फूलों का संघर्ष, सब्जी की खेती और समृद्धि

Updated at : 12 Jun 2016 7:10 AM (IST)
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फूलों का संघर्ष, सब्जी की खेती और समृद्धि

अमर दास कुछ कर गुजरने का हौसला हो, तो मंजिल मिल ही जाती है. बोरियो प्रखंड की रक्सो पंचायत के कदमा गांव निवासी फूल सोरेन का संघर्ष इस बात का प्रमाण है. फूल सोरेन सब्जी की खेती कर परिवार का भरण-पोषण के साथ-साथ बच्चों को शिक्षित भी कर रही हैं. फूल के पति सुना टुडू […]

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अमर दास
कुछ कर गुजरने का हौसला हो, तो मंजिल मिल ही जाती है. बोरियो प्रखंड की रक्सो पंचायत के कदमा गांव निवासी फूल सोरेन का संघर्ष इस बात का प्रमाण है. फूल सोरेन सब्जी की खेती कर परिवार का भरण-पोषण के साथ-साथ बच्चों को शिक्षित भी कर रही हैं.
फूल के पति सुना टुडू ने बताया कि 15 वर्षों से वह घर के पीछे बाड़ी में मौसमी सब्जियों की खेती कर रहे हैं. सब्जियों को बेच कर जो आमदनी होती है, उससे वह अपने छह बच्चों का भरण-पोषण तो कर ही रहे हैं, उन्हें बेहतर शिक्षा भी दिला रहे हैं.
टुडू कहते हैं, ‘एक समय था जब हमें रोजगार नहीं मिलता था. रोजगार के अभाव में गांव के लोग पलायन करने के लिए मजबूर थे. लोग अपने परिवार को छोड़ कर काम करने के लिए बाहर चले जाते थे. मैंने सब्जी की खेती करने की सोची. पिछवाड़े जमीन तो थी, लेकिन बंजर. उसमें कुछ उगता नहीं था. मैंने इस जमीन को उपजाऊ बनाने का संकल्प लिया. लंबे समय तक उसमें खाद-पानी देता रहा. उसे कोड़ता रहा. धीरे-धीरे मिट्टी में जान (उर्वरता) आयी.’
इसके बाद टुडू ने धीरे-धीरे यहां सब्जी उगाना शुरू किया. सबसे पहले आलू लगाया. आलू की अच्छी उपज हुई. इसे बेच कर जब कुछ रुपये हाथ आये, तो हौसला बुलंद हो गया. फिर ज्यादा मनोयोग से विभिन्न तरह की सब्जियां उगाने लगे. अब तो वह आलू, टमाटर, बैंगन, कद्दू, लौकी, भिंडी, मिर्ची, करेला, गोभी, अदरक, लहसुन समेत कई तरह की सब्जियों की बड़े पैमाने पर खेती कर रहे हैं.
बच्चों को दिला रहे अच्छी तालीम
उसके बच्चे सिमोन टुडू व मोनिका टुडू इंटर में पढ़ रहे हैं, मर्शीला टुडू मैट्रिक, स्वीटी टुडू कक्षा छह और मसी टुडू दूसरी कक्षा में पढ़ रही है. शिक्षा से वंचित कदमा गांव के लोगों के लिए यह बड़ी मिसाल है. गरीबी के कारण आज भी गांव के अधिकांश लोग बच्चे को स्कूल नहीं भेज पाते, लेकिन सोरेन के दो बच्चे कॉलेज जाते हैं.
सोरेन व टुडू कहते हैं, ‘अगर इनसान ठान ले कि गांव में रोजगार करना है, तो वह कर सकता है, क्योंकि हर आदिवासी के पास पर्याप्त जमीन है. इसका सदुपयोग कर गरीबी से लड़ सकता है, विकास की होड़ में भी शामिल हो सकता है, क्योंकि उसमें मेहनत करने का माद्दा है.
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