मेरठ का रहस्यमयी किला, जहां राजा परीक्षित को मिला श्राप, तक्षक नाग ने बदली इतिहास की दिशा

Updated:
विज्ञापन
मेरठ का किला परीक्षितगढ़ और नागो का रहस्य

मेरठ का किला परीक्षितगढ़ और नागो का रहस्य

UP News: मेरठ का परीक्षितगढ़ किला महाभारत काल की मान्यताओं से जुड़ा एक रहस्यमयी स्थान है। यहाँ राजा परीक्षित, तक्षक नाग और श्रृंगी ऋषि की कहानियाँ आज भी सुनाई जाती हैं। यह स्थान इतिहास और आस्था का संगम है।

विज्ञापन

UP News: यहां का एक और इतिहास आपको हैरान कर सकता है. मेरठ में मौजूद किला परीक्षितगढ़ ऐसा स्थान माना जाता है...जिसका रिश्ता सीधे महाभारत काल से जुड़ा हुआ है. यहां राजा परीक्षित, तक्षक नाग और श्रृंगी ऋषि से जुड़ी कई कहानियां आज भी लोगों के बीच सुनाई जाती हैं. यही वजह है कि यह जगह इतिहास और आस्था, दोनों के लिए खास मानी जाती है. मेरठ और हस्तिनापुर के आसपास कई ऐसे स्थान हैं... जिनका जिक्र महाभारत से जुड़ी मान्यताओं में मिलता है. उन्हीं में से एक है किला परीक्षितगढ़. हस्तिनापुर के इतिहास पर लंबे समय से अध्ययन कर रहे एक्सपर्ट प्रियंक भारती बताते हैं कि मान्यता है कि राजा परीक्षित के समय से ही कलयुग की शुरुआत मानी जाती है. इसी दौर में उनके जीवन में ऐसी घटनाएं हुईं... जिनका जिक्र धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है.

प्यास, अपमान और श्राप... कैसे शुरू हुई राजा परीक्षित के अंत की कहानी?

कहानी के अनुसार एक दिन राजा परीक्षित शिकार के लिए जंगल गए थे. काफी देर तक जंगल में रहने के बाद उन्हें प्यास लगी. पानी की तलाश करते हुए वह श्री शमीक ऋषि के आश्रम पहुंचे. उस समय ऋषि गहरी तपस्या में बैठे थे. राजा ने कई बार उनसे पानी मांगा, लेकिन तपस्या में लीन होने की वजह से ऋषि ने कोई जवाब नहीं दिया. इससे राजा परीक्षित को गुस्सा आ गया.

कड़ी सुरक्षा भी नहीं बचा सकी जान, नागराज तक्षक ने ऐसे पूरा किया श्राप

गुस्से में राजा ने पास में पड़े एक मृत काले नाग को उठाकर ऋषि शमीक के गले में डाल दिया. ऋषि फिर भी अपनी तपस्या में लगे रहे. यह पूरी घटना ऋषि के पुत्र श्रृंगी ने देख ली. उन्होंने राजा परीक्षित के इस व्यवहार से नाराज होकर श्राप दिया कि सातवें दिन उनकी मृत्यु सर्प के डसने से होगी. श्राप मिलने के बाद राजा परीक्षित ने अपनी जान बचाने के लिए कई कोशिशें कीं. उन्होंने ऋषि-मुनियों से श्राप वापस लेने की भी प्रार्थना की, लेकिन ऐसा नहीं हो सका. इसके बाद उन्होंने अपने महल की सुरक्षा बहुत मजबूत कर दी, ताकि कोई भी अंदर न पहुंच सके. लेकिन मान्यता है कि नागों के राजा तक्षक ने छोटा रूप धारण किया और महल के अंदर पहुंचकर राजा परीक्षित को डस लिया. इसी के बाद उनकी मृत्यु हो गई.

जनमेजय का सर्प यज्ञ, आज भी परीक्षितगढ़ में जीवित हैं महाभारत काल की मान्यताएं

राजा परीक्षित की मौत से उनके पुत्र जनमेजय बहुत दुखी हुए. उन्होंने बदला लेने के लिए सर्प यज्ञ शुरू कराया. मान्यता है कि इस यज्ञ में बड़ी संख्या में नाग अग्नि में गिरने लगे. जब नाग जाति पर संकट बढ़ा तो नागराज वासुकि ने भगवान विष्णु और दूसरे देवी-देवताओं से प्रार्थना की. इसके बाद देवताओं के हस्तक्षेप से यह यज्ञ रोक दिया गया. आज भी किला परीक्षितगढ़ और श्री श्रृंगी ऋषि आश्रम में इन घटनाओं से जुड़ी कई मान्यताएं सुनने को मिलती हैं. यहां यज्ञ स्थल, पदचिह्न और कई धार्मिक प्रतीक मौजूद हैं, जिन्हें लोग महाभारत काल से जोड़कर देखते हैं. स्थानीय लोगों का यह भी मानना है कि आश्रम के आसपास अगर कोई सर्प हो तो उसका आभास हो जाता है. यही कारण है कि हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक यहां पहुंचते हैं. उत्तर प्रदेश सरकार भी इस ऐतिहासिक विरासत को पर्यटन के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है... ताकि लोग इस अनोखे इतिहास को करीब से जान सकें.

Also Read: CM योगी ने गाजियाबाद को दी 868 करोड़ की सौगात, बोले- 2017 के बाद बदली प्रदेश की तस्वीर, अब नहीं रुक सकती कांवड़ यात्रा


विज्ञापन
Lucky Kumari

लेखक के बारे में

By Lucky Kumari

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola