गोमती रिवर फ्रंट घोटाला में पूर्व मुख्य सचिव आलोक रंजन-दीपक सिंघल से CBI करेगी पूछताछ, सरकार से मांगी अनुमति

गोमती रिवर फ्रंट घोटाला की आंच उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव रहे आलोक रंजन और दीपक सिंघल तक पहुंच गयी है. सीबीआई ने दोनों पूर्व नौकरशाहों से पूछताछ के लिए सरकार से अनुमति मांगी है. समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) की सरकार में हुए घोटाले की जांच योगी सरकार में हो रही है.
लखनऊ: महत्वाकांक्षी गोमती रिवर फ्रंट परियोजना में हुए घोटले (Gomti riverfront scam) में सीबीआई ने उत्तर प्रदेश सरकार से प्रदेश के तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक रंजन (Alok Ranjan ) और दीपक सिंघल ( Deepak Singhal) से पूछताछ करने के अनुमति मांगी है. सरकारी की अनुमति के बाद सीबीआई रिटायर्ड हो चुके दोनों नौकरशाहों से पूछताछ करेगी. सीबीआई की अभी तक की जांच के आधार पर दोनों पूर्व आइएएस अधिकारियों से पूछताछ को सवालों की एक लिस्ट भी तैयार की है. सीबीआई जानना चाहती है कि गोमती रिवर फ्रंट परियोजना के कार्यान्वयन में भ्रष्टाचार और बड़े पैमाने पर हुई अनियमितताओं में इन अफसरों ने क्या भूमिका निभाई थी. हालांकि सिंचाई विभाग के तत्कालीन मंत्री एवं सपा के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव पर भी सवाल उठ रहे हैं. जांच के दायरे में विभाग के 16 इंजीनियर सहित करीब 180 लोग हैं.
गोमती रिवर फ्रंट डेवलपमेंट प्रोजेक्ट की शुरुआत अखिलेश यादव शासन (2012-17) के दौरान हुई थी. परियोजना का उद्देश्य राज्य की राजधानी लखनऊ में गोमती नदी के किनारों का सौंदर्यीकरण और भूनिर्माण था.दोनों किनारों पर एक डायाफ्राम दीवार और नालियों को रोककर नदी के पानी को चैनलाइज़ करना था. 2017 में सत्ता में आने के बाद, योगी सरकार ने गोमती रिवरफ्रंट परियोजना में कथित अनियमितताओं की पहली जांच का आदेश दिया. 19 जून, 2017 को सिंचाई विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों सहित कई लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गयी.बाद में सीबीआई को जांच सौंप दी गई.
सीबीआई जांच ने शुरू में पुष्टि की कि परियोजना के लिए 1,513 करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया था और लगभग 1,437 करोड़ रुपये (कुल बजट का 95 प्रतिशत) परियोजना का 60 प्रतिशत भी काम पूरा किए बिना खर्च किया गया था. खर्च में कई विसंगतियां सामने आईं. इसके अलावा, जिस कंपनी को रिवरफ्रंट ब्यूटीफिकेशन का काम आवंटित किया गया था, वह डिफॉल्टर थी. प्रवर्तन निदेशालय ने भी मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत जांच शुरू की थी. 17 फरवरी, 2021 को, सीबीआई ने लखनऊ में सीबीआई अदालत में छह लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया था, जिसमें फर्म के दो निदेशकों को शामिल किया गया था, जिन्हें नदी तटीकरण का काम आवंटित किया गया था,और बाद में लखनऊ में दो सिंचाई इंजीनियरों को गिरफ्तार किया गया था.
करोड़ों रुपये के घोटाले में सीबीआई ही नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट भी सख्त रुख अपनाए है. पिछले दिनों इलाहाबाद हाइकोर्ट क न्यायमूर्ति दिनेश कुमार सिंह की एकल ने परियोजना सलाहकार बद्री श्रेष्ठ को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया था. कोर्ट ने परियोजना सलाहकार की भूमिका, उसके खिलाफ उपलब्ध साक्ष्य और परियोजना में किए गए भ्रष्टाचार की भयावहता पर गंभीर टिप्पणी भी की थी. जस्टिस सिंह ने कहा था कि कि आर्थिक अपराधों के मामले में गहरी साजिश और भारी सार्वजनिक धन की हानि को गंभीरता से देखने की जरूरत है क्योंकि ये देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले गंभीर अपराध हैं. “जमानत देते समय अदालत को आरोपों की प्रकृति, परिमाण और अपराध की गंभीरता के साथ-साथ आरोपों की प्रकृति का समर्थन करने वाले सबूतों को ध्यान में रखना होगा.”
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