"बांके बिहारी मंदिर पर कब्ज़ा? शंकराचार्य का फट पड़ा गुस्सा… योगी सरकार को दी सीधी चुनौती!"
Published by : Abhishek Singh Updated At : 03 Jun 2025 4:13 PM
UP Temple: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बांके बिहारी मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाने के योगी सरकार के फैसले पर कड़ा विरोध जताया है. उन्होंने इसे सनातन परंपरा के खिलाफ बताया और चुनौती दी कि अगर सरकार निष्पक्ष है तो गोरखनाथ मंदिर का भी अधिग्रहण करे.
UP Temple: काशी में प्रवासरत ज्योतिष्पीठाधीश्वर जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर के लिए ट्रस्ट बनाए जाने के फैसले पर गहरी नाराजगी जताई है. उन्होंने इस निर्णय को सनातन परंपराओं के विरुद्ध बताया और सरकार की मंशा पर सवाल उठाए.
सनातन धर्म के धर्माचार्य चला रहे हैं देशव्यापी मुहिम
शंकराचार्य ने कहा कि इस समय देशभर में सनातन धर्म के धर्माचार्य यह मुहिम चला रहे हैं कि जिन मंदिरों और धार्मिक स्थलों का सरकार ने अधिग्रहण किया है उन्हें वापस किया जाए. और इन स्थलों का संचालन धर्माचार्यों की देखरेख में बनाए जाने वाले सनातन धर्म बोर्ड के माध्यम से हो. ऐसे समय में सरकार द्वारा बांके बिहारी मंदिर पर ट्रस्ट बनाकर नियंत्रण की कोशिश करना हैरान करने वाला कदम है.
देवकीनंदन ठाकुर के क्षेत्र में मंदिर अधिग्रहण पर चुप्पी क्यों?
उन्होंने आश्चर्य जताया कि सबसे अधिक इस मुहिम को आगे बढ़ाने वाले देवकीनंदन ठाकुर के ही वृंदावन क्षेत्र में स्थित बांके बिहारी मंदिर को सरकार ट्रस्ट बनाकर अधिग्रहित कर रही है और वहां की सेवायत परंपरा को दरकिनार कर रही है. फिर भी कोई इसका विरोध नहीं कर रहा. यह चुप्पी गंभीर चिंता का विषय है.
गोरखनाथ मंदिर के अधिग्रहण की चुनौती
शंकराचार्य ने तीखा सवाल करते हुए कहा कि यदि सरकार मंदिरों के अधिग्रहण के लिए तत्पर है तो फिर गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर का भी अधिग्रहण किया जाए. उन्होंने कहा कि यदि बांके बिहारी मंदिर को ट्रस्ट बनाकर वहां के सेवायतों और महंतों को अलग किया जा सकता है तो गोरखनाथ मंदिर को भी ट्रस्ट बनाकर उसकी आमदनी से जनता के लिए सार्वजनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जानी चाहिए.
बांके बिहारी मंदिर की परंपरा का करें सम्मान
शंकराचार्य ने स्पष्ट कहा कि बांके बिहारी मंदिर परंपरा से सेवायतों और गोस्वामियों द्वारा संचालित होता आया है. सरकार को इस परंपरा का सम्मान करना चाहिए. उन्होंने कहा कि यदि मंदिर में कोई कमी है या गड़बड़ी है तो उस गड़बड़ी को दूर किया जाए. लेकिन किसी बहाने मंदिर का सरकारीकरण करना अनुचित है.
धर्मस्थान को धर्मनिरपेक्षता की भेंट न चढ़ाएं
अपने वीडियो संदेश में शंकराचार्य ने जोर देकर कहा कि धर्मस्थान और धर्मनिरपेक्ष स्थान में बहुत अंतर होता है. भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश जरूर है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि धार्मिक स्थलों को भी धर्मनिरपेक्षता की भेंट चढ़ा दिया जाए. उन्होंने सरकार से अपील की कि कम से कम भारत के धर्मस्थानों को धर्मस्थान ही रहने दें। उन्हें सरकारी नियंत्रण में लाकर धर्मविहीन न बनाएं.
काशी विश्वनाथ मंदिर के अधिग्रहण का उदाहरण भी दिया
शंकराचार्य ने काशी विश्वनाथ मंदिर के अधिग्रहण की भी चर्चा की. उन्होंने बताया कि 1982 में एक चोरी की घटना के आधार पर इस मंदिर को अधिग्रहित किया गया था. जबकि वह चोरी आज तक सुप्रीम कोर्ट में भी साबित नहीं हो सकी. उन्होंने यह भी कहा कि अधिग्रहण के बाद मंदिर में कई चोरियां हुईं लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि वह अब सरकार के नियंत्रण में है.
धर्माचार्यों से किया आंदोलन का आह्वान
अपने संदेश में उन्होंने वृंदावन के धर्माचार्यों और संत समाज से आह्वान किया कि वे एकजुट होकर इस अधिग्रहण के विरोध में खड़े हों. और किसी भी कीमत पर बांके बिहारी मंदिर को सरकार के हाथों में जाने से रोकें. उन्होंने चेताया कि यदि मंदिरों का सरकारीकरण यूं ही चलता रहा तो भविष्य में धर्म का स्वरूप ही बदल जाएगा और वहां धर्म की व्यवस्था नाम मात्र रह जाएगी.
“परंपरा से चले” मंदिरों को न छुए सरकार
शंकराचार्य का यह बयान साफ तौर पर उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले पर सवाल खड़े करता है. उन्होंने जोर दिया कि जो मंदिर पीढ़ियों से सेवायतों और संतों के संचालन में चल रहे हैं. उनकी व्यवस्था को सरकार को छेड़ना नहीं चाहिए. नहीं तो यह सनातन धर्म और उसकी परंपराओं पर सीधा आघात होगा.
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