मिर्जापुर में आखिर क्यों दम तोड़ रहा है व्यापार ? यहां सबसे बड़ा मुद्दा है रोजगार

Published at :30 Apr 2019 2:07 PM (IST)
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मिर्जापुर में आखिर क्यों दम तोड़ रहा है व्यापार ? यहां सबसे बड़ा मुद्दा है रोजगार

मिर्जापुर से पंकज कुमार पाठकमिर्जापुर के लोग बड़े शान से बताते हैं कि उनके यहां, रूई और लाख-चपड़ा का काम अंग्रेजों के जमाने से होता था. मिर्जापुर भले ही वेब सीरीज और कालीन व्यापार की वजह से नाम कमा रहा हो लेकिन इस जिले की आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है. जिस व्यापार को लेकर मिर्जापुर […]

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मिर्जापुर से पंकज कुमार पाठक
मिर्जापुर के लोग बड़े शान से बताते हैं कि उनके यहां, रूई और लाख-चपड़ा का काम अंग्रेजों के जमाने से होता था. मिर्जापुर भले ही वेब सीरीज और कालीन व्यापार की वजह से नाम कमा रहा हो लेकिन इस जिले की आर्थिक स्थिति बिगड़ रही है. जिस व्यापार को लेकर मिर्जापुर में आज भी गर्व किया जाता है कि हम पुराने व्यापारी हैं इसके वही व्यापार दम तोड़ रहा है. कारण ढूंढ़ने निकलेंगे तो कई पायेंगे. व्यापारी बताते हैं सबसे बड़ा कारण है अचानक इन चीजों की मांग का कम हो जाना. इन चीजों में टैक्स का लगना, कारीगरों का पारंपरिक काम छोड़कर दूसरे कामों की तरफ चले जाना. मिर्जापुर में सबसे बड़ा मुद्दा रोजगार का है. आइये समझते हैं कि व्यापार में हो रहे नुकसान की असल वजह क्या है और कैसे यह पारंपरिक व्यापार खत्म हो रहा है.

पीतल का कारोबार
मिर्जापुर शहर की गलियों में आज भी आपको कारीगर पीतल का काम करते नजर आयेंगे. कहीं पीतल की नये सामान बन रहे हैं तो कहीं पुराने सामान को ठीक किया जा रहा है. पीतल मंडी को समझने के लिए हम एक बर्तन की दुकान पर पहुंचे. शंभुनाथ पीढ़ियों से यह दुकान चला रहे हैं. शंभुनाथ कहते हैं, देखिये जी पीतल के बर्तन आजकल आप कहां इस्तेमाल होता देखते हैं, स्टील के, चीनी मिट्टी के बर्तन अब चलते हैं. पीतल के बर्तन तो अब सिर्फ शादी विवाह में देन लेन के लिए बचा है और वो भी इसे बचा रहा है गांव शहर नहीं क्योंकि वहां लिफाफा चलता है, इलेक्ट्रोनिक सामान चलता है, हमारे यहां गांवों में बेटियों की शादी में अब भी लोग पीतल के बड़े- बड़े सामान देते हैं और रिवाज है कि उससे बड़ा सामान उन्हें मिलेगा जब देने वाले के घर में शादी होगी. व्यापार तो ठप हो गया. मांग खत्म हो रही है, कारीगर मजदूर कोई और काम तलाश रहे हैं लेकिन मिर्जापुर में आप आज भी पायेंगे कि ज्यादातर लोग पीतल का काम करते हैं. अगर इसके एक्सपोर्ट पर ध्यान दिया गया, टैक्स में छूट मिली तो यह कारोबार फिर एक बार तेजी पकड़ सकता है.

गरीबों का सोना तो पीतल ही है

शरद कुमार भी पीतल मंडी से जुड़े हैं. इसी इलाके में रहते हैं. सोना आज कितना महंगा हो गया है, शादी विवाह में जरूरी है खरीदना सामान्य और निम्न स्तर के परिवार वालों के लिए शादी में सोना खरीदना कितना मुश्किल होता है आप समझते हैं. पीतल को गरीबों का सोना समझिये लेकिन अब इस सोने की भाव भी बढ़ रहा है. इस पर हमें टैक्स देना पड़ता है. कच्च पर 18 फीसद का टैक्स और पक्क पर 12 फीसद का. व्यापारी इस टैक्स की भरपाई कहां से करेगा कीमत तो बढ़ेगी, कीमत बढ़ेगी तो मांग पहले जैसी कहां से होगी. सत्यम गुप्ता पीतल के कारोबार को लेकर कहते हैं, पीढ़ियों से यह कारोबार चला आ रहा है. आप मिर्जापुर के घर – घर में जाकर देख सकते हैं कई लोग इसका काम करते हैं. कई लोगों के घर में मशीनें लगी है लेकिन मुनाफा कहां है.

कालीन का कारोबार में अब जमीन पर

मिर्जापुर के कालीन की चर्चा खूब है ना सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी मिर्जापुर के कालीन की मांग बढ़ी है लेकिन कालीन का व्यापार अब मिर्जापुर में खत्म हो रहा है. कारीगर काम छोड़कर दूसरे काम की तलाश कर रहे हैं. मिर्जापुर के कालीन की ना तो पहले जैसी डिमांड है ना कारीगरों की पहले जैसी आमद. मिर्जापुर के प्रमुख चौराहे पर एक छोटी सी दुकान चला मनोज कहते हैं, अब नये कारीगार आयेंगे कहां से जब पुराने ही नहीं टिकते. कालीन का व्यापार मिर्जापुर को आगे ले जा सकता था लेकिन पिछले दो सालों में कालीन का व्यापार 75 फीसद कम हो गया. हमें ना तो कंपनियां पहले की तरह आर्डर देती ना हम कारीगरों को पहले जैसा काम दे पाते हैं. अब सिर्फ 25 फीसद ही काम बचा है कारीगर तो भूखों नहीं मरेंगे ना दूसरा काम तलाशते हैं.

इंसाफ पीढ़ियों से यह काम कर रहे हैं लेकिन कम मजदूरी मिलने की वजह से उन्हें मजबूरी में यह काम छोड़ना पड़ा था तीन महीने मुंबई रहे लेकिन पारिवारिक परेशानी की वजह से उन्हें वापस लौटना पड़ा. इंसाफ कहते हैं मेरे दो बच्चे हैं एक बच्चा विकलांग है मुझे महीने में इस व्यापार से सिर्फ 5 से छह हजार रुपये की कमाई होती है.

नजीब और रहमत भी कालीन का काम करते हैं लेकिन यह सीधे कारीगरों से कालीन खरीदते हैं और मिर्जापुर में आकर बेचते हैं. नजीब बताते हैं कि कभी- कभी तो हमारा खर्च भी नहीं निकलता लेकिन आज भी कालीन की थोड़ी मांग है तो हम बेच पा रहे हैं. हमारा काम इसी तरह चलता है, हमने कारीगर या कंपनी से सामान खरीदा अगर 50-100 भी मुनाफा रहा तो बेच दिया. अगर किसी दिन कालीन नहीं बिकी तो कंपनी को लेकर वापस दे दिया. हमें भी कई बार जब कालीन नहीं बिकती या मुनाफा नहीं मिलता तो लगता है कोई और काम तलाश लिया जाए.

क्या है मांग, कैसे बच सकता है कारोबार

कालीन और पीतल के कारोबार में जुड़े लोग कहते हैं. सरकार अगर इस तरफ ध्यान दे और कालीन के आयात पर कोई योजना बनाये, पीतल के कारोबार में टैक्स की छूट दे तो यह कारोबार बच सकता है. इन दोनों काम में पी़ढ़ियों से लोग लगे हैं आधे से ज्यादा मिर्जापुर यही काम करता है. दोनों काम घर में होने वाले हैं इसलिए इसे लघु उद्योग का दर्जा दिया जाए और इसके तहत मिलन वाली सारी रियायत मिले तो इसमें रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे.

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