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मुंबई में 10 साल तक की दिहाड़ी मजदूरी, सब्जी की जैविक खेती से झारखंड के किसान की ऐसे बदल गयी जिंदगी

Updated at : 01 Aug 2025 7:29 PM (IST)
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farmer Khetro Mohan Sahu

खेत में लगे बैंगन दिखाते किसान खेत्रो मोहन साहू

Farmer Success Story: झारखंड के सरायकेला खरसावां जिले के नारायणपुर गांव के किसान खेत्रो मोहन साहू की जिंदगी सब्जी की जैविक खेती से बदल गयी है. वे नयी तकनीक से सब्जी का बंपर उत्पादन कर रहे हैं. कूड़े-कचरे से जैविक खाद तैयार करते हैं. नीम और गोमूत्र से बने कीटनाशक का उपयोग करते हैं. एक वक्त था जब वे मजदूरी के लिए मुंबई गए थे. वहां करीब 10 साल तक उन्होंने दिहाड़ी मजदूरी की थी. इसके बाद गांव लौट कर खेती में रम गए.

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Farmer Success Story: खरसावां (सरायकेला खरसावां), शचिंद्र कुमार दाश-झारखंड के सरायकेला खरसावां जिले के खरसावां के नारायणपुर गांव के किसान खेत्रो मोहन साहू नयी तकनीक अपना कर सब्जी की जैविक खेती कर रहे हैं. बंपर उत्पादन से उनकी अच्छी आमदनी भी हो रही है. सब्जी की खेती में मिल रही सफलता से आस-पास के किसान भी प्रेरित हो रहे हैं. खेत्रो मोहन साहू के खेत में सालोंभर हरियाली छायी रहती है. मौसम के अनुसार अलग-अलग वेराइटी की सब्जी की खेती करते हैं. प्रगतिशील किसानों में उनकी गिनती होती है. एक वक्त था जब वे दिहाड़ी मजदूरी करने मुंबई गए थे. वहां से लौटने के बाद वे खेती में रम गए.

बैंगन की खेती से बंपर कमायी


किसान खेत्रो मोहन साहू के खेतों में इन दिनों बड़े पैमाने पर वीएनआर 212 किस्म के ग्राफ्टेड बैंगन के पौधे लहलहा रहे हैं. खेतों में उनके द्वारा तैयार बैंगन चर्चा का विषय बना हुआ है. उन्होंने बताया कि पौधा लगाने से लेकर फसल तैयार होने में करीब 65 दिनों का समय लगता है और इसमें सालभर तक बैंगन निकलता है. खेत्रो मोहन साहू के खेतों में प्रति सप्ताह करीब दो क्विंटल बैंगन निकल रहे हैं.

खेती में करते हैं इजरायल की तकनीक का उपयोग


वर्ष 2018 में कृषि के क्षेत्र में तकनीकी प्रशिक्षण के लिए खेत्रो मोहन साहू भी सरकारी खर्च पर इजरायल जाने वाले थे, परंतु कुछ कारणों से वह इजरायल नहीं जा सके. खेत्रो मोहन साहू ने अपने खेतों में सिंचाई से लेकर इजरायली तकनीकों को अपनाया. इसके अच्छे परिणाम भी सामने आए. कम लागत में अच्छी पैदावार होने लगी.

कई बार मिल चुका है उन्नत कृषक का सम्मान


खेत्रों मोहन साहू ने बताया कि बेरोजगारी के कारण करीब दस साल तक मुंबई में दिहाड़ी मजदूरी की थी. वर्ष 2016 में गांव लौट कर खेतों की ओर रुख किया. खेती में नयी तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ जम कर पसीना बहाया. फिर इसका परिणाम भी धीरे धीरे कर सामने आने लगा. अब तो आस-पास के किसान भी खेत्रों से सब्जी खेती का गुर सीखने पहुंचते हैं. उन्नत खेती के लिए इन्हें कई बार कृषि विभाग से पुरस्कार भी मिल चुका है.

कूड़े-कचरे से तैयार करते हैं जैविक खाद


खेत्रो मोहन साहू अपने खेत को उपजाऊ बनाने के लिए सिर्फ जैविक खाद का इस्तेमाल करते हैं. इसके लिए फल और सब्जी के वेस्टेज के साथ-साथ घर के कूड़े-कचरे, सूखे पत्ते, पुआल, गोबर आदि को एक जगह पर इकठ्ठा कर पानी डाल कर दो माह तक सड़ने के लिए छोड़ देते हैं. फिर इसका उपयोग खाद के रूप में करते हैं. इस प्रकार तैयार खाद से अच्छी पैदावार होती है. काफी कम लागत आती है.

नीम और गोमूत्र से बने कीटनाशक का उपयोग

फसलों को कीड़ा से बचाने के लिए किसान प्राय: अलग-अलग किस्म के रसायनिक कीटनाशकों का उपयोग करते हैं, परंतु खेत्रो मोहन साहू अपने खेतों में जैविक कीटनाशकों का उपयोग करते हैं. नीम के पत्तों के साथ गोमूत्र और पानी मिला कर जैविक कीटनाशक तैयार करते हैं, फिर इसका इस्तेमाल अपने खेतों में करते हैं.

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Guru Swarup Mishra

लेखक के बारे में

By Guru Swarup Mishra

मैं गुरुस्वरूप मिश्रा. फिलवक्त डिजिटल मीडिया में कार्यरत. वर्ष 2008 से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पत्रकारिता की शुरुआत. आकाशवाणी रांची में आकस्मिक समाचार वाचक रहा. प्रिंट मीडिया (हिन्दुस्तान और पंचायतनामा) में फील्ड रिपोर्टिंग की. दैनिक भास्कर के लिए फ्रीलांसिंग. पत्रकारिता में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए. 2020 और 2022 में लाडली मीडिया अवार्ड.

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