ममता पर भड़के गोजमुमो नेता

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सिलीगुड़ी : दाजिर्लिंग पर्वतीय क्षेत्र की राजनीति ने एक नया मोड़ ले लिया है. सुवास घीसिंग के नेतृत्व वाली गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोरचा (गोरामुमो) के करीब पांच वर्ष पहले पतन के बाद पहाड़ पर गोरखा जन मुक्ति मोरचा (गोजमुमो) नामक नयी राजनीतिक शक्ति का उदय हुआ. बिमल गुरूंग के नेतृत्व वाली गोजमुमो का पिछले पांच […]

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सिलीगुड़ी : दाजिर्लिंग पर्वतीय क्षेत्र की राजनीति ने एक नया मोड़ ले लिया है. सुवास घीसिंग के नेतृत्व वाली गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोरचा (गोरामुमो) के करीब पांच वर्ष पहले पतन के बाद पहाड़ पर गोरखा जन मुक्ति मोरचा (गोजमुमो) नामक नयी राजनीतिक शक्ति का उदय हुआ. बिमल गुरूंग के नेतृत्व वाली गोजमुमो का पिछले पांच वर्षो से पहाड़ पर एकछत्र साम्राज्य कायम है.

गोरखालैंड आंदोलन की नयी मुहिम छेड़कर बिमल गुरूंग ने पहाड़ पर हर तरफ अपने जनाधार को बढ़ाने में सफलता हासिल की. लेकिन पिछले एक वर्षो से जिस तरह से राज्य की मुख्यमंत्री तथा तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी दाजिर्लिंग आ रही हैं और तरह-तरह की घोषणाएं कर रही हैं उससे बिमल गुरूंग के एकछत्र साम्राज्य को चुनौती मिलनी शुरू हो गई है. इसी वजह से ना केवल बिमल गुरूंग बल्कि गोजमुमो के अन्य नेताओं की भी चिंता बढ़ गई है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने वर्तमान दाजिर्लिंग दौरे के दौरान तामांग विकास बोर्ड के गठन की घोषणा की है.

इससे पहले पहाड़ पर लेप्चा विकास बोर्ड का गठन भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कर दिया है. दाजिर्लिंग पर्वतीय क्षेत्र में लेप्चाओं और तामांग जाति के लोगों की जनसंख्या काफी है. तामांग बोर्ड के गठन के बाद इस जाति के लोगों के बिमल गुरूंग से दूर हो जाने की संभावना राजनीतिक विश्लेषक जता रहे हैं. इससे पहले भी जब लेप्चा विकास बोर्ड का गठन हुआ था तब भी लेप्चा समुदाय के लोग बिमल गुरूंग से अलग हो गये. लेप्चा बोर्ड के गठन के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जितनी बार पहाड़ दौरे पर आयी उतनी बार ही लेप्चा समुदाय के लोगों ने उनका जोरदार स्वागत किया.

मुख्यमंत्री के हर सभा में परंपरागत वेशभूषा में लेप्चा समुदाय के लोग देखे गये. राजनीतिक विश्लेषकों का यहां तक कहना है कि हाल ही में लोकसभा चुनाव में दाजिर्लिंग पर्वतीय क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार वाइचुंग भुटिया को करीब एक लाख वोट मिलने से यह साबित होता है कि लेप्चा समुदाय के लोगों ने बिमल गुरूंग का साथ छोड़ दिया है. राजनीतिक विश्लेषकों ने आगे बताया है कि अब तामांग बोर्ड के गठन के बाद इस समुदाय के भी अधिकांश लोग बिमल गुरूंग का साथ छोड़ देंगे. लेप्चा विकास बोर्ड के गठन के बाद लेप्चा समुदाय के लोगों को राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं के तहत कई लाभ दिये गये.

लेप्चा समुदाय के सैकड़ों युवकों की नौकरी सिविक पुलिस में हुई. इसके अलावा इस समुदाय के काफी लोगों को राज्य सरकार ने घर बनाकर भी दिया. लेप्चा समुदाय को मिलने वाली इन सुविधाओं को देखने के बाद तामांग समुदाय के लोग स्वाभाविक तौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ जुड़ जायेंगे. यदि ऐसा होता है, तो लेप्चा और तामांग समुदाय को मिलाकर पहाड़ की करीब 30 प्रतिशत आबादी के बिमल गुरूंग के नेतृत्व वाली गोजमुमो से दूर हो जाने की संभावना है.

उसी को देखते हुए गोजमुमो ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर जातिगत राजनीति करने का आरोप लगाते हुए पहाड़ को बांटने की साजिश करार दिया है. मुख्यमंत्री के इस कदम से गोजमुमो के नेता भड़के हुए हैं. गोजमुमो सुप्रीमो बिमल गुरूंग ने स्वयं तो अभी इस मामले में कुछ नहीं कहा है, लेकिन गोजमुमो के अन्य शीर्ष नेता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निशाना साध रहे हैं. कर्सियांग के विधायक तथा गोजमुमो नेता रोहित शर्मा ने मुख्यमंत्री पर पहाड़ को जात-पात के आधार पर बांटने का आरोप लगाते हुए कहा कि ममता बनर्जी आग से खेल रही हैं.

दूसरी तरफ गोजमुमो के एक अन्य वरिष्ठ नेता रोशन गिरी ने भी ममता बनर्जी पर हमला बोला है. उन्होंने कहा है कि मुख्यमंत्री चाहे जितना विकास बोर्ड क्यों न बना लें, पहाड़ की जनता आपस में नहीं बंटेगी. पहाड़ के लोगों की मुख्य मांग अलग गोरखालैंड राज्य के निर्माण की है. इस मांग को लेकर सभी लोग एकजुट हैं. दूसरी तरफ राजनीतिक विश्लेषकों ने आगे कहा है कि गोजमुमो नेता भले ही पहाड़ के लोगों की एकजुटता की बात रहे हों, लेकिन ममता बनर्जी ने जो राजनीतिक कौशल दिखाया है उससे आने वाले दिनों में गोजमुमो को झटका लगना तय है.

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