महाभारत काल से जुड़ा है सरायकेला के भीमखंदा का इतिहास, मकर संक्रांति पर उमड़ता है श्रद्धालुओं का सैलाब
सरायकेला का भीमखंदा स्थित मंदिर जहां पर होती है हर साल मकर संक्रांति के अवसर पर पूजा, Pic Credit- Prabhat Khabar
Bhimkhanda Saraikela: सरायकेला के राजनगर प्रखंड स्थित भीमखंदा आस्था, इतिहास और रहस्य का संगम है. मकर संक्रांति पर श्रद्धालु बोंबोगा नदी में स्नान कर शिव पूजा करते हैं. पांडवों से जुड़ी मान्यताएं आज भी लोगों की आस्था का केंद्र हैं.
Bhimkhanda Saraikela, सरायकेला, शचिंद्र कुमार दाश: सरायकेला जिला मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर राजनगर प्रखंड में स्थित भीमखंदा आस्था, इतिहास और रहस्य का अनोखा संगम माना जाता है. प्राचीन मान्यताओं और लोककथाओं से जुड़ा यह स्थल मकर संक्रांति के मौके पर श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र बन जाता है. पर्व के दिन बोंबोगा नदी में स्नान कर लोग शिव मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं. ऐसी मान्यता है कि इस दिन यहां पूजा करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है. स्थानीय परंपरा के अनुसार द्वापर युग में पांडवों ने इस क्षेत्र में भगवान शिव की उपासना की थी. मकर संक्रांति के अगले दिन 15 जनवरी को यहां पारंपरिक मेले का आयोजन भी होता है, जिसमें दूर-दराज से लोग पहुंचते हैं. नदी की शांत बहती धारा और प्राकृतिक सौंदर्य श्रद्धालुओं को सहज ही अपनी ओर खींच लेता है.
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इतिहास और रहस्यों से घिरा भीमखंदा
भीमखंदा केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि कई ऐतिहासिक रहस्यों को अपने भीतर समेटे हुए है. गांव के बुजुर्गों और स्थानीय निवासियों के अनुसार, वनवास के दौरान पांडव कुछ समय के लिए यहां ठहरे थे. मान्यता है कि भोजन पकाने के लिए पत्थरों के बीच जो चूल्हा बनाया गया था, वह आज भी यहां मौजूद है. कहा जाता है कि द्रौपदी ने इसी चूल्हे पर सभी लोगों के लिए भोजन बनाया था.
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भीम से जुड़ा विशेष निशान भी लोगों के बीच कौतुहल का विषय
क्षेत्र में भीम से जुड़ा एक विशेष निशान भी लोगों के बीच कौतूहल का विषय बना हुआ है. माना जाता है कि यह निशान भी महाभारत काल के समय का ही है. इसके अलावा यहां मौजूद पत्थरों पर उकेरे गए अक्षर और चिह्न भी रहस्य पैदा करते हैं. किस लिपि में ये अंकित हैं, इसका आज तक स्पष्ट पता नहीं चल सका है. संरक्षण के अभाव में ये चिह्न धीरे-धीरे धुंधले होते जा रहे हैं.
अर्जुन वृक्ष बना आस्था का प्रतीक
भीमखंदा में स्थित ‘श्री श्री एकता संकल्प वृक्ष’, जिसे अर्जुन का पेड़ भी कहा जाता है. श्रद्धालुओं के बीच यह भी विशेष आस्था का केंद्र है. इस वृक्ष की संरचना अपने आप में अनोखी मानी जाती है. इसकी शाखाओं को पांडवों और उनकी माता से जोड़कर देखा जाता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह वृक्ष पांडवों की एकता और पारिवारिक समरसता का प्रतीक है. मकर संक्रांति के अवसर पर भीमखंदा में उमड़ने वाली भीड़ न केवल धार्मिक आस्था को दर्शाती है, बल्कि इस बात की भी गवाही देती है कि यह स्थल आज भी लोगों की श्रद्धा और विश्वास में जीवित है.
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