14 साल की उम्र में गिरिडीह से मुंबई गये कृष्ण कुमार दास हैं प्रोडक्शन मैनेजर, 150 लोगों को दे रहे रोजगार

मुंबई में 10 साल बिताने के बाद वर्ष 2012 में बॉलीवुड में कृष्ण कुमार को प्रोडक्शन मैनेजर की नौकरी मिल गयी. यहीं से कृष्ण कुमार दास के जीवन में बदलाव आना शुरू हो गया. आज महज 34 साल की उम्र में वह 150 से अधिक लोगों को रोजगार दे रहे हैं.
झारखंड के लोग (Jharkhand Ke Pravasi) प्रतिभाशाली तो हैं ही, मेहनती भी होते हैं. प्रतिभा और मेहनत की बदौलत ही वे जहां भी जाते हैं, सफलता के झंडे गाड़ देते हैं. गिरिडीह जिला के कृष्ण कुमार दास भी एक ऐसी ही शख्सीयत हैं. बेहद गरीब परिवार में जन्मे कृष्ण कुमार दास महज 14 साल की उम्र में मायानगरी मुंबई चले गये थे. रोजगार की तलाश में.
एक अनजान शहर में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. लंबे समय तक आजीविका के लिए संघर्ष करते रहे. ट्यूशन करके मैट्रिक तक की पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में नौकरी की तलाश शुरू कर दी. जहां काम मिला, वहां पूरी मेहनत और लगन से काम करने लगे.

मुंबई में 10 साल बिताने के बाद वर्ष 2012 में फोर लाइन फिल्म प्राइवेट लिमिटेड प्रोडक्शन हाउस में गिरिडीह के कृष्ण कुमार को प्रोडक्शन मैनेजर की नौकरी मिल गयी. यहीं से कृष्ण कुमार दास के जीवन में बदलाव आना शुरू हो गया. महज 34 साल की उम्र में वह 150 से अधिक लोगों को रोजगार दे रहे हैं. उनके कार्यों की मॉनिटरिंग भी करते हैं.
ये वो लोग हैं, जो विभिन्न फिल्मों और सीरियल्स की शूटिंग के दौरान प्रोडक्शन हाउस की अलग-अलग जरूरतों को पूरी करने के लिए रखे जाते हैं. कृष्ण कुमार दास पिछले करीब 12 वर्षों से इस कंपनी के लिए काम कर रहे हैं. आज उनकी माली हालत भी सुधर गयी है. वह खुद कहते हैं कि वह खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं.

कृष्ण कुमार दास का कहना है कि प्रोडक्शन मैनेजर की नौकरी मिलने के बाद उनका संघर्ष तो खत्म हुआ है, कई नामी-गिरामी फिल्म स्टार से भी उनका परिचय हुआ. उनके साथ काम करने का मौका मिला. बता दें कि गिरिडीह के बगोदर गांव के रहने वाले कृष्ण के काम से उनकी कंपनी के लोग भी बेहद खुश हैं. कृष्ण कहते हैं कि उन्होंने सिर्फ अपने कर्तव्य को ईमानदारीपूर्वक निभाया है.
उन्होंने बताया कि वर्ष 2002 में वह मुंबई चले गये थे. तब उनकी उम्र सिर्फ 14 साल थी. वह बालिग भी नहीं थे. पिता का साया सिर से उठ गया, तो परिवार चलाने की जिम्मेदारी उनके ऊपर आन पड़ी. मुंबई ने बेहद कम समय में बहुत कुछ सिखा दिया. अब वे अपने संघर्ष के उन दिनों को याद भी नहीं करना चाहते. लेकिन, उन्हें अपनी जिंदगी से कोई शिकायत नहीं हैं. उनका परिवार भी बेहद खुशहाल है. यह सब ईश्वर की कृपा है.

रिपोर्ट : नागेश्वर, गोमिया, बोकारो
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