खुलासा: बिहार के तस्करों ने सिलीगुड़ी में जमाया डेरा, अन्य स्थानों पर भी गुप्त ठिकाने, घर की टंकी में पाल रहे हैं घड़ियाल
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 01 Aug 2017 9:11 AM
सिलीगुड़ी. सिलीगुड़ी सहित पूरा उत्तर बंगाल इन दिनों तस्करों का स्वर्ग बना हुआ है. पहले यहां गांजा, सोना, ड्रग्स आदि की ही तस्करी होती थी, लेकिन पिछले दो-तीन साल के दौरान वन्य प्राणियों तथा वन्य जीवों के अंगों की तस्करी भी धड़ल्ले से हो रही है. गैंडे के सींग से लेकर सांप के जहर तक […]
सिलीगुड़ी. सिलीगुड़ी सहित पूरा उत्तर बंगाल इन दिनों तस्करों का स्वर्ग बना हुआ है. पहले यहां गांजा, सोना, ड्रग्स आदि की ही तस्करी होती थी, लेकिन पिछले दो-तीन साल के दौरान वन्य प्राणियों तथा वन्य जीवों के अंगों की तस्करी भी धड़ल्ले से हो रही है. गैंडे के सींग से लेकर सांप के जहर तक की तस्करी में अंतर्राष्ट्रीय गिरोह के तस्कर लगे हुए हैं.
ताजा मामला घड़ियाल तस्करी का है. वन विभाग ने रविवार को ही उत्तर दिनाजपुर जिले के पांजीपाड़ा से चार छोटे छोटे घड़ियालों के साथ दो तस्करों को गिरफ्तार किया है. इन दोनों से पूछताछ के बाद कई सनसनीखेज खुलासे हुए हैं जिससे वन विभाग के अधिकारियों का भी सिर चकरा गया है.
वन विभाग सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इन दिनों सिलीगुड़ी तथा इसके आसपास के इलाकों में घड़ियाल तस्करों ने अपना डेरा बना लिया है. इनमें से अधिकांश बिहार के विभिन्न इलाकों के रहने वाले हैं और अंतरराष्ट्रीय वन्य जीव तस्करों के साथ इनके तार जुड़े हुए हैं. सबसे आश्चर्य की बात यह है कि ये तस्कर कुछ दिनों तक घड़ियालों को अपने घर में पालते हैं और इस दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तरों के साथ संपर्क बनाने में लगे रहते हैं. एक बार सौदा तय होने पर घड़ियालों को बेच देते हैं. ऐसे घड़ियालों की तस्करी भूटान सीमा पर नहीं, बल्कि नेपाल सीमा के द्वारा की जाती है. सूत्रों के अनुसार, जिन घड़ियालों को जब्त किया गया है, उस प्रजाति के घड़ियाल बिहार के दियारा क्षेत्र से लगे गंगा नदी में पाये जाते हैं. मुंगेर, भागलपुर, खगड़िया आदि इलाकों में गंगा के तट पर सैकड़ों एकड़ जमीन पर दियारा का क्षेत्र फैला हुआ है. वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि इस प्रजाति के घड़ियाल अधिकांशत: गंगा नदी में ही पाये जाते हैं. इसके अलावा उड़ीसा के जंगलों में भी ऐसे घड़ियाल पाये जाते हैं. हालांकि सिलीगुड़ी में जो तस्कर सक्रिय हैं, वह मुख्य रूप से गंगा नदी से घड़ियाल को पकड़ कर चोरी-छिपे सिलीगुड़ी ले आते हैं. ऐसे तस्करों ने ग्रामीण इलाकों में डेरा बना रखा है.
घड़ियालों को पालने के लिए पानीटंकी की व्यवस्था की जाती है. तस्करों ने पूछताछ में बताया है कि वे लोग घर में लगे पानीटंकी में ही कुछ महीनों तक घड़ियाल को पालते हैं. इस दौरान घड़ियाल का साइज थोड़ा बड़ा हो जाता है और खरीददार खोजने में भी आसानी हो जाती है. सूत्रों ने बताया कि बिहार के पटना से छोटे वन्य प्राणियों को तस्करी के लिए यहां लाया जाता है और कुछ दिनों तक पालने के बाद उसकी तस्करी कर दी जाती है.
कहां-कहां से जुड़े हैं तार
घड़ियाल तस्करी के तार सिर्फ नेपाल ही नहीं, बल्कि इंडोनेशिया तथा थाइलैंड से जुड़ने लगे हैं. इनके अलावा म्यांमार में भी घड़ियालों की तस्करी की जाती है. सूत्रों के अनुसार, सिलीगुड़ी में सक्रिय तस्कर घड़ियालों को पानीटंकी सीमा से नेपाल पहुंचा देते हैं. नेपाली सीमा क्षेत्र के कांकड़भिट्टा में पहले से ही एजेंट तैयार रहते हैं. ये लोग घड़ियालों को विभिन्न ठिकानों पर भेज देते हैं.
घड़ियाल का चमड़ा काफी कीमती
घड़ियाल का चमड़ा काफी अधिक कीमत पर बिकता है. इसकी कीमत लाखों रुपये में होती है. कीमती बैग, जैकेट, बेल्ट, पर्स आदि के साथ ही यौन उत्तेजक दवाएं बनाई जाती हैं. जानकारों की मानें तो घड़ियाल काफी तेजी से बढ़ते हैं. कुछ ही महीनों में घड़ियाल का चमड़ा बेचने के लिए तैयार हो जाता है.
क्या कहते हैं अधिकारी
घड़ियाल तस्करों की सक्रियता काफी चिंताजनक है. घड़ियाल अब लुप्तप्राय हो रहे हैं. यदि इसी तरह से घड़ियालों की तस्करी होती रही, तो इस जीव का नामोनिशान मिट जायेगा. एक घड़ियाल 20 फीट तक का हो जाता है और सामान्य तौर पर उसकी आयु 15 वर्ष तक होती है. जो तस्कर सक्रिय हैं वे मुख्य रूप से गंगा नदी से छोटे घड़ियालों को पकड़ कर लाते हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसकी तस्करी करते हैं. जहां पर इनकी बहुत ज्यादा मांग होने की वजह से अच्छी किमत वसुली जाती है. जिससे काफी किमती सामान बनाये जाते है.
एमआर बालोच, अतिरिक्त प्रधान मुख्य वनपाल, उत्तर बंगाल, सिलीगुड़ी
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