन्होंने कहा कि छठ का पर्व लोगों को प्रकृति से जोड़ता है. यहां उंच नीच का कोई भेदभाव नहीं होता है. अमीर गरीब सभी के लिए प्रसाद एक ही होता है. खरना के दिन रसिआव रोटी का प्रसाद किसी भी छठव्रती के घर बिना आमंत्रण के भी जाकर ग्रहण करना शुभ होता है. बचपन की यादों को ताजा करते हुए श्री सिंह ने कहा कि घाट तक दौरा ले जाने के लिए भाईयों में होड़ लग जाती थी. सूर्यकुंड की मान्यता है कि भक्ति भाव से छठ की उपासना कर यहां जो भी कुछ मांगा जाता है उसकी मुराद पुरी होती है. सूर्यकुंड में छठ का अलग ही महत्व है. कार्यक्षेत्र में गांव पर छठ मनाने न जाने का हमेशा दुख रहता है.
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