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यूपी चुनाव : मां-बेटी और बहनों की यह भिड़ंत भी कुछ कम नहीं!

Updated at : 15 Jan 2017 7:49 AM (IST)
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यूपी चुनाव : मां-बेटी और बहनों की यह भिड़ंत भी कुछ कम नहीं!

!!कृष्ण प्रताप सिंह!! उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में चल रहे घमसान का राज्य के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा फायदा किसे मिलेगा, इसे लेकर अभी प्रेक्षकों में आम राय नहीं है. लेकिन, अभी तो उससे सबसे ज्यादा चुनावपूर्व राहत उसकी ही जैसी कलह के शिकार अपना दल को महसूस हो रही है. अपना […]

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!!कृष्ण प्रताप सिंह!!

उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी में चल रहे घमसान का राज्य के विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा फायदा किसे मिलेगा, इसे लेकर अभी प्रेक्षकों में आम राय नहीं है. लेकिन, अभी तो उससे सबसे ज्यादा चुनावपूर्व राहत उसकी ही जैसी कलह के शिकार अपना दल को महसूस हो रही है. अपना दल भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए और नरेंद्र मोदी की सरकार में साझीदार है. सपा कहीं ज्यादा मजेदार भिड़ंत अपना दल में है. यहां मां बेटी और बहन-बहन के बीच विवाद है.

सोनेलाल पटेल ने बसपा के संस्थापक कांशीराम से अपने मतभेदों के कारण चार नवंबर, 1995 को अपना दल की स्थापना की थी. अक्तूबर, 2009 में सड़क दुर्घटना में उनकी मृत्यु के बाद पार्टी चलाने की जिम्मेदारी उनकी पत्नी कृष्णा पटेल व बेटियों पल्लवी व अनुप्रिया के कंधों पर आयी.

2012 के विधानसभा चुनाव में सहानुभूति के चलते उनकी छोटी बेटी अनुप्रिया वाराणसी की रोहनिया विधानसभा सीट से विधायक बनीं तो मां-बेटियों की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ने लगीं. 25 मार्च, 2014 को उन्होंने अचानक सोनलाल की विचारधारा को धता बता कर अपना दल को एनडीए का हिस्सा बना दिया. तब लोकसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे में उन्हें प्रतापगढ़ व मिर्जापुर सीटें मिलीं और उनके प्रत्याशियों ने दोनों पर ही विजय दर्ज की. मिर्जापुर में अनुप्रिया जीतीं तो प्रतापगढ़ में हरिवंश. अनुप्रिया नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य राज्यमंत्री हैं.

सब कुछ ठीक चल रहा था कि सोनेलाल की विरासत में हिस्से को लेकर उनकी दोनों बेटियां पल्लवी व अनुप्रिया आमने-सामने आ गयीं. मां कृष्णा पटेल ने इनमें बड़ी पल्लवी का साथ देकर उसे दल का पदाधिकारी बनाया, तो अनुप्रिया से सहा नहीं गया. फिर तो मां से उनका विवाद इतना बढ़ गया कि दोनों चुनाव आयोग पहुंच गये और दोनों के रास्ते तकरीबन अलग हो गये.

अनुप्रिया ने खाली हुई रोहनिया विधानसभा सीट के लिए उपचुनाव में अपने पति आशीष को दल का प्रत्याशी बनाने के प्रयास शुरू किये तो कृष्णा पटेल ने खुद प्रत्याशी बन कर उनकी राह रोक दी. भिन्नाई अनुप्रिया ने भीतरघात करके उन्हें हरा दिया तो कृष्णा ने उन्हें सारे पार्टी पदों से हटाने के बाद सात मई, 2015 को पार्टी से ही निकाल दिया. अनुप्रिया सौभाग्यशाली रहीं कि भाजपा या नरेंद्र मोदी ने उनकी मां की नहीं सुनी और उनका केंद्रीय मंत्री पद बरकरार रहा. कहते हैं कि गत 16 दिसंबर, 2016 को उन्होंने चुनाव आयोग में अपना दल (सोनेलाल पटेल) नाम से नयी पार्टी का रजिस्ट्रेशन करा लिया है, लेकिन चाहती हैं कि किसी तरह विधानसभा चुनाव से पहले मां कृष्णा से सुलह हो जाये तो दल का विभाजन होने से बच जाये. इसके लिए पटेल परिवार के कुछ पुराने मित्रों के माध्यम से उन्होंने मां के पास सुलह का प्रस्ताव भेजा है, लेकिन मां हैं कि चुनाव आयोग के पास लंबित विवाद वापस लेने या उसपर जोर न देने के लिए भी तैयार नहीं है.

उनके गुट के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार जो प्रस्ताव भेजा गया है, उसमें कृष्णा पटेल को पार्टी का अध्यक्ष बनाने और रोहनिया सीट से चुनाव लड़ाने की पेशकश भी की गयी है. लेकिन यहां भी सपा जैसा ही एक पेच है. यह भी शर्त रखी गयी है कि बड़ी बहन पल्लवी पार्टी के कामकाज से दूर रहेंगी. मगर कृष्णा गुट के आरबी सिंह पटेल कहते हैं कि अभी ऐसा कोई प्रस्ताव आया ही नहीं है. सूत्र कहते हैं कि मां कृष्णा मान भी जायें, तो बड़ी बहन पल्लवी छोटी अनुप्रिया की ‘अधीनता’ नहीं ही स्वीकार करने वाली.

अनुप्रिया गुट के एक नेता का दावा है कि अगर सुलह की यह कोशिश सफल नहीं होती तो अनुप्रिया के नेतृत्व वाला धड़ा अपना दल (सोनेलाल) नामक पार्टी के बैनर तले और भाजपा के साथ गंठबंधन से चुनाव लड़ेगा. इस नेता ने कहा कि नयी पार्टी का पंजीकरण हो गया है और उसे ‘प्लेट एवं कप’ चुनाव निशान भी आवंटित हो गया है.

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