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एक अदद कॉलेज के लिए संघर्ष कर रहे थे झारसुगुड़ा के लोग, सीधे मिल गया विश्वविद्यालय

Updated at : 21 Feb 2026 9:44 AM (IST)
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Jharsuguda University

झारसुगड़ा का रेलवे स्टेशन

Jharsuguda University: ओडिशा बजट में झारसुगुड़ा को विश्वविद्यालय की सौगात मिली है. वर्षों से सरकारी महाविद्यालय की मांग कर रहे लोगों को सीधे विश्वविद्यालय की घोषणा से बड़ी राहत मिली. मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी की घोषणा के बाद शहर में जश्न का माहौल है और इसे ऐतिहासिक निर्णय माना जा रहा है. पूरी खबर नीचे पढ़ें.

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Jharsuguda University: ओडिशा विधानसभा में शुक्रवार को मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी ने राज्य का वार्षिक बजट पेश करते हुए चार नये विश्वविद्यालय स्थापित करने की घोषणा की. इन विश्वविद्यालयों की स्थापना केंद्रापाड़ा, जगतसिंहपुर और झारसुगुड़ा समेत चार स्थानों पर की जायेगी. जैसे ही विधानसभा में यह घोषणा हुई, झारसुगुड़ा में खुशी की लहर दौड़ गयी. लंबे समय से उच्च शिक्षा संस्थान की मांग कर रहे लोगों के लिए यह ऐतिहासिक क्षण बन गया.

झंडा चौक पर जश्न, आतिशबाजी और ढोल-नगाड़े

घोषणा के तुरंत बाद झारसुगुड़ा के झंडा चौक पर भाजपा कार्यकर्ता और स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में एकत्र हुए. शाम करीब साढ़े पांच बजे से ही वहां जश्न का माहौल बन गया. ढोल-नगाड़ों की थाप पर कार्यकर्ता नाचते रहे और जमकर आतिशबाजी की गयी. एक-दूसरे को लड्डू खिलाकर खुशी का इजहार किया गया. कार्यकर्ताओं ने इस उपलब्धि का श्रेय केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान, मुख्यमंत्री मोहन चरण मांझी और झारसुगुड़ा विधायक टंकधर त्रिपाठी को दिया. भाजपा नेताओं ने कहा कि यह निर्णय बताता है कि पार्टी जो वादा करती है, उसे पूरा भी करती है. उनके मुताबिक, राज्य में सरकार बदलने के बाद विकास की गति तेज हुई है और झारसुगुड़ा को सीधे विश्वविद्यालय की सौगात मिलना इसका प्रमाण है.

1994 से अधूरी थी सरकारी कॉलेज की मांग

गौरतलब है कि 1994 में जिला बनने के बाद से झारसुगुड़ा में एक भी सरकारी महाविद्यालय स्थापित नहीं हुआ था. स्थानीय छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिए दूसरे जिलों का रुख करना पड़ता था. आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण रही. इसी कारण वर्षों से विभिन्न सामाजिक और छात्र संगठनों द्वारा एक अदद सरकारी कॉलेज की मांग को लेकर आंदोलन और ज्ञापन सौंपे जाते रहे. स्थानीय लोगों का कहना है कि पूर्ववर्ती कांग्रेस और बीजद सरकारों के कार्यकाल में भी यह मुद्दा कई बार उठा, लेकिन ठोस परिणाम सामने नहीं आया. मांगें कागजों तक सीमित रहीं और हर बार आश्वासन देकर मामला शांत कर दिया गया.

कॉलेज से सीधे विश्वविद्यालय तक का सफर

झारसुगुड़ा के लोग जहां एक सरकारी कॉलेज के लिए संघर्ष कर रहे थे, वहीं अब सीधे विश्वविद्यालय की घोषणा ने सभी को चौंका दिया है. इसे जिले के शैक्षणिक इतिहास में बड़ा मोड़ माना जा रहा है. विश्वविद्यालय की स्थापना से न केवल स्नातक बल्कि स्नातकोत्तर और शोध स्तर की पढ़ाई की भी संभावनाएं खुलेंगी. विशेषज्ञों का मानना है कि विश्वविद्यालय खुलने से स्थानीय युवाओं को बेहतर शैक्षणिक अवसर मिलेंगे, साथ ही क्षेत्र में रोजगार के नये अवसर भी पैदा होंगे. शिक्षकों, प्रशासनिक कर्मचारियों और अन्य सहायक सेवाओं में नियुक्तियां होने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी.

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विकास की नयी उम्मीद

झारसुगुड़ा औद्योगिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जिला माना जाता है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में अब तक अपेक्षित प्रगति नहीं हो पायी थी. विश्वविद्यालय की स्थापना से जिले की पहचान एक शैक्षणिक केंद्र के रूप में भी बनेगी. आसपास के जिलों के विद्यार्थी भी यहां आकर शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे. भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इसे ऐतिहासिक निर्णय बताते हुए कहा कि यह झारसुगुड़ावासियों के लंबे संघर्ष और धैर्य का परिणाम है. फिलहाल पूरे जिले में उत्साह का माहौल है और लोग उम्मीद कर रहे हैं कि जल्द ही विश्वविद्यालय की स्थापना की औपचारिक प्रक्रिया शुरू होगी.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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