झारखंड का अनोखा शिवालय, जहां 150 सालों से हो रही खंडित शिवलिंग की पूजा, जानें क्या है रहस्य?
पश्चिमी सिंहभूम के गोइलकेरा के बड़ैला गांव में स्थित महादेवशाल धाम और खंडित शिवलिंग. फोटो: प्रभात खबर
झारखंड के महादेवशाल धाम में एक अनोखी परंपरा है जहां 150 साल से खंडित शिवलिंग की पूजा की जाती है. जानें इस मंदिर से जुड़ी रहस्यमयी कहानी और रेलवे इतिहास का संगम.
गोइलकेरा से संजय पांडेय की रिपोर्ट
Mahadevshaal Dham: झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले में आस्था और इतिहास से जुड़ा एक ऐसा शिवालय है, जिसकी कहानी आम मंदिरों से बिल्कुल अलग है. चक्रधरपुर के गोइलकेरा प्रखंड के बड़ैला गांव में स्थित महादेवशाल धाम में पिछले करीब 150 वर्षों से खंडित शिवलिंग की पूजा किए जाने की मान्यता है. आमतौर पर धार्मिक परंपराओं में खंडित मूर्तियों की पूजा को उचित नहीं माना जाता, लेकिन इस मंदिर में आधे हिस्से वाले शिवलिंग को ही भगवान शिव का स्वरूप मानकर श्रद्धालु पूजा करते हैं.
खुदाई के दौरान मिला था शिवलिंग
स्थानीय मान्यता के अनुसार, इस घटना की कहानी 19वीं सदी के मध्य की है. उस समय बंगाल-नागपुर रेलवे की ओर से कलकत्ता से मुंबई के बीच रेल लाइन बिछाने का काम चल रहा था. इसी दौरान गोइलकेरा के बड़ैला गांव के आसपास रेलवे लाइन के लिए जमीन की खुदाई की जा रही थी. खुदाई कर रहे मजदूरों को जमीन के भीतर एक शिवलिंग दिखाई दिया. शिवलिंग दिखाई देने के बाद मजदूरों ने खुदाई रोक दी और आगे काम करने से इनकार कर दिया. उनके लिए यह केवल जमीन के भीतर मिला पत्थर नहीं था, बल्कि भगवान शिव का स्वरूप था. मजदूरों की आस्था के कारण काम आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया.
ब्रिटिश इंजीनियर ने शिवलिंग पर किया था प्रहार
कहानी के अनुसार, वहां मौजूद ब्रिटिश इंजीनियर रॉबर्ट हेनरी ने मजदूरों की बात को अंधविश्वास मानते हुए खुद शिवलिंग को हटाने की कोशिश की. बताया जाता है कि उन्होंने फावड़े से शिवलिंग पर प्रहार कर दिया. प्रहार के बाद शिवलिंग दो हिस्सों में विभाजित हो गया. इसके बाद कहानी में एक ऐसा मोड़ आया है, जिसने इस स्थान को स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र बना दिया. मान्यता के अनुसार, उसी दिन शाम को काम से लौटते समय ब्रिटिश इंजीनियर रॉबर्ट हेनरी की रास्ते में मौत हो गई. घटना के बाद मजदूरों और ग्रामीणों में भय का माहौल बन गया.
घटना के बाद रेलवे अधिकारियों ने बदला रास्ता
इंजीनियर की मौत को ग्रामीणों और मजदूरों ने शिवलिंग से जोड़कर देखा. इसके बाद लोगों का विश्वास और मजबूत हो गया कि शिवलिंग में दिव्य शक्ति है. रेलवे लाइन के निर्माण को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध बढ़ने लगा. बताया जाता है कि स्थिति को देखते हुए अंग्रेज अधिकारियों ने भी जबरदस्ती करने के बजाय लोगों की धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखने का फैसला किया. इसके बाद रेलवे लाइन को शिवलिंग से दूर ले जाने की योजना बनाई गई. इसके लिए रेल लाइन की दिशा में बदलाव करना पड़ा और दो सुरंगों का निर्माण किया गया.
आज भी आधे शिवलिंग की होती है पूजा
महादेवशाल धाम की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यहां जिस शिवलिंग की पूजा होती है, वह खंडित अवस्था में है. शिवलिंग का एक हिस्सा कटा हुआ बताया जाता है. इसके बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था में कोई कमी नहीं आई है. स्थानीय लोगों के साथ-साथ दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु भी यहां पहुंचकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना करते हैं. मंदिर से जुड़ी यह कहानी धार्मिक आस्था के साथ-साथ क्षेत्र के रेलवे इतिहास से भी जुड़ती है. यही वजह है कि महादेवशाल धाम स्थानीय लोगों के लिए केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान भी बन चुका है.
आस्था और इतिहास का अनोखा संगम
महादेवशाल धाम से जुड़ी रॉबर्ट हेनरी की मौत, रेलवे लाइन का मार्ग बदलने और सुरंगों के निर्माण की कहानी स्थानीय मान्यता के रूप में कही जाती है. इन घटनाओं के हर विवरण का स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध है या नहीं, यह अलग शोध का विषय है. लेकिन करीब डेढ़ सदी से चली आ रही इस लोककथा ने मंदिर को झारखंड के अनोखे शिवधामों में एक अलग पहचान जरूर दी है.
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सावन और महाशिवरात्रि में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
आज भी सावन और महाशिवरात्रि जैसे अवसरों पर यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है. खंडित शिवलिंग की पूजा की यह परंपरा धार्मिक मान्यताओं से अलग एक स्थानीय आस्था का उदाहरण है, जहां लोगों के लिए शिवलिंग का भौतिक रूप नहीं, बल्कि उससे जुड़ा विश्वास अधिक महत्वपूर्ण है. आखिर इंसान ने इतिहास में पत्थरों को देवता बनाया है, लेकिन यहां कहानी उलटी है, एक खंडित पत्थर ने अपनी पूरी कहानी के साथ इतिहास को ही अपने आसपास रोक लिया.
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लेखक के बारे में
By कुमार विश्वत सेन
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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